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व्यंग्य: अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता

राज शेखर भट्ट
लोकतंत्र, अर्थात लोगों के द्वारा नेताओं को चुना जायेगा। वही लोग और नेता मिलकर मंत्र फूंकेंगे। जिससे एक तंत्र, एक आलीशान मकान बनेगा। जिस मकान में छत पड़ने के बाद लोगों के लिए ही जगह नहीं बचती। इस मकान के अंदर जाने के लिए केवल चार रास्ते होते हैं। पहला रास्ता न्यायपालिका है, जहां न्याय देने की कार्यवाही ‘सतयुग’ में शुरू हो जाती है और न्याय मिलते-मिलते ‘कलयुग’ आ जाता है। क्योंकि जहां आंख पट्टी बांधकर जाना हो तो गिरते-संभलते ही पहुंचना होगा। एक आदमी की पुस्तें बीत जाती हैं और न्याय धरा का धरा रह जाता है। इस रास्ते मकान तक पहुंचना, अत्यंत जटिल और अत्यंत खर्चीला भी है। दूसरा रास्ता है कार्यपालिका, इस रास्ते में एक श्लोक पढ़कर आगे बढ़ा जाता है ‘कर्मण्डे वाधिकारस्ते, माफलेसु कदाचनः’। अर्थात कर्म करो और फल की चिंता मत करो, किवाड़ स्वयं खुल जायेंगे। परन्तु समय के साथ-साथ श्लोक भी बदल चुका है। अब भी इस रास्ते लोग आवागमन करते है, लेकिन किवाड़ स्वयं नहीं खुलता बल्कि खुलवाया जाता है। यहां भाषा भी बदल चुकी है, श्लोक और श्लोक का अर्थ भी। क्योंकि वर्तमान में श्लोक है, ‘काम तब करन्ति, घूस जब मिलन्ति।’
आलीशान मकान तक जाने का तीसरा रास्ता है विधायिका। जिस रास्ते पर चलते हैं विधायक साहब और चुनाव जीतने से पहले बोलते हैं, ‘काकचेष्टा बकोध्यानं, श्वाननिंद्रा तथैव च’। विधायक जी कह रहे हैं कि कौवे जैसी मेरी चतुरता से जनता के साथ कोई छल नहीं कर पायेगा। विकास पर मेरा ध्यान बगुले की तरह केन्द्रित रहेगा। किसी को भी मेरी कभी भी आवश्यकता हो, मैं तत्पर रहूंगा, निंद्रा त्याग करूंगा। लेकिन वर्तमान में यह तीसरा रास्ता अपनी दर्द की गाथा कुछ और ही सुनाता है। कौवे जैसी इनकी चतुरता छल से बचाने में नहीं बल्कि छल करने में आगे रहती है। इसीलिए कहा जाता है कि ‘पैसे की खनक और सत्ता की हनक इनके लिए ही बनी है। अंततः साफ है कि खजाने तो इन्हीं के भरने हैं। सत्य है कि इनका ध्यान विकास पर केन्द्रित रहता है, लेकिन इसमें जनता का विकास कागजों में और अपना विकास धरातल में रहता है। रही बात आवश्यकता और तत्परता तो जनता की आवश्यकता इनको चुनाव के टाईम पर होती है। वोटिंग के और प्रचार करने के लिए इनकी तत्परता सामने आती है। दुर्भाग्य से यदि इन सारी योग्यता रखने वाले नेताजी यदि चुनाव में पराजय का स्वाद चख लें तो इनकी विचलित मानसिकता मतदाताओं पर कहर बनकर भी टूटती है।
अब बात करते हैं अंतिम रास्ते की, जिसे मीडिया कहा जाता है। कहा जाता है कि यह ही एक ऐसा तंत्र है, जो बुराई को समाप्त करने का दम रखता है। परन्तु ऐसा कहना और सुनना आज के दौर में 90 प्रतिशत भ्रांति बनकर रह गयी है। मीडिया की एक खूबसूरती अब निखरकर सामने आने लगी है, जिससे अब मीडिया और विधायिका लगभग एक सी है। मीडिया के अंदर अब इतने संगठन बन चुके हैं कि यहां भी पक्ष-विपक्ष का माहौल सामने आता है। बस अंतर इतना है कि चुनाव के लिए चुनाव आयोग और बहस करने के लिए मीडिया की विधानसभा नहीं है। खूबियों में यह भी शुमार हो कि संगठनों से कई पत्रकार नहीं जुड़े हैं तो इनको निदलीय पत्रकार भी कहा जा सकता है। एक तरफ कुछ दलीय नेता हैं तो कुछ निर्दलीय नेता हैं और दूसरी तरफ कुछ दलीय पत्रकार हैं तो निर्दलीय पत्रकार।
बहरहाल, अंत में स्पष्टता के साथ इतना जरूर कहा जा सकता है। अधिकांश लोग अपने मतलब के लिए ही जी रहे हैं। लोकतंत्र के चारों रास्ते 90 प्रतिशत जर्जर हो चुके हैं। 60 प्रतिशत भ्रष्टाचार की आगोश में हैं तो 30 प्रतिशत कुर्सी की चाहत में। जनता के बीच से ही कोयल जैसा नेता, अधिकारी, कर्मचारी और पत्रकार निकलकर आता है। फिर राजनीति, नौकरशाही और मीडिया के आसमान में कौवा बनकर उड़ान भरता है। इस दौर में आम इनसान से लेकर खास इनसान तक सबका एक नारा बन चुका है। ‘‘अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता’’। यही है वो लोकतंत्र, जो लोगों और उन्हीं लोगों के द्वारा बनाये गये नेताओं ने बनाया है।

राज शेखर भट्ट, व्यंग्यकार
83/1, बकराल वाला, देहरादून (उत्तराखण्ड)
Mobile : 8859969483
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