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सेना का सम्मान पड़ा है चरमपंथ के चरणों में

ये कैसा परिवर्तन है खुद्दारी के आचरणों में, सेना का सम्मान पड़ा है चरमपंथ के चरणों में, किसका खून नहीं खौलेगा सुन पढ़कर अखबारों में, सिंहों की गर्दन कटवा दी चूहों के दरबारों में…। हरिओम पवार की एक प्रसिद्ध कविता का यह अंश पिछले महीने की 28 अगस्त को जम्मू-कश्मीर में हुए चरमपंथी हमले पर चोट है। इसी हमले में शहीद एएसआई अब्दुल रशीद की पांच साल बेटी जोहरा की मदद के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के ओपनिंग बल्लेबाज गौतम गंभीर आगे आए हैं। वे आजीवन जोहरा की पढाई का खर्च उठायेंगे। इससे पहले भी गंभीर सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ जवानों के परिवारों की मदद के लिए आगे आए थे। उन्होंने शहीद 25 जवानों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने का ऐलान किया था।
बेशक, गौतम गंभीर की यह पहल प्रशंसनीय है। लेकिन, आखिर कब तक चरमपंथी हमलों में हम अपने जवान खोते रहेंगे ? कब तक शहीद हुए जवानों के बच्चें खून के आंसू रोते रहेंगे ? और कब तक बिलखते बच्चों के मासूम चेहरों को देखकर गौतम गंभीर जैसे लोग पिघलकर आगे आते रहेंगे ? आज चरमंपंथ से केवल भारत ही पीड़ित नहीं है। यह एक अंतरराष्ट्रीय समस्या बन चुका है। इसे खत्म करने के लिए लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। उसे हम या तो हथियार के बल पर बदलें या किसी और तरीके से। इससे लड़ने का सबसे बेहतर तरीका यही है। हमारा संविधान और कानून चरमपंथ से लड़ने के लिए पूरी तरह सक्षम है। नए कानून की जरूरत नहीं है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि मौजूदा कानूनों को ही सख्ती से लागू किया जाए। चरमपंथ को गैर जमानती अपराध बनाया जाए। इन मामलों के निपटारे के लिए समय सीमा तय की जाए। मुंबई में हमला होने के बाद पुलिस को वहाँ पहुँचने में समय लगा और उनके पास लड़ने के लिए उम्दा हथियार और साजो सामान नहीं थे। इसलिए सुरक्षा बलों को आधुनिक साजो सामान से लैस किया जाए। चरमपंथ से निपटने के लिए हमारी सरकार को और सख्त होने की जरूरत है। देश के नेताओं को आपसी खीचतान छोड़कर चरमपंथ जैसे मुद्दे से निपटने के बारे में सोचना चाहिए। चरमपंथ को रोकने के लिए सरकार को पुलिस, सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों को और चुस्त-दुरुस्त करना चाहिए। वहीं नेताओं को मिलने वाली सुरक्षा व्यवस्था को भी ख्त्म करनी चाहिए क्योंकि पुलिस और सुरक्षा बल के जवान तो उन्हीं की सुरक्षा में ही लगे रहते हैं। ऐसे में आम आदमी कैसे सुरक्षित रहेगा ? नेताओं को अगर अपनी जान की इतनी ही चिंता है तो उन्हें नेतागीरी छोड़ देनी चाहिए।

देवेन्द्रराज सुथार

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