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सीवर की सफाई में मरते सफाई कर्मी

देश की आजादी का झण्डा फहराने के मात्र दो ही दिन बाकी थे कि सीवर की सफाई के दौरान एक बार फिर 12 अगस्त 2017 को देष की राजधानी के आनंद विहार थानान्तर्गत ईलाके में स्थित अग्रवाल फन सिटि माॅल के टीटमेंट प्लांक टैंक की सफाई करते जहरीली गैस की चपेट में आकर दो सगे भाईयों की मौतो ने एक बार फिर ऐसे समाज को झकझोर कर रख दिया। जिन्हेें बड़ी मजबूरीयांे में सीवर मौत के कुओं जहरीले (गटरो में) उतरने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
विडम्बना तो यह है कि सीवर की सफाई के दौरान मौत के गटरो में मरते सफाई कर्मियों की असहम्ता में छह दिन पुर्व ही 6 अगस्त 2017 को दक्षिणी दिल्ली में लाजपत नगर इलाके में जल बल बोर्ड के सीवर की सफाई करने के दौरान 3 मजदूर अन्नू (28) जोगेन्द्र (32) व एक और अन्य (32) वर्षीय मजदूरो की दर्दनाक मौतो से एक बार फिर सीवरो की सफाई के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों पर सवालिया निषान खड़ा हो गया है। आंकड़ो की गवाही है कि पिछले सौ दिनों में 39 लोगों की सीवर सफाई के दौरान मौते हुई। इसके अलावा 5 वर्षो के आंकड़ों में 7086 सफाई कर्मियों की इन्ही सीवर के गटरों में मौते हो गई।
इतना ही नहीं 1993 से आज तक 16 वर्षों में 1675 लोगों की सीवर की सफाई के दौरान जहरीली गैस से दम घुटने से मरने की घटनाये असहम्ता के प्रतीक है। विडम्बना तो यह है कि इस तरह सीवरो की सफाई के दौरान हर रोज 2-3 तथा हर माह 20 सफाई कर्मियों की मौते अनवरता से जारी है, उदाहणार्थ गह माह 15 जुलाई 2017 इसी दक्षिणी दिल्ली के छिटारनी इलाके सप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे 4 सफाई कर्मियों की मौते हुई। इसके बाद 2 दिन बाद ही लोनी (उ0प्र0) के आर्य नगर में टैंक की सफाई के दौरान अरविन्द व बिजेन्द्र नायक 2 युवको की मौते हो गई इससे पूर्व 11 नवम्बर 2016 को बसन्त कुंज में एक सफाई कर्मी की सीवर की जहरीली गैस से दम घुटने से दर्दनाक मौत हो गई थी अतः इस तरह अनवरता से सीवर के गटर मौत के बनते कुओं के संदर्भ में राष्ट्रीय सहारा ने अपने सम्पादकीय लेखन में बड़ी सटीकता से लिखा है कि साफ करते हुए सफाई कर्मीयों की मौते इसलिए ज्यादा मुंह चिढ़ाती है कि ‘देष बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है’ के मायावी स्लोगन से देष का हर हिस्सा भरा पड़ा है । लेकिन जिस जमात को मजबूती की दरकार है, वह बेमौत मारा जा रहा है। इसके लिए जरूरी है इससे इतर अत्याधुनिक मषीनों व तकनीक को बढ़ावा देने की महती जरूरत है। ज्यादातर मौतें समुचित उपकरणों के अभाव में ही होती है, सो इस कमजोर नस को दूर करने की जरूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तंत्र इस बारे में संजीदगी से मंथन करेगा।
क्योंकि सीवर के गटरों की जहरीली गैसों से बचाव/विषेष जानकारी (हिदारक) पर प्रखरता न होने के कारण ये कोई पहली असहायघटनाएं नही है। इसकी परिपेक्ष्यताओं पर नहर डाली जाए तो सीवरों में ऐसी बे-मौतों की घटनाएं पिछले 25-30 वर्षों से सर्वाधिकता से दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। क्योंकि बिना प्राथमिक सुरक्षाउपकरणों के सीवर के मैनहोलों में घुसकर अपनी जान जोखिमों मंे डालकर सफाईकर्मी हृदयविदारक (दर्दनाक) मौतों कें षिकार हो रहे हैं, जबकि न्यायापालिकाएं सीवर सफाईकर्मियों के कल्याण में कानूनी व्यवस्थाओं व सुरक्षाउपकरणों की मुहैयृया करने के दिषानिर्देष जारी करते रहे हैं। इस संदर्भ में 15 फरवरी 2006 को गुजरात उच्च न्यायालय व 1 दिसम्बर 2007 को दिल्ली हाईकार्ट द्वारा सीवर सफाईकर्मियों की सुरक्षाउपकरणों को देना अनिवार्य आदेष जारी किए थे। किन्तु संबंधित विभागों, निगमेां व बोर्डों में न्यायालयों के आदेषों का उल्लंघन पाया गया तथा वे सुरक्षा दिषा निर्देषों केा कार्यान्वित करने में गम्भीर नजर नहीं आए जिसका नतीजा यह हुआ कि 2002 में राष्ट्रीय राजधानी में ही 36 सीवर सफाईकर्मियों की जहरीली गैस से मौतें हुई।
इसके अलावा 20 अगस्त 2008 को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा भी सीवर सफाईकर्मियों की दषाओं के संबंध में मानवी गरिमा के अनुकूल सीवर सफाईकर्मियों की कार्य दषा के लिए प्रस्ताव जारी करने का निर्देष जारी किया था। किन्तु उक्त निर्देषों पर व्यवहारिक कदमों की लोष्ठवता में अगले वर्ष 2009 में ही 22 सीवर सफाईकर्मियों को मैनहोल ही निगल गए। जबकि इससे पूर्व भी सीवर सफाईकर्मियों की सुरक्षा के संदर्भ में हाई बाॅम्बे ने वर्ष 1996 में सीवरोें में काम करने वाले सफाईकर्मियों को प्राथमिक सुरक्षाउपकरणों (मास्क, बेल्ट, आॅक्सीजन एवं मापदण्ड तजंत्र) आदि का कानून अनिवार्य किया था। इसी के साथ 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सीवरों में कार्यरत सफाईकर्मियांे की सुरक्षा हेतु दिल्ली जल बोर्ड को विषेष हिदायतें दी थी। इस संदर्भ में उच्च न्यायालय ने भी 6 अगस्त 2008 को कहा था कि मैनहोल की सफाई पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिषा निर्देषों का पालन करने के लिए सरकार को आदेष नहीं जा सकाता, क्योंकि इस तरह के आदेष व्यवहारिक नहीं होते। पूर्व मुख्य न्यायाधीष के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने यह कहते हुए पीपल्स युनियन बोर्ड और दिल्ली सरकार ने आष्वस्त किया कि वे मानवाधिकार आयोग के निर्देषों का पालन करेंगे और सफाईकर्मियों को सुरक्षा के सभी उपकरण मुहैय्या कराएंगे। याचिका में मांग की गई थी कि दिल्ली सरकार को यह आदेष दिया जाए कि वह सीवर सफाई पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिषा निर्देषों का पालन करें, क्योंकि सीवर में जहरीली गैसों के कारण सफाईकर्मी मौतों के षिकार हो रहे है।
राजधानी में सीवर साफ करते समय सफाईकर्मियों की अनवरत हो रही मौतों के बारे में उच्च्तम न्यायालय के तत्कालीन कार्यकारी मुख्य न्यायाधीष, जस्टिस ए.के.सीकरी, राजीव सहाय एडला की खण्डपीठ ने उक्त मामले के संबंध में दिल्ली जल बोर्ड एवं दिल्ली नगर निगम को फटकार लगाते हुए 21 अगस्त 2012 को कहा था कि यह गम्भीर विषय है किवे अपने कर्मचारियों को वीवरन सफाई के दौरान पहनने के लिए स्पेषल सूट एवं जहरीली गैस से बचाव के लिए जीवन-रक्षक उपकरण तक मुहैय्या नहीं करा रहे हैं। इसके अतिरिक्त न ही इस तरह के काम करने वाले कर्मचारियों के कल्याण के लिए भी दोनों एजेंसियांे ने कोई कार्रवाही नहीं की, जबकि इस संबंध मं अदालत 2008 में ही आदेष दे चुकी है। ऐसे में अदालत को समझ नहीं आ रहा है कि सिविक एजेंसी ऐसे रवैये क्यों अपनाएं हुए है? उच्च न्यायालय नेयह टिप्पणी नेषनल कैंपेन फाॅर डिग्निटी एण्ड राईट्स आॅफ सीवरेज एण्ड अलाईड वर्कर नामक एनजीओ की तर्ज से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की है।
अदालत द्वारा गठित सीवर सुरक्षा कदम पर भी विषेष कदम नहीं उठाये जाते है जबकि न्यायपालिकाएं अनवरता से इन्हें अमल में लाने पर गम्भीरता से आदेष जारी करती है।
अतः इस तरह सीवर सफाई में बे-मौत की दिषायें दर्षाती है कि बिना प्राथमिक सुरक्षा उपकरणों के सीवर के मैनहोलों में घुसकर अपनी जान जोखिम में डाले जिससे वे दर्दनाक मौतों के षिकार हो जाये यह विडम्बना नहीं बल्कि शर्मनाक चलन है जिसके लिए सीवरों मंे बे-मौतों की व्यथा के लिए कानूनी व्यवस्था में कड़ी दुरूस्तता जरूरी है। अतः क्या यह विडम्बना नहीं कि उच्च न्यायालयों के दिषा निर्देषों के बाद भी सरकारें सीवर सुरक्षाओं से घनी दूर है।
इसके अलावा भी हाईकोर्ट बाॅम्बे ने वर्ष 1996 में सीवरों में काम करने वाले सफाईकर्मियों को प्राथमिक सुरक्षा उपकरणों (मास्क, बेल्ट, आॅक्सीजन एवं मापदण्ड तंत्र) आदि का कानूनी अनिवार्य किया था। इसी के साथ 2000 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी सीवरों में कार्यरत सफाईकर्मियों की सुरक्षा हेतु दिल्ली जल बोर्ड को विषेष हिदायतें दी थी।

(लेखक सफाई कामगार संगठन के संस्थापक है)

‘‘मलूक चन्द बैनीवाल’’
28/67 विष्वास नगर, गली नं. 15, शाहदरा दिल्ली-110032
मो. -92313283644

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