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सियासी मुद्दों का पड़ेगा अकाल

इतिश्री अयोध्या कांड, सर्वधर्म सम्भाव! भारतीय सियासत से एक बड़ा मुद्दा गायब हो गया है। देश के सबसे जहरीले मसले को सुलझाने में जब हमारी समूची सियासी व्यवस्था विफल हुई, तब न्यायतंत्र के मंदिर ने ही रामलला के जन्मस्थान पर फैसले के रूप में समाधान निकाला। फैसले से देशवासी अब इतना जरूर समझ गए हैं कि राजनीतिक प्रसासों से सभी मसले नहीं सुलझ सकते। हां, इतना जरूर है उन मसलों की आड़ में सियासी दल राजनैतिक फायदा जरूर उठाते हैं। दशकों से राम मंदिर मुद्दे पर यही होता आया। पीढ़ियां गुजर गईं, उम्मीदें धूमिल हो गईं, वायदें चकनाचूर होते गए, दो धर्म आपस में लड़ते रहे। लेकिन इन सबसे बीच सियासी दलों ने जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी।
वैसे कायदे से देखा जाए तो आवाम को खुश रखना, उनकी खैरियत-सलामती का पहला जिम्मा हुकूमतों पर होता है। पर, कई बार हुकूमतें उन जिम्मेदारियों को निभाने में विफल हो जाती हैं। कमोबेश, राममंदिर का मसला भी कुछ ऐसा ही रहा, जिसे सुलझाने में सियासी दलों के हाथ-पांव
शुरू से फूलते रहे। आजादी के बाद से अब तक मंदिर मसले की आड़ में राजनीति होती आई, पार्टियों के लिए मंदिर निर्माण वोट बैंक का जरिया बना। मंदिर के नाम पर कई सरकारें बनीं, पार्टियों का जन्म हुआ, देशभक्त वाले संगठन खड़े हुए, कई नेता स्थापित हुए। लेकिन मसला जस का तस बना रहा।
गौरतलब है, निचली अदालतों में 135 साल जिरह होने के बाद जब केस दिल्ली स्थित सर्वोच्च अदालत पहुंचा, जहां प्रतिदिन तीन महिने तक सुनवाई हुई। आखिर में 9 तारीख मुकर्रर हुई जिसने ने दशकों पुराने रार को खत्म किया। मंदिर कब बनेगा इस बात का सपना देखते-देखते कई बुजुर्ग परलोक चले गए, लेकिन मंदिर का मसला वैसा ही रहा। भारतीय जनता पार्टी का जन्म मंदिर के नाम पर हुआ। प्रत्येक चुनावों में उन्होंने अपने घोषण पत्रों में जनता से मंदिर बनाने का वादा किया, लेकिन दूसरी पार्टियों द्वारा लगाई अड़चों के चलते उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। जनता ने भी उनका भरपूर साथ दिया। लेकिन किसी नतीजे पर पार्टी नहीं पहुंच सकी। भाजपा के अलावा उत्तर प्रदेश के प्रमुख दल सपा-बसपा ने भी खूब सियासत की। फैसले के साथ ही फिलहाल मंदिर मुद्दा सियासी दलों के घोषणा पत्रों से हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो गया है।
एक सवाल मन में उठता है कि मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के सुनाए गए निर्णय को निर्णय किसी भी सूरत में नहीं कह सकते। उन्होंने निर्णय नहीं, बल्कि मसले का समाधान किया है। गौरतलब है, बात अगर 1947 से लेकर 2019 तक की जाए, तो समाज की सोच में बड़ा परिवर्तन आ चुका है। अब कोई बेवजह के मसलों में उलझना नहीं चाहता। हिंदुस्तानी लोग इस बात को ठीक से समझ चुके हैं कि देश की सियासत ने उन्हें लंबे समय तक मंदिर के नाम पर बांटकर रखा। सुप्रीम कोर्ट से निकले इस समाधान के बाद शांति-सौहार्द की एक अच्छी तस्वीर देखने को मिली। पूरी दुनिया की नजरें शनिवार को सुप्रीम कोर्ट पर थीं। कहते हैं किसी भी देश की नींव संविधान, लोकतंत्र और भाईचारे पर टिकी होती है। फैसले के दिन इन तीनों की परीक्षा होनी थी। लेकिन जब फैसला सुनाया गया तब हिंदुस्थान की अटूट एकता और अखंडता जरा भी नहीं हिली। सभी पक्षों ने अक्षुण्णता को बनाए रखने में अपनी बड़ी भूमिका निभाई।
सियासत ने भले ही देश को बांटने की कोशिशें की हों, पर यह वही अखंड भारत है, जिसके बगीचों में आज भी एक साथ खुशबूदार सुगंधित रंगों के फूल खिलते और फूलते हैं। सोच के विपरीत फैसले पर भी मुस्लिम पक्षकारों ने स्वागत किया। मुस्लिम वर्ग ने खुशी में हिंदुओं को मिठाईयां खिलाई। इस तरह की तस्वीरें समूचे भारत से देखने को मिली। उच्च अदालत के फैसले के बाद पूरे देश में जो आपसी एकता देखने को मिली, वह शायद आजादी के बाद कभी देखने को नहीं मिली हो। मंदिर जैसे नासूर मसले का अंत हो जाने के बाद हिंदुस्थान की आपसी एकता एक बार फिर अपने मूल सनातनी रसूलों की तरफ लौटती दिखाई देने लगी है।
वोटबैंक की राजनीति कहें, या स्वार्थ की सियासत, मंदिर के नाम पर दो धर्मों की एकता को हमेशा कुत्सित करने के प्रयास किए गए। गंदी सियासत का ही नतीजा रहा जिसे न समझने की भूल वामपंथी, कांग्रेसी और मुसलमान करते आए। अच्च अदालत ने 135 वर्ष की लड़ाई में उलझा अयोध्या राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक के केस को फिलहाल समाप्त कर दिया है। पांच एकड़ जमीन मुस्लिम पक्षों को देने की बात कही गई है। अब जिम्मेदारी केंद्र सरकार की बनती है कि उसे दोनों पक्षों का ख्याल रखकर आगे बढ़े। मंदिर का निर्माण भी हो, और उचित स्थान पर मस्जिद भी बनाई जाए। धार्मिक, राजनैतिक, और सामाजिक रूप से संवेदनशील हो चुके मुकदमे में चलातार चालीस दिनों की मैराथन सुनवाई में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, एस अब्दुल नजीर और अशोक भूषण ने पंचपरमेश्वर के रूप में जो निष्पक्ष तरीके से समाधान निकाला है, उस पर मात्र ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन के अध्यक्ष असबुद्दीन ओवैसी जैसे एकाध लोगों के अलावा किसी को कोई एजरात नहीं हुई।
दरअसल, ओवैसी टाइप के लोग अब भी देश को धर्म के नाम पर गुमराह करना चाहते हैं। लेकिन उनकी दाल अब गलने वाली नहीं? अगर ऐसे लोग अड़ंगा नहीं अड़ाए होते, तो मंदिर निर्माण को तपस्या के रूप में लेने वाले योद्वा बाला साहेब ठाकरे, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के प्रयास कबके सफल हो गए होते। मंदिर बनाने की अलख जगाने वाले इन लोगों के प्रयासों पर आधुनिक युग के नेताओं ने पानी फैरने का काम किया। इसलिए मंदिर बनाने का जो रास्ता सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्तर से साफ किया है उसका श्रेय किसी राजनीति पार्टी को नहीं दिया जाना चाहिए। अच्छा हुआ, मंदिर का फैसला कोर्ट से हुआ जिसे सर्वधर्म सम्भाव ने माना। अगर खुदा-न-खास्ता यह निर्णय किसी सियासी दल द्वारा किया गया होता, तो शायद नहीं माना जाता। उससे निश्चित रूप से देश में अराजकता का माहौल उत्पन्न होता। निर्णय पर राजनीति होती।

डाॅ0 रमेश ठाकुर
पताः 5/5/6, द्वितीय तल, गीता कालोनी, दिल्ली-110031
संपर्कः 9350977026

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