न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

विश्व बाल अधिकार दिवस पर विशेष : बच्चों के भी हैं अधिकार

अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष 20 नवम्बर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना है। बच्चों के अधिकारों को लेकर हम आये दिन चर्चा करते हैं। हर कोई बच्चों पर अपना अधिकार जमाना चाहता है। बच्चों के खेलने कूदने और शिक्षा से लेकर उसके भरण−पोषण तक हर जगह बच्चों के अधिकारों को अनदेखा किया जाता है। बच्चों के अधिकार क्या हैं और कैसे हो इनकी सुरक्षा इस पर गंभीरता से मंथन की जरूरत है। आवश्यकता इस बात की है कि हम कागजी कार्यवाही और भाषणबाजी से ऊपर उठकर धरातल पर आकर यथार्थ में बच्चों के विकास की योजनाओं को अमली जामा पहनाएं ताकि उनके चेहरे पर मुस्कान आ सके।
बच्चों के अधिकारों से संबंधित घोषणा पत्र अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों के कानून में सबसे अधिक स्पष्ट व वृहद हैं। इसके 54 अनुच्छेदों में बच्चों को पहली बार आर्थिक, सामाजिक एवम राजनीतिक अधिकार एक साथ दिए गए हैं। यह घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 20 नवंबर 1989 को स्वीकार किया गया। बच्चों के अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक बनाने के लिये 20 नवंबर को अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन बाल अधिकार दिवस मनाते हुए बचपन को संरक्षित करने पर व्यापक रूप से चर्चा की जाती है और जन सामान्य को बच्चों के अधिकारों और बाल कानून की जानकारी दी जाती है।
बाल अधिकार के तहत जीवन का अधिकार, पहचान, भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा ,मनोरंजन, नाम, राष्ट्रीयता, परिवार और पारिवारिक पर्यावरण, उपेक्षा से सुरक्षा, बदसलूकी, दुर्व्यवहार, बच्चों का गैर-कानूनी व्यापार आदि शामिल है। बाल अधिकार बाल श्रम और बाल दुर्व्यवहार की खिलाफत करता है जिससे वह अपने बचपन, जीवन और विकास के अधिकार को प्राप्त कर सकें। भारत में गरीबी कुपोषण ,अशिक्षा ,अंधविश्वास ,सामाजिक कुरीति ,बाल विवाह और बॉल मजदूरी बचपन के सबसे बड़े दुश्मन है।
बच्चों के सर्वांगीण विकास को मद्देनजर रखते हुए सबसे पहले बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना होगा। सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को पढ़ाने में अव्वल रहता है। मगर गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। जिसके फलस्वरूप वे पिछड़ जाते हैं। आगे की पढ़ाई भी नहीं कर पाते और गरीब अभिभावक ऐसी स्थिति में अपने बच्चों को मजदूरी में जोत देते हैं। ऐसे बच्चे आगे जाकर अपराधों में फंसकर अपना भविष्य खराब कर लेते हैं। बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा समान स्तर पर मिलनी जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के बेहद गरीब 120 करोड़ लोगों में से लगभग एक तिहाई बच्चे हमारे देश के हैं।
भारत के संविधान में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से ऐसे कार्य या कारखाने आदि में नहीं रखा जाये। कारखाना अधिनियम, बाल श्रम निरोधक कानून आदि में भी बच्चों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई है। स्कूलों में बच्चों के लिए शिक्षा, वस्त्र, भोजन आदि की मुफ्त व्यवस्था की है। मगर सरकार के लाख जतन के बाद भी बाल श्रम आज बदस्तूर जारी है। नेशनल सेम्पल सर्वे संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दो तिहाई लोग पोषण के सामान्य मानक से कम खुराक प्राप्त कर रहे हैं। एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट में बताया गया है कि कुपोषित और कम वजन के बच्चों की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत भाग भारत में है।
बच्चों में अपराध और बाल मजदूरी के मामले में भी हमारा देश आगे है। हालांकि सरकार दावा कर रही है कि बाल मजदूरी में अपेक्षाकृत काफी कमी आई है। सरकार ने बाल श्रम रोकने के लिए अनेक कानून बनाये हैं और कड़ी सजा का प्रावधान भी किया है मगर असल में आज भी लाखों बच्चे कल-कारखानों से लेकर विभिन्न स्थानों पर मजदूरी कर रहे हैं। चाय की दुकानों पर, फल-सब्जी से लेकर मोटर गाड़ियों में हवा भरने, होटल, रेस्टोरेंटों में और छोटे-मोटे उद्योग धंधों में बाल मजदूर सामान्य तौर पर देखने को मिल जाते हैं। ये बच्चे गरीबी के कारण स्कूलों का मुंह नहीं देखते और परिवार पोषण के नाम पर मजदूरी में धकेल दिये जाते हैं। अपराधों की दुनिया में भी बच्चों के शामिल होने से उनका बचपन खतरे में पड़ गया है। पिछले एक दशक में बाल अपराधों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। एक रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के अपराधों में गत वर्ष के मुकाबले 24 फीसदी की वृद्धि हुई, जो खतरे का संकेत देती है। बाल अपराधों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। अपराधों के अलावा बच्चों के गायब होने की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि हो रही है। भारत में हर साल 13 लाख बच्चे गुम हो जाते हैं।
बच्चों को पढ़ने लिखने और खेलने कूदने से वंचित करना सबसे बड़ा अपराध है। बच्चों का भविष्य संवारने के लिए वह हर जतन करना चाहिये जिससे बच्चे अपने अधिकारों को प्राप्त कर सके। सरकार के साथ साथ समाज का भी यह दायित्व है कि वह बचपन को सुरक्षित रखने का हर प्रयास करे जिससे हमारा देश प्रगति और विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ सके। बच्चों का बचपन सुधरेगा तो देश का भविष्य भी सुरक्षित होगा। बच्चों के कल्याण की बहुमुखी योजनाओं को धरातली स्तर पर अमलीजामा पहनाकर हम देश के नौनिहालों को सुरक्षित जीवन प्रदान कर सकते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar