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व्यंग्य : एक झुनझुना कश्मीर के नाम पे …

खुशी की बात है दिनेश्वर शर्मा को मोदी सरकार ने कश्मीर मुद्दे के राजनीतिक हल को तलाशने के लिए अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया ।
वतन मेरा , लोग मेरे , घर अपना तो कश्मीर को क्यों अलग मानते है ये राजनैतिक दल ये समझ से परे है । कहने को तो बड़े शान से कश्मीर मेरा जन्नत कहते हैं और फिर एक अंग को अलग कर वार्ता के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं ।

खैर ये तो रही मन की बात । दिनेश्वर शर्मा 1978 बैच के रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं । उन्होंने वर्ष 2014 से 2016 के बीच आईबी के डायरेक्टर की कमान संभाला है । मणिपुर में अभी अलगाववादी गुटों से बातचीत कर रहे हैं ।

इसके पहले भी ऐसा प्रयास किया जा चुका है । राजनाथ सिंह के अनुसार दिनेश्वर शर्मा सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर जम्मू – कश्मीर के लोगों की भावनाओं को समझेंगे । ये बात कुछ हजम नहीं हुई । शायद कश्मीरी लोगों की भावनाएँ कुछ स्पेशल होती होगी जो हमारी भावनाओं से मेल नहीं खाती है । तभी तो विशेष किस्म के अधिकारी को वहाँ भेजा जा रहा है दुर्लभ प्रजाति के लोगों के दुर्लभ भावनाओं को गहराई से समझने के लिए ।

राजनाथ सिंह जी ये भी कहना है कि शर्मा जी को कैबिनेट सेक्रेटरी का दर्जा मिलेगा । बातचीत करने की पूरी आजादी होगी । उन्होंने यह भी कहा कि सभी पक्षों से बातचीत के बाद अपनी रिपोर्ट केंद्र और जम्मू – कश्मीर सरकार को सौंपेंगे ।
दोहरी सरकार तो आजादी के बाद ही बना दी गई थी । सिर्फ अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कुछ महान महापुरुषों ने मेरे जन्नत को अलग कर दिया था वे भी अलग संविधान के साथ ।
अब खाली ढोल पीटो , लकीर पीटो ।
इसके पहले भी ऐसी कमेटी बनाई गई थी जिसमें दिवंगत पत्रकार दिलीप पडगांवकर , शिक्षा विद् राधा कुमार और पूर्व ब्यूरोक्रेट एमएम अंसारी शामिल थे । इस कमेटी ने 2012 में सरकार को रिपोर्ट सौंप दी थी लेकिन इसमें की गई सिफारिश पर सरकार ने अमल नहीं किया । वैसे भी इसके पूर्व सरकार को सोने से फुर्सत कहाँ थी । रिपोर्ट धरा का धरा रह गया । भैंस के आगे बीन बजाने से फायदा तो कुछ था नहीं ।

राधा कुमार जी का कहना है कि यह योजना तीन वर्ष पूर्व ही शुरू हो जानी थी पर देर आये दुरुस्त आये । जो भी कश्मीर को मुद्रा न मानकर अपना अंग मानकर अगर उसका दर्द महसूस किया जाए तो इससे समस्याओं की जड़ तक पहुँचने में सुविधा होगी ।

रिपोर्ट पर रिपोर्ट तैयार तो होती रहती है पर अमन – शान्ति दरकिनार कर नेता चुप्पी साधे बैठे रहते हैं । राजनीतिक वार्ता होनी चाहिए ये बात विदित है पर कमिटी की रिपोर्ट पर सिफारिशों पर अमल भी तो होना चाहिए ।
परंतु पिछली सरकार ने तो सिफारिशों पर कोई अमल ही नहीं किया । मन तो मोह लिया मोहन से और हमें गुलगला थमा दिया ।

अलगाववादी नेताओं ने इस बीच सिनेमा जगत के महानायक मेरा नाम जोकर के अभिनेता राजकपूर के जैसे किरदार निभा रहे थे । रंग – बिरंगी पोशाकों के बीच अपने जलवे बिखेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
फिर वाजपेयी जी के सत्ता में न आने से हिंग लगे फिटकरी , फिर भी रंग चोखा , वाला हाल हुआ ।
जश्न मानाये होंगे सब मिलकर , जो कश्मीर की इस स्थिति के जिम्मेदार है ।

वैसे सरकार की यह ललनटॉप नीति देखते है क्या काम करती है । संवाद के अलावा फिलहाल अभी तो कोई रास्ता नहीं है ।

कश्मीर की जो अभी ज़मीनी स्थिति है इस समय ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो शांति प्रक्रिया पर हमेशा काम करते रहें ।
अभी तो शुरुआत है देखना ये है कि दिनेश्वर शर्मा जी अपनी जिम्मेदारी किस प्रकार पूरा करते है ।
कहीं ऐसा न हो हमें फिर एक झुनझुना पकड़ा दिया जाय और हम झुनझुना ही बजाते रह जाये ।

लेखिका
मल्लिका रुद्रा ” मलय – तापस “
बरतुंगा , चिरमिरी ,छत्तीसगढ़

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