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विश्व सहनशीलता दिवस, 16 नवम्बर : जीवन शक्ति का पर्याय है सहनशीलता      

सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। बताया जाता है कि सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को दम्भी या अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है।संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व सहनशीलता दिवस हर साल 16 नवम्बर को मनाया जाता है। सहनशीलता का जिंदगी में बहुत महत्त्व है।  जिसने जीवन में सहन करना सीख लिया वह जिंदगी की हर जंग जीत सकता है। सहिष्णुता जीवन शक्ति का पर्याय है। विश्व के देशों में सहनशीलता का निरंतर क्षरण हो रहा है। शासक एक दूसरे के विरुद्ध ऐसे बयान जारी कर रहे है जिससे विश्व में कटुता और असहिष्णुता का बाजार गर्म हो रहा है। विश्व सहनशीलता दिवस मनाने के पीछे यह तर्क दिया जारहा है कि विश्व समुदाय एक दूसरे का सम्मान करें और अपने नागरिकों में उन भावनाओं को पुष्ट करें जिससे किसी भी स्थिति में  सहिष्णुता को हानि नहीं पहुंचे। सहनशीलता भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहनशीलता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त  वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। सहिष्णुता को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। नेताओं के जहरीले बयानों और भाषणों से वातावरण विषाक्त हो रहा है। इससे हमारी लोकतांत्रिक परम्परायें कमजोर और क्षतिग्रस्त हुई हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों सहित देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का उपयोग और प्रयोग हो रहा है वह हम सब के लिए बेहद चिंता और निराशाजनक है। सोशल मीडिया इसमें सबसे आगे है जहाँ ऐसे ऐसे शब्दों को देखा जा रहा है जिनकों इस आलेख में लिखा जाना कतई मुनासिब नहीं है। इसके लिए कोई एक पक्ष दोषी नहीं है। इस मैली गंगा में सभी अपना हाथ धो रहे है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है। भारत की संसद की बहस पर कोई टिक्का  टिपण्णी करना  विशेषाधिकार हनन में आता । आज पंडित नेहरू, फिरोज गाँधी  ,डॉ लोहिया ,एस एम बनर्जी, नाथ पाई, भूपेश गुप्त, ज्योतिर्मय  बसु,   पीलू मोदी, एन जी रंगा,अटल बिहारी वाजपेयी,  आडवाणी ,हुकुम चंद कछवाय ,कँवर लाल गुप्ता, मनोहर लाल सोंधी, मधु लिमये, कामथ, हेम बरुवा ,किशन पटनायक ,रवि रे  सरीखे तर्क- वितर्क में निपुण  सांसदों  की सहज ही याद आती है जिनके बयानों से संसद की गरिमा  को चार चाँद लगते थे। जो आम आदमी की बहबुद्धि के लिए उच्च स्तर की बहस के लिए विख्यात थे। सहिष्णुता इनकी रग रग में थी। उतेजना की स्थिति में भी इन्होंने अपने विरोधियों के लिए हल्के शब्दों का प्रयोग नही किया। ये ही हमारे लोकतंत्र के सच्चे वाहक थे।भारत में प्राचीन काल में वैदिक परम्परा का बहुत अधिक प्रभाव था। मध्यकाल आते-आते समाज में वर्ण व्यवस्था हावी हो गई। इसके साथ ही सम्पूर्ण समाज जातियों और वर्गों में विभाजित हो गया। अंधविश्वास, सामाजिक कुरीति, जात-पांत, छुआछूत, ऊँच-नीच के साथ महिला और पुरूष के मध्य भेदभाव का बोलबाला हो गया। समाज और राष्ट्र रूढ़िवादिता में फंस गया। चैदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी को समाज सुधार की दिशा में अग्रणी माना गया है। इस अवधि में समाज सुधार आंदोलन फैला और सामाजिक बुराइयों को चुनौती मिली। समाज सुधार के इस आंदोलन का नेतृत्व संतों और समाज सुधारकों ने किया। इन सन्तों ने जाति प्रथा, धार्मिक कट्टरता और अंध विश्वास के विरूद्ध लोगों में चेतना के बीज बोये। संतों ने समाज में बराबरी, समता, भाईचारे और प्रेम का सन्देश फैलाया। आपसी कटुता और बैरभाव के विरूद्ध लोगों को चेताया। संत कबीरदास से लेकर गुरूनानक, रैदास और सुन्दरलाल आदि संतों में समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों।      आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने सहिष्णुता का संदेश घर-घर तक पहुंचाया। गांधी जी सहिष्णुता के साक्षात प्रतीक थे। उन्होंने अनेक बार सहनशीलता का परिचय देकर भारतवासियों को एक नई राह दिखाई। बताया जाता है कि एक बार महात्मा गंाधी दक्षिण अफ्रिका के भ्रमण पर थे। एक स्थान पर रेल से उतरने के बाद गन्तव्य स्थान जाने के लिए उन्होंने एक तांगे की सवारी की। तांगे पर कुछ गोरे व्यक्ति भी सवार थे। गांधी जी एक पेटी पर बैठ गये। गोरों को यह स्वीकार नहीं था कि एक काला व्यक्ति उनके साथ बैठे। इससे नाराज होकर एक अंग्रेज ने गांधी जी को पीटना शुरू कर दिया। गांधी जी काफी देर तक मार खाते रहे। इसी बीच एक अन्य अंग्रेज को दया आ गई। उसने गांधी को पिटने से बचाया। गांधी ने अंग्रेजों के इस जुल्म का कोई प्रतिकार या विरोध नहीं किया। उन्हें क्षमा भी कर दिया। गांधी जी की सहिष्णुता का यह सबसे बड़ा उदाहरण है। सहनशीलता हमारे जीवन का मूल मंत्र है। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है। मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। 

– बाल मुकुन्द ओझा, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मो.- 9414441218

 

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