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शिक्षा सेवा सबसे बड़ी मानव सेवा है

डॉ. राधाकृष्णन अपने बुद्धिमत्तापूर्ण व्याख्याओं, आनंदमयी अभिव्यक्ति और हँसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को प्रेरित करने के साथ ही साथ उन्हें अच्छा मार्गदर्शन भी दिया करते थे। वे छात्रों को लगातार प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। उनका मानना था कि करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी व उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस 5 सितम्बर को हर साल शिक्षक दिवस के दिन मनाया जाता है। इस दिन समाज और देश के विकास में शिक्षकों के योगदान पर प्रकाश डाला जाता है। समारोह आयोजित कर शिक्षकों का सम्मान किया जाता है। आज के दिन हमें डॉ राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप देश को ढालने और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। संस्कारित, नैतिक और चरित्रवान समाज के निर्माण के उनके सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी शिक्षकों के साथ साथ समाज की भी है। लेकिन सबसे पहले हमें आज की हमारी बुनियादी शिक्षा पर विचारने की जरुरत है। जब तक हमारी बुनियाद मजबूत नहीं होगी तब तक देश को मजबूत बनाने की बात कोरी कल्पना होगी। हमें यह देखना होगा कि हम किस प्रकार की शिक्षा अपने नौनिहालों को दे रहे और देना चाहते है जिनके बूते देश और समाज के दिशा निर्धारण की बात करते हैं। शिक्षक समाज की आधारशिला है। किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। शिक्षक निश्चय ही समाज और राष्ट्र के भविष्य का निर्धारण करते है इसमें कोई दो राय नहीं है मगर आज के दिन हमें बिना लाग लपेट के शिक्षा की वर्तमान दशा और दिशा पर भी चिंतन और मंथन करने की जरुरत है।
शिक्षा का बुनियादी उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास करना है। शिक्षा एक बहुआयामी साधन है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारती है। व्यक्तित्व निर्माण के कारण ही मनुष्य, समाज का निर्माण और दिशा प्रदान करने का कार्य करता है। भारत में बुनियादी शिक्षा की हालत चिंताजनक है। नामांकन दर तो बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता की हालत खस्ता है। शिक्षा के क्षेत्र में की गई सेवा सबसे बड़ी मानव सेवा है इसलिए बुनियादी शिक्षा की जरूरतों पर ध्यान देने की विशेष जरूरत है।
देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। अनेक संस्थाओं ने अपनी रिपोर्टों में देश में बुनियादी शिक्षा को लेकर सवाल उठाये हैं और बताया है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भारी शैक्षिक विस्तार के बावजूद गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के कार्य में हम बहुत पिछड़े हुए हैं। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां हमारी आधी से अधिक आबादी गरीबी में जीवन बसर कर रही है। रिपोर्टों में खुलासा किया गया है कि प्रारम्भिक शिक्षा का देहाती क्षेत्रों में हाल बहुत बुरा है जहां आठवीं का छात्र गुणा भाग सही तरीके से नहीं कर सकता और पांचवीं का छात्र पुस्तक नहीं पढ़ सकता। अर्थात् उसे पांच वर्ष के बाद भी अक्षर का ज्ञान नहीं है।
भारत में गुरूकुल की शिक्षा को आज भी याद किया जाता है। गुरूकुल की शिक्षा में हमारे आपसी सम्बन्धों, सामाजिक सांस्कृतिक एकता, गौरवशाली परम्पराओं को प्रमुखता से केन्द्र बिन्दु में रखा जाता था ताकि बालक पढ़ लिखकर चरित्रवान बने और उसमें नैतिक संस्कारों का समावेश हो। गुरुकुल शिक्षा का आधार, संस्कारों की बुनियाद है। संस्कारों के बिना सार्थक शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। गुरुकुल शिक्षा अंधेरे से प्रकाश की यात्रा है तथा संस्कार हमारी जीवन-शैली हैं। संस्कार हमें दिशा बोध के साथ-साथ कर्त्तव्यों का भी बोध कराते हैं। मगर आज की शिक्षा प्रणाली संस्कारों से हट कर अंक प्राप्ति तक सीमित हो कर रह गई है। आज ज्ञान विज्ञान का स्थान अंक अर्जित करने पर अधिक हो गया है।
हमारा समाज आज अनेक सामाजिक बुराइयों से ग्रसित है। डॉ राधाकृष्णन का कहना था कि यदि शिक्षा सही प्रकार से दी जाए तो समाज से अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। इसके लिए जरुरी है कि शिक्षक स्वयं नैतिक रूप से मजबूत हो। डॉ राधाकृष्णन के विचारों के अनुरूप हमारी बुनियादी शिक्षा गुणवत्तायुक्त और मजबूत होगी तो हम शिक्षा को गुणग्राही बनाकर देश को विकास के राह पर आगे बढ़ा पायेंगे।

 

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
9414441218

 

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