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व्यंग्य : बाबाजी की मखमली रजाई

भारत एक बाबा प्रधान देश हैं। इनमें तरह-तरह के बाबा पाये जाते हैं। यह बाबा अंतर्यामी के साथ-साथ सर्वत्र विद्यमान भी हैं। हर गांव शहरों की नुक्कड़ पर दर्शन हो ही जाते हैं। अपने जाल में फंसाकर दूसरो की किस्मत बताते हुए नजर आते हैं भले ही खुद के भविष्य का पता न हों। मंगल भारी,शनि भारी न जाने कितने ही शब्द भेदी बाण चलाकर हमें शिकार बना ही लेते हैं। आजकल ट्रेन में सफर करते हैं तब और कोई हो या न हों,बाबाओं का जमावड़ा जरूर नजर आता हैं। इधर-उधर बाबियों की तलाश में घूमते रहते हैं। क्यों न कभी कोई सीट वाली लाइन मार दे और जिंदगी संवार लें। खेलतें हुए बच्चों से भरा-पूरा परिवार का सपना भला कौन नहीं देखता हैं। लेकिन दुनिया भर की फ़ोकट में सैर करने के बाद में भी इससे वंचित रह जाते हैं,फिर बाबा बनना तो स्वाभाविक हैं। बाबाओं की बढ़ती तादाद के बारे में सरकार को भी विचार करना चाहिए। क्योकि बाबाओं का विकास अवरुद्ध ही नहीं हो रहा हैं। एक बात मुझे भी समझ में बड़ी देर के बाद आई “कि आखिर बाबा बनाया किसने” इतना एश्वर्य,धन-दौलत के साथ बंगला-गाड़ी न जाने कितनी ही सुख सुविधाएं दिलाई। फिर उन्होंने भी मन में विचार किया कि अच्छे दिन तो अब जाकर आये हैं अब भक्ति करके बुरे दिन वापिस क्यूँ घसीटे? लेकिन यह धन-दौलत वाले अच्छे दिन सभी बाबाओं के सौभाग्य में भी नहीं मिलता। सिर्फ उन्हीं बाबओं को मुबारक होता हैं,जो बाबागिरी के साथ-साथ दादागिरी का कवच बिखेरते हुए चापलुसगिरी का भी गुर सीखा हों। जो सीधे और भक्ति की मूरत होते हैं वो बाबा इस कॉम्पिटिशन की ओम आर शीट तक नहीं भर सकते हैं और इस अटपटे नजारे से बेदख़ल हो जाते हैं। लेकिन वो बाबा अपनी बाबागिरी के दम पर सभी लोगों को भक्त का तमग़ा देकर वशीभूत कर लेते हैं। इतने प्रिय भक्त बन जाते हैं कि यदि बाबाजी के बारे में एक लफ़्ज भी भला-बुरा कह दिया जाये तो जान लेने तक उतारू हो जाते हैं। यह प्रकोप हैं तो बाबाजी की मखमली रजाई का। जो सर्दी के बचाव के लिए ही नहीं अपितु सदाबहार बिक्री होती रहती हैं। ज्यों-ज्यों बिक्री बढ़ जाती हैं लोकप्रियता के साथ भक्तों की तादाद में भी बढ़ोतरी हो जाती हैं। धीरे-धीरे बाबाओ के नारे भी लगने लगते हैं। ढ़ोल-ढींगारो के साथ बाबाजी को पालकी में बिठाकर नगर की यात्रा करवा लेते हैं। इतनी शोहरत और धन-वैभव के चक्कर में मदमस्त होकर सारी हदें पार कर लेते और एक दिन वही मखमली रजाई फट जाती हैं। बाबाजी की टांगे तो नग्न होती हैं पूरा शरीर अश्लीलता की अँधेरी आग में नग्न हो जाता हैं। इतनी बड़ी शोहरत के बाद यदि अब भी कम लगती हैं तो वो शेष शोहरतें जेल में मिल जाती हैं। वही जो हमारे जैसे लोग उन बाबाओं का नाम तक नहीं जानते हैं वो भी उनका सचित्र वर्णन तो कर सकें। लेकिन एक बात का ध्यान तो उनका भी रखना चाहिए था कि अपनी रजाई कितनी लम्बी हैं उतने ही पाँव पसारने चाहिए थे आखिर दुःख की बात तो अब हुई कि भला मखमली रजाई कैसे कम पड़ गयी। चाहे कितने भी यत्न-प्रयत्न कर लों एक न एक दिन अपराधों एवं घिनोने कार्यो से युक्त बाबाजी की मखमली रजाई सदा-सदा के लिए फट ही जाती हैं।

जालाराम चौधरी
पता-गांव डाबली,तह.सिवाना,
जिला-बाड़मेर(राज.)
पिन कोड-344043

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