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हाँ मैं सृष्टि ही प्रकृति हूँ

हाँ मैं सृष्टि ही प्रकृति हूँ , खुद को हर रूप में जान
अवतरित करती हूँ , आदि शक्ति बनकर मैं।
लुटाती हूँ ममत्व ,सहलाती आशीष प्यार और दुलार
रखती हूँ संसार का भार ,उत्पति की संयोगिनी।
बनती हूँ सुख दुख की साथी, निभाती निस्वार्थ निश्छल
वेद वेदाग की ज्ञाता सरस्वती, खुद को हर किरदार की।
घर घर में रहती बन लक्ष्मी, करती खान पान सौंदर्य को
संभाल यूं बनती जीवन रश्मि, तो कभी प्रियंका सी धरती पर।
सौंदर्य का बनाकर जीवन में, देती हूँ संसारी जीवन में प्रताड़ना
रिश्तों और गृहस्थी में बिछड़ना, तालमेल मिटाकर।
गृहस्थ की गाड़ी को, बनकर काल रात्रि
बखूबी मिटाना जानती हूँ, हाँ मैं सृष्टि ही प्रकृति हूँ।
खुद को हर रूप में जान, सिलती हूँ सुख दुख की डोरी
जो कभी गांठ बन उलझ जाती, उसे भी सुलझाती हूँ बन सिद्ध धात्री।
जिंदगी की उलझनों को, बनाती हूँ असंभव को संभव
लेकर बैठती हूँ गीता पुरान के श्लोक को।
भारती उजाड़ना भी जानती हूँ
हाँ मैं सृष्टि ही प्रकृति हूँ।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राजस्थान

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