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व्यंग्य : दिवाली के मतलब हजार

भाईसाहब ! दिवाली सिर पर है। हर जगह हर्ष और उल्लास का माहौल है। लेकिन, देश की राजधानी दिल्ली की गलियां सुनसान है। दिल्ली वालों के दिलों पर निराशा के बादल छाये हुए है। क्योंकि कोर्ट ने पटाखे फोड़ने पर सख्त पाबंदी लगा दी है। कोर्ट का मानना है कि पटाखों से प्रदूषण फैलता है। जो कि सही मानना है। लेकिन, इसके बाद अपन का भी एक सवाल है कि नेताओं के घटिया और बेस्तर के भाषणों से क्या फैलता है ? सिर्फ प्रदूषण अकेली दिल्ली में ही फैलता है क्या ? शायद ! सारे बड़े नेता वहीं रहते है, उनको अपनी सेहत प्यारी है। वैसे भी अपन के देश में दिवाली का मतलब तो पटाखे फोड़ना ही है। जैसे कि होली का मतलब रंगों से एक-दूसरे को रंगना है। दिवाली पर हम पड़ोसी के घर के पाइप में सुतलीबम सुलगा देते है तो होली पर गोबर से दूसरोें के चेहरे पोत देने को अपना कर्तव्य समझते है। बाकि दिवाली पर क्या करते है ? दिवाली की उम्र केवल एक दिन ही है। एक दिन खुश हो लो ! फिर तो हर रात काली ही काली है। शेष 364 दिन तो दिवाला ही दिवाला है। बहुतों के लिए दिवाली देशभक्ति का प्रदर्शन करने का भी दिन है। इनका मन छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त से नहीे भरता है। ये महान देशभक्तों की टोली चीनी पटाखों पर प्रतिबंध का मुजरा करती है। जगह-जगह रेलियां निकालती है। भले पटाखों पर प्रतिबंध की बात ये देशभक्त करते हो लेकिन, इनकी पेंट से लेकर कमीज की जेब में डाला हुआ मोबाईल तक चाइना की देन है। आधे से अधिक भारत के लोग चीन के सामान पर ही सांस ले रहे है। क्योंकि इंडिया निर्मित्त एक मोबाईल के दाम पर चीन के दस मोबाईल आ जाते है। तो भला कौन इंडिया का सामान खरीदेंगा ? और कैसे चाइनीज उत्पादों पर रोक लगेंगी ? यदि रोक लगानी है तो सरकार समूचे भारत में चीन आयातित उत्पादों की खरीद फरोख्त पर प्रतिबंध क्यों नहीे लगा देती ? फिर देखों ! कौनसा शी जिनपिंग बुलेट ट्रेन के लिए 0.1 प्रतिशत के ब्याज दर पर लोन मुहैया कराता है। कुछेक के लिए दिवाली का मतलब मिठाई खाना भी है। इस महापर्व पर मिठाई वाला मिलावट करना अपना परम दायित्व समझता है। दूध से ज्यादा सफेद पाउडर इस्तेमाल करता है। दरअसल, यह दिन नकली मावे पर असली मावे की विजय का भी है। ओर तो ओर एक से बढ़कर एक ऑफरों का भी दिन है। अखबारों में खबरों से ज्यादा ऑफरो की बरसात होती है। ऑफर का लॉलीपॉप देकर खूब उल्लू बनाने का खेल होता है। न जाने कैसे दिवाली आने पर मक्खी चूस दुकानदार इतने दरियादिल हो जाते है ? यह एक शोध का विषय है। यह दिन लक्ष्मी जी को रिझाने का भी है। लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए हर कोई आड़े-टेड़े यत्न करता है। लेकिन, यत्न करने वाला यह नहीं समझता लक्ष्मी जी भी अब चंचल के साथ चतुर हो गई है। ईमानदार के पास आना पसंद नहीं करती, बेईमान के पास दौड़ी चली आती है। कहने को तो दिवाली है। राम के गृह वापसी का दिन है। पर देश में कितनी सीताएं राम के त्यागे जाने के कारण विलाप कर रही है ? आज भी अग्निपरीक्षा दे रही है। राम का मुकुट भींग रहा है। किसान मर रहा है। समझो तो दिवाली के मतलब भी हजार है। पैसे वालों के लिए हर रात दिवाली है और गरीब के लिए हर रात काली है।

– देवेंद्रराज सुथार
पता – गांधी चौक, आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। पिन कोड – 343025

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