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श्री गणपति के अवतारी स्वरूप : आशुतोष महाराज

वह एक ही सत्ता है, जो सभी प्राणियों की अंतरात्मा में विराजमान है। वही सत्ता अपने एक स्वरूप को बहुत प्रकार का बनाकर अभिव्यक्त करती है। श्री गणपति भी ऐसी ही एक दिव्य सत्ता हैं। एक विचित्र स्वरूप के स्वामी! उनके इस ‘एक’ अद्भुत रूप की ‘अनेकों’ अभिव्यक्तियाँ आज समाज में प्रचलित हैं। अनेक संकेत, अनेक व्याख्याएँ उनके प्रत्येक अंग से जोड़ी जा चुकी हैं। गणेश पुराण में भगवान गणेश के 32 स्वरूपों की दिव्य व्याख्या की गई है। आइए भगवान गणपति के कुछ अवतारी रूपों से प्रेरणा प्राप्त कर, अपने जीवन को एक सुंदर दृष्टिकोण व दिशा प्रदान करें।
‘भक्त गणपति’- भगवान के 32 स्वरूपों में से तीसरे अवतार हैं। भक्त स्वरूप गणपति चाँदी सरीखे श्वेत रंग में प्रकट होते हैं| श्वेत वर्ण शांति और सौम्यता को दर्शाता है| मुख्यतः यह स्वरूप ‘भक्ति रस’ का प्रतीक है। भक्त गणपति के दिव्य हस्तों में गुड़-रस, मीठा आम, केला और जलयुक्त कच्चा नारियल- ये सभी पदार्थ सरस और मधुर भक्ति के संकेत देते हैं। भक्ति स्वरूप गणपति हमें भक्ति रस की मिठास पाने की प्रेरणा देता हैं| भक्ति एवं सतत नाम-स्मरण कर मन को शुद्ध और शीतल बनाना सिखाते हैं।

‘द्विज’ भगवान गणपति का छठा अवतारी स्वरूप है| ‘द्विज’ का अर्थ होता है, जिसका जन्म दो बार हुआ है। यह द्विज शब्द हमें उस घटना का स्मरण कराता है, जब भगवान शिव गणेश जी का सिर धड़ से अलग करने के पश्चात् एक हाथी के सिर से बदल देते हैं। यही कार्य पूर्ण गुरु भी किया करते हैं। वह शिष्य को ब्रह्मज्ञान प्रदान कर उसे अंतर्जगत में दूसरा जन्म देते हैं अर्थात उसे द्विज बनाते हैं| उसके संकीर्ण दृष्टिकोण को ध्वस्त कर उसे उदार और विवेकपूर्ण सूझबूझ का स्वामी बनाते हैं। द्विज गणपति के चार शीश ब्रह्मज्ञान द्वारा प्राप्त होने वाली चार दिव्यनुभूतियों (पदार्थ) के प्रतीक हैं, जो सद्गुरु कृपा से अंतर्जगत में अनुभव होती हैं| ये अनुभूतियाँ हैं– दिव्य प्रकाश का दर्शन, अनहद नाद का श्रवण, आदिनाम का सुमिरन और अमृत का पान| अतः द्विज गणपति हमें पूर्ण गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर दूसरा या आध्यात्मिक जन्म पाने की प्रेरणा देते हैं। अंतर्जगत में अलौकिक अनुभूतियों का आनंद पाने हेतु प्रेरित करते हैं।
‘एकाक्षर’ गणपति का सत्रहवां अवतारी स्वरूप है। इसमें मूषक प्रतीक है, हमारे चंचल मन का। पद्मासन में मूषक की सवारी करना यही दर्शाता है कि चंचल मन को केवल ध्यान-साधन द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है| कैसा ध्यान? कैसी साधना? वह ध्यान जिसकी शुरुआत सद्गुरु द्वारा तीसरे नेत्र के सक्रिय होने के बाद होती है। तीसरे नेत्र के जागृत होते ही आंतरिक चंद्रमा या प्रकाश का साक्षात्कार होता है| यही नहीं, ‘एकाक्षर’ आदिनाम भी साधक की श्वासों में प्रकट हो जाता है। अतः एकाक्षर गणपति हमें ब्रह्मज्ञान की ध्यान-साधना, श्वास-श्वास में नाम सुमिरन द्वारा अपने चंचल और कुतर्की मन की सवारी (नियंत्रित) करने की प्रेरणा देते हैं।
‘वरद’ भगवान गणेश का अठारहवाँ अवतार है| गणेश जी का यह अवतार वरदान प्रदाता के रूप में प्रसिद्ध है| जीवन में वरदान की प्राप्ति कब होती है? यह वरद गणपति का स्वरूप हमें समझाता है| इनके हाथों में अंकुश वे कमंद है, जो अनुशासित और नियंत्रित जीवन के प्रतीक हैं| जब एक साधक नियमबद्ध और संयमित जीवन की सतत साधना करता है, तब उस पर वरदानों की वर्षा होती है| उसे कुछ भी माँगने की आवश्यकता नहीं रहती। बड़ी सहजता से स्वतः ही उसकी झोली में नियामतें बरस जाती हैं| कैसी नियामतें? भक्ति के अलंकारों व आभूषणों से ऐसे साधक का शृंगार होने लगता है| सूंड में स्थित आभूषणों की संदूक प्रतीक है कि भक्ति का खजाना उसके हाथ लग जाता है। दूसरा, शक्ति स्वरूपा देवी प्रतीक हैं कि ऐसे साधक का जीवन शक्तिमान व ऊर्जापूर्ण रहता है| तीसरा, शहद का प्याला दर्शाता है कि ऐसे साधक को साक्षात् रस स्वरूप ईश्वर अर्थात मुक्ति प्राप्त हो जाती है। अतः वरद गणपति हमें सिखाते हैं कि एक अनुशासनबद्ध साधक सहजता से भक्ति, शक्ति व मुक्ति का वरदान पा लेता है।

विघ्न गणपति नवें अवतार हैं| हम अपने जीवन के विघ्न दूर करने के लिए अनेक विधाओं, पूजनों व कर्म-कांडों को अपनाते हैं| पर विघ्न गणपति हमें विघ्न हरने की बड़ी प्रयोगात्मक कला सिखाते हैं। जानते हैं, जीवन में विघ्न किस कारण से आते हैं? हमारे अपने ही कर्म-संस्कारों के कारण! हमारे कर्म और संस्कार ही फलीभूत होकर विघ्न बन सामने अड़ जाते हैं। विघ्न गणपति की अष्टभुजाओं में धारण की गई आठ वस्तुओं को ध्यान से देखें तो इन्हें दो वर्गों में बाँटा जा सकता है। एक वर्ग है- धारदार शस्त्रों और नियंत्रणकारी आयुधों का- पैना दाँत, कुल्हाड़ी, चक्र, कमंद व अंकुश| यह वर्ग जीवन के पुराने अथवा पूर्व संचित संस्कारों को नष्ट-भ्रष्ट करने की प्रेरणा देता है। माने, ध्यान के धारदार शस्त्र से संस्कारों का नाश करो| दूसरा वर्ग है- सौम्य व सरस वस्तुओं का- गन्ना, मोदक व फूल वाला तीर। ये वस्तुएँ हमें निष्पाप, सरल, सरस, सकारात्मक अर्थात् भक्तिमय जीवन जीने को प्रेरित करती हैं| मधुर कर्म-व्यवहार करने की शिक्षा देती हैं, ताकि आगे नए और बुरे कर्म-संस्कार न बन सकें, जो विघ्नकारी हों। विघ्न गणपति हमें पूर्व संस्कारों को समाप्त करके और कुकर्मों से दूर रहकर ‘विघ्नहारी’ जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से श्री गणेश चतुर्थी के पावन अवसर की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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