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ससुरी राजनीति बड़ी ही गंदी चीज है!

हमारे देश में विकास के वादे भी विकास की तरह राजनीति की औछी मानसिकता की उलझन में पीस रहें हैं। देश में विकास के नारे गांव, गलियों तक पहुँचते ही हाँफने लगते हैं। ऐसे में तारीफ़ दूसरे विकास की करनी पड़ेगी, जिसके पैरों में हाँफने की कोई झनझनाहट पिछले दिनों तत्काल नही दिखी। आज आज़ादी के बाद भी हमारे देश में विचारधारा की राजनीति बह रहीं हैं, ठीक वैसे ही जैसे गंगा जी करोड़ों रुपये खाने के बाद भी बह रही हैं। ऐसे में भैया राजनीति की एक नई-नवेली विचारधारा के अंर्तगत अगस्त महीने को ही तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा हैं। ऐसे में इच्छा तो कल्प रही हैं, कि कॉपीराइट का इस नई-नवेली विचारधारा पर केस का दूं। अलबत्ता मैं जो ठहरा आम आदमी, जिसके आम के अंदर की गिसली भी इन विचारधर्ताओं ने लूट लिया। फ़िर किस मुँह से शिकायत करता। जब इन विचारधर्ताओं ने मुझे चुनावी चॉकलेट बना लिया, तब कुछ नही कर सका। हाथ की कठपुतली बनाकर नचाते रहें, फ़िर भी हम नाचते रहे। फ़िर अब तो हमरे पास देखने के सिवाय कुछ नहीं। चाहे राजनीति वाले विचार तोड़कर प्रस्तुत करे। या फ़िर आइंस्टाइन बनकर नया विचार प्रतिपादित करे। लेकिन कभी-कभी दुःखती नस दबाने की कोशिश जब बेतुके अंदाज में ये राजनीतिज्ञ करते हैं, तो खून उबाल मरता हैं। लेकिन उसको ठंडा भी करना पड़ता है, नही तो अब तो मरीज अस्पताल प्रशासन की गलती से मर जाए, तो मानहानि का केस मरीज पर  लागाने का विचार ईजाद करने कुछ राजनीतिक सिपहसालार विदेशों की धूल खाक मार रहे हैं, और क़सम भी उसी माई की खाई हैं। जो अभी हाल में अपने लाल से अस्पताल की  लापरवाही के कारण दूर हो गई हैं, क्योंकि इन राजनेताओं को राजयोग बचाने के लिए सब कुछ करना हैं।
 
   ससुरी राजनीति में सुना था, सब जायज़ है, लेकिन अब पता भी चल गया। जब अपने गिरेबां को ढ़कने के लिए राजनीतिक हैसियतदारों ने नई तकनीक ईजाद कर ली। अभी बीते दिनों देश के प्रधानसेवक के मन के उद्गगार सुने थे, तब पता चला था, कि अगस्त महीने को क्रांति का महीना और भारत छोडो आंदोलन के लिए याद किया जाता है। भला तो  हो उस अस्पताल की लापरवाही की, जिसने 30 से अधिक बच्चों को काल के गाल में सुला दिया। तब पता चला, कि देश के ये हुसियार चंद सियासतदां वैज्ञानिक और ज्ञाता से कमतर नहीं हैं। तभी तो चंद मिनटों में अपने चोली पर आंच आते ही खोज करके बता दिया, कि अगस्त महीना ही साला दगाबाज है, जो नौनिहालों के संरक्षकों को राजनीति से भी बड़ा धोखा देकर चंपत हो जाता है, और जितना दुःख चुनावी वादे पूरे न होने का होता हैं, उससे करोड़ों टन भारी पत्थर संरक्षकों के कलेजे पर गिरा दिया है। हमनें भी सुना था, कि फ़रवरी महीने में बच्चे ज्यादा रोते है। लेकिन हमारे नेताओं ने जो खोज कर यह बताया कि, अगस्त महीने में बच्चे मरते ही ज्यादा हैं। उसके लिए क्या किया जाएं, वह शब्दों में नही, कहीं अन्यत्र बयां किया जा सकता है। अब तो आज़ादी के 70 बसन्त के बाद हमारे राजनीति की जो दिशा और दशा हो रही है। उसको देखकर तो ऐसा लगता है, कि ससुरी पहले प्रधानमंत्री की मन की बात सफ़ाई, गऱीबी को भागाने के पहले बिगड़ती राजनीतिक शैली और औछी हरकतों के साथ बोल-बच्चन पने से देश को स्वच्छ करना होगा। नही तो बेकसूर अगस्त पर आरोप लगते रहेंगे, और नेता अपनी चोली को बचाते रहेंगे। और बेगुनाह मरते रहेंगे, गुनहगार सत्ता के साथ चलकर मलाई चट करते रहेंगे।
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