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व्यंग्य : लोकतंत्र को चूहों से खतरा

देवेंद्रराज सुथार

बेशक, हमें आजादी तो मिली। लेकिन हमें चूहा प्रथा आजादी की मुंह दिखाई में मिली। लोकतंत्र जैसे-जैसे विकास करता गया चूहों का खानदान भी बढ़ता गया। यूं कहिए कि चूहों की हालत मस्त और बेचारी जनता पस्त होती गई। ऐसे भी समझ लीजिए कि लोकतंत्र का हारामखोर इन चूहों ने पूरा का पूरा बलात्कार कर डाला है। कभी भी बाबा, बाबियों और इन चूहों के हाथ में धन नहीं देना चाहिए। क्योंकि जैसे ही इनके हाथों में धन आता है, ये चत्मकार करना शुरू कर देते है। आजादी के अमर नायकों के सपनों की धज्जियां उड़ाने में इन चूहों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। जब इस तरह देश में दिन-दुगुनी और रात चौगुनी वृद्धि चूहे करते जायेंगे तो जनाब भुखमरी तो बढ़ेगी ही ना ? लोग बिना जड़ के मूल में जायें ही बक देते है अनाज सड़ रहा है इसलिए भुखमरी का ग्राफ बढ़ रहा है। असल कारण तो यह है कि जितना अनाज सड़ने से नष्ट नहीं हो रहा है, उतना तो ये राष्ट्रसेवक लोकनायक चूहे निगल रहे है। कसम से इन चूहों ने पूरा का पूरा देश खा लिया पर अब भी इनको डकार नहीं है। इन चूहों की कारस्तानी तो देखिए देश को ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 100 वां पायदान दिलाकर हर एक भारतीय का सीना गर्व से छप्पन इंच का कर दिया है। कमबख्तों ने शतक ही ठोंक दिया। जितनी क्षमता इंडियन चूहों में कुतरने की है, उतनी दुनिया के किसी भी देश के चूहों में नहीं है। ये चूहे भारतीय लोकतंत्र के उद्यान में पिछले सत्तर साल से बिंदास घूम रहे है। इनको पिंजरे में बंद करने कि किसी में हिम्मत नहीं है। इन चूहों की संख्या इतनी है कि संसार के सारे पिंजरे कम पड़ जायेंगे। यह तो हर विभाग हर कार्यालय में मुस्तैद है। अब आप ही कल्पना कर सकते है कि इन चूहों के रहते भुखमरी कैसे मिट सकती है ? गरीबी कैसे खत्म हो सकती है ? देश का विकास इस कदर हो रहा है कि नेताओं के पेट बढते ही जा रहे है। और गरीबों के पेट सिकुडते ही जा रहे है। सारी मलाई ये चूहे मार के खा रहे है। चूहों के बीच देश में एक शेरनी भी हुई थी। जिसने गरीबी हटाओ का नारा बुलंद किया था। इस शेरनी ने अपने राज में इतनी ही गरीबी मिटायी कि गरीबी के पीछे लगी बड़ी ई की मात्र मिटाकर केवल गरीब को तन्हा छोडकर चलती बनी। गरीबी मिटाने वाली इस शेरनी ने गरीबी मिटाने के नाम पर कितने ही शेरों की पकड़ पकड़कर जबरन नसबंदी करवा डाली। बेचारे ! किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। इन चूहों को मिटाने के लिए हाल के साल में देशव्यापी आंदोलन भी हुए। चूहों को खत्म करने के लिए लोकपाल लाने का प्रस्ताव पारित करने की बात कही गई। और पारित करवाने की आज तक बात ही कही जा रही है। और आगे भी बात ही कही जायेगी। जो दिल्ली के रामलीला मैदान में शेर बनकर दहाड रहे थे, वो अब चूहे बनकर बिल में हनीमून सेलिब्रेट कर रहे है। जब तक चूहों का खात्मा नहीं होंगा तब तक देश की भुखमरी नहीं मिटेगी।

– देवेंद्रराज सुथार
संपर्क – आतमणावास, बागरा, जिला-जालोर, राजस्थान। 343025

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