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व्यंग्य : खिचड़ी को लेकर मजाक नहीं चलेगा

देखिए ! आप शिकायत करते थे ना कि अच्छे दिन कब आयेंगे ? देखो ! वे अच्छे दिन आ गये। खिचड़ी के रूप में आये है। खिचड़ी को सोशल मीडिया के सरदारों ने राष्ट्रीय व्यंजन घोषित करने की पूरी तैयारी कर दी थी। खिचड़ी प्रेमियों का उत्साह चरम पर था। आखिर उत्साह चरम पर क्यों न हो ! खिचड़ी का जो राष्ट्ररोहण होने वाला था। लेकिन अचानक खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन बनाने से इंकार कर दिया गया। मना करने वाले वे नेता जो सियासत की खिचड़ी पकाते और खाते है। उन्होंने साफ इंकार कर दिया खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन नहीं बनाया जायेगा। यह खबर न केवल खिचड़ी प्रेमियों को आहत करने वाली थी, बल्कि दो दिनों से खुशी के सातवें आसमान पर थिरक रही खुद खिचड़ी का दिल दहलाने वाली भी थी। पहले ही कह दे रहा हूं इस तरह खिचड़ी को लेकर भदा मजाक नहीं चलेंगा। तुम बेचारी खिचड़ी के अरमानों के साथ खेलो। यह कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। आखिर खिचड़ी की भी अस्मिता है। खिचड़ी की भी समाज में वैल्यू है।

भाईयों और बहनों ! मैं आपसे पूछता हूं कि क्या सबकी सहेती व हर दिल अजीज खिचड़ी को राष्ट्रीय व्यंजन नहीं बनाना चाहिए ? खैर ! खिचड़ी की कीमत तुम क्या जानोगे सरकारी बाबू ? एक कटोरी खिचड़ी मरीज के दिल का सुकून होती है। एक कटोरी खिचड़ी गरीब के पापी पेट का जुगाड़ होती है। खिचड़ी हमारी समानता का प्रतीक है। जिसे गरीब और अमीर दोनों बडे चाव के साथ खाते है। और जिसे बनाने में समय बडा कम लगता है। मुझे तो साबूदाना की खिचड़ी बडी पसंद है। आपको कौनसी है ? अगर खिचड़ी को सरकार राष्ट्रीय व्यंजन बना देती, तो सरकार के घर का क्या जाता ? बल्कि खिचड़ी के पास वे समस्त गुण विद्यमान है, जो एक राष्ट्रीय व्यंजन की कुर्सी पर राज करने के लिए चाहिए। खिचड़ी जैसा सस्ता व टिकाऊ पौष्टिक आहार ओर क्यों नहीं होगा ? खिचड़ी सबको सम्मोहित करने वाली है। जिसमें कढ़ी डालो तो भी स्वीकृति की मंजूरी दे देती है और दाल डालो तो भी खुले दिल से स्वागत करती है। दरअसल, खिचड़ी दाल और चावल और कई अनाजों का गठबंधन है। इस गठबंधन में से यदि कोई एक भी चीज अलग हो जाये तो खिचड़ी का स्वाद बेतुका हो जायेंगा। फिर खाने में वो मजा नहीं आयेगा।

लेकिन, खिचड़ी के हाथ तो रूसवाई ही आयी। सपनों पर पानी फेर दिया गया। गरीब और अमीर की खिचड़ी तमाशा बनकर रह गयी। जो खिचड़ी राष्ट्र नेतृत्व करने वाली थी। जिसकी खुशबू विदेशों तक जाने वाली थी, उस खिचड़ी के दिल के टुकडे-टुकडे हो गये। रूठी-रूठी है खिचडी मनाये कैसे ? ये सोशल मीडिया के चूजे भी गजब है। आजतक इंसानों के साथ अफवाह अफवाह का खेल खेलते थे। अब खिचड़ी जैसे सीधे आहार को भी इसका शिकार बनाने लग गये। खिचड़ी के सिवाए कोई दूसरा नहीं मिला क्या ? मुझे लगता है कि इस सब कांड के बाद खिचड़ी प्रेमियों खिचड़ी के पक्ष में कैंडल मार्च निकालना चाहिए।

विपक्ष को चाहिए कि खिचड़ी की मानहानि के लिए सत्ता पक्ष से मुआवजे की मांग करे। खिचड़ी के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन के लिए सभी को घरों से निकलना चाहिए। जब तुम बाबाओं को गलत कामों से बचाने के लिए सरकार से भीड जाते हो, तो बेचारी मासूम व लोकप्रिय खिचड़ी के लिए क्यूं नहीं भिडोगे ? बहरहाल, खिचड़ी के पास यही कहने के लिए शब्द रह गये – अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने लूट लिया घर यार का।

देवेंद्रराज सुथार

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