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समाजिक विकृति का अभिशाप है गुड़गांव की त्रासदी

देश का सामाजिक भविष्य खतरे में हैं। जिस पीढ़ी पर हमारा भविष्य टिका है, वह तमाम असामाजिक विकृतियों और यौनिक हिंसा की शिकार हो रही है। उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है। वह घर में हो या अपने किसी करीबी की गोद में या फिर स्कूल में हर जगह असुरक्षित है। बीमार समाज की विकृत मानसिकता कई सवाल खड़े करती है। जिसकी वजह है कि गुड और बैड टच की बात सामने आने लगी है। इस तरह की व्यवहारिक ज्ञान भी मासूमों को दिया जाने लगा है। मासूमों के प्रति यौन हिंसा रोकने के लिए पास्कों जैसा एक्ट भी बेमतलब साबित हो रहा है। समाज नैतिक पतन की पराकाष्ठा लांघ रहा है। हरियाणा में एक के बाद एक घटनाएं खट्टर सरकार की नाकामी को बंया करती हैं। कानून-व्यवस्था को लेकर राज्य की हाईकोर्ट भी कटघरे में खड़ी कर चुकी है।

गुड़गांव के रयान इंटरनेशनल स्कूल के बाथरुम में मासूम प्रद्युम्न की हत्या ने देश के लाखों मां-बाप को सोचने पर मजबूर कर दिया है। उनका बच्चा अब स्कूल में भी सुरक्षित नहीं है। सामाजिक और नैतिक मूल्यों में तेजी से आती गिरावट कई सवाल खड़े किए हैं। कभी स्कूलों में बलात्कार, कभी सवालों का जबाब न देने पर निर्मम पिटाई के साथ कभी सेप्टी टैंक में गिर कर मासूमों की मौत, स्कलों बसों की रलों से भिड़त और बढ़ते सड़क हादसों में बेकसूर मासूमों की मौत ? आखिर क्यों। इस तरह की घटनाएं कम होने के बजाय तेजी से बढ़ रही हैं। जबकि कानूनी संरक्षण के लिए बनी संस्थाएं बौनी हो रही हैं।
मासूम बच्चों के साथ बढ़ती यौनिक हिंसा सोचने पर मजबूर करती है। मां-बाप अपनी भविष्य की उम्मीद को पढ़ने-खिलने के स्कूल भेजते हैं , लेकिन वहां से हंसते-मुस्कराते लौटने के बजाय मासूमों की मौत का पैगाम पहुंचता है। यह स्थिति सिर्फ गुड़गांव की त्रासदी नहीं पूरे भारत की है। गुड़गांव की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि दिल्ली के एक स्कूल में मासूम बच्ची के साथ चपरासी ने बलात्कार किया। इसी तरह मुंबई में जुलाई में स्कल जाते समय दो लड़कों को यौनिक हिंसा का शिकार बनाया गया था, जिसका असर यह हुआ कि दोनों ने बच्चों ने पवई लेक के पास पेप्सी में जहर मिला कर निगल लिया और उनकी मौत हो गयी। मुंबई में 2012 में पास्कों एक्ट के तहत सिर्फ दो मामले दर्ज हुए थे, लेकिन 2016 में इस तरह के 680 मामले दर्ज हुए। सोचिए हमारा समाज और हम कहां जा रहे हैं।
भारत में 2012 तक मासूमों के खिलाफ 38,172 यौन हिंसा की घटनाएं हुई थी जो दो साल बाद 2014 में बढ़कर 89,423 तक पहुंच गई। देश में मासूम बच्चों के साथ यौनिक हिंसा की घटनाएं दुनिया के दूसरे देशों से अधिक होती हैं। 16 साल की कम्र उम्र के बच्चों के साथ हर 155 मिनट पर एक बलात्कार होता है। जबकि 10 साल के बच्चों के साथ हर 13 घंटे में बलात्कार होता है। 2007 में बाल अधिकारों पर काम करने वाली एक संस्था ने चैंकाने वाला खुलासा किया था। संस्था की तरफ से जुटाए गए आंकड़ों में यह कहा गया था कि तीन बच्चों में दो बच्चा शारीरिक हिंसा का शिकार होता है जबकि दूसरा बच्चा भावनात्मक हिंसा का शिकार है। 69 फीसदी बच्चों के साथ शारीरिक हिंसा हुई जिसमें 54 फीसदी से अधिक बच्चे लड़के थे। परिवार में बच्चों के साथ 88 फीसदी शरीरिक और 83 फीसदी भावनात्मक हिंसा होती है। 53 फीसदी बच्चे यौन हिंसा झेलते हैं। भारतीय समाज में बढ़ती यौनंिहंसा की विकृति कड़े कानून बनाने की मांग करने लगी है। अपराधों की जघन्यता को देखते हुए पूर्व में बने कानून इसे रोकने में नाकाम रहे हैं। जिसकी वजह है कि समाज में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं जिसका फैसला भीड़ खुद सुनाने लगी है। गुड़गांव की घटना के बाद आक्रोशित अभिभावकों की भीड़ हिंसा पर उतर आयी और उसने शराब की दुकान में आग लगा दिया।
हरियाणा के रयान स्कूल में हुए इस हादसे से स्कूलों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल उठा है। इस घटना के बाद गठित एसआईटी की जांच में सुरक्षा को लेकर तमाम खामियां सामने आयी हैं। जिसमें स्कूल में लगे सीसी टीवी कैमरे खराब थे। बाथरुम कामन था जहां स्कूली बच्चे और स्टाप उसका उपयोग कर रहा था। स्कूल की दिवाले मानक के अनुसार नहीं बनायी गयी है। जांच में यहां तक खुलासा हुआ है कि स्कूल स्टाप के रखने में पुलिस वैरीफिकेशन नहीं कराया गया। गुड़गांव देश का सबसे आधुनिक शहर है जहां यह स्कूल स्थापित है। अभिभावकों से मोटी फीस लेने वाले स्कूल प्रबंधन ने सुरक्षा मानकों की अनदेखी क्यों की गयी। हलांकि स्कूल के दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन यह सब हादसे से पहले क्यों नहीं किया गया। प्रद्युम्न के मां-बाप के साथ पूरा देश सदमें हैं। एक भोला मासूम बेवजह विकृत मानसिकता का शिकार हुआ।
इस तरह के अपराधों के खिलाफ अमेरिका, पौलैंड और रुस में कड़े कानून हैं। जहां ऐसा कृत्य करने वाले व्यक्ति को नपुंसक बानने का प्रावधान है। मद्रास हाईकोर्ट ने बढ़ते बाल अपराधों को देखते हुए कुछ साल पूर्व सरकार से इस तरह का काननू बनाने की सिफारिश की थी जिसमें कहा गया था कि मनोवृत्ति के शिकार व्यक्ति को नपुंसक बना दिया जाना चाहिए। जबकि सुप्रीमकोर्ट भी इस पर अपनी राय प्रगट करते हुए कहा चुकी है कि इस तरह की प्रवृत्ति के लोग पशु हैं। अब वक्त आ गया है जब इस पर और अधिक कड़े कानून बनने चाहिए। मासूम बच्चे देश की भविष्य हैं, उनका भविष्य हर हाल में सुरक्षित होना चाहिए। समाज में बढ़ती यौनहिंसा की प्रवृत्ति का कारण गंदी मानसिकता भी है। इस तरह की विकृति मानसिकता के लोग मौजूद हैं जिनके दिमाग में हर वक्त सेक्स जैसी घृणित मानसिकता मौजूद रहती है, जिसकी वजह है कि इस तरह की घटनाएं हमारे आसपास तेजी से बढ़ रही हैं। हलांकि सभ्य समाज में नपुंसक बनाने वाला कानून बर्बर हो सकता है। मानवाधिकारवादी संगठन इसे वैयक्तिक स्वत्रंत्रता के अधिकार से जोड़ सकते हैं। लेकिन इसी सभ्य समाज में जब इस तरह के घृणित अपराध को अंजाम दिया जा रहा है तो उसका जबाबदेह कौन होगा। इस पर भी हमें सोचना होगा। हम सिर्फ कानून, टीवी डिबेटों और दूसरे माध्यमों से मासूमों के भविष्य को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं। अत्याधुनिक और प्रगतिशील विचारधारा की ढोल पीटना हमें बंद करना होगा। केंद्र और राज्य सरकारों को गुड़गांव की घटना को गंभीरता से लेना चाहिए। निजी और सरकारी स्कूलों में सुरक्षा मानकों की जांच की जानी चाहिए। जिससे मासूम बच्चों को इस तरह के यौनिक और दूसरी हिंसा से बचाया जाय। यह सराकरों नैतिक दायित्व है कि इस अनैतिकता पर प्रतिबंध लगाया जाए। सुरक्षा मानकों पर खरे न उतरने वाले स्कूलों और कालेजों को बंद किया जाए। जिससे भविष्य में होने वाली इस तरह की घटनाओं पर समय रहते कदम उठाया जाए।

प्रभुनाथ शुक्ल

लेखकः स्वतंत्र पत्रकार हैं

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