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हिमाचल में टिकट वितरण और नेतृत्व के मुद्दे पर पिछड़ गई है भाजपा

हिमाचल में विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा केंद्रीय चुनाव समिति की शनिवार को दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में साढ़े तीन घंटे चली बैठक में 25 से ज्यादा सीटों पर सहमति नहीं बन पाई थी. कहा गया कि रविवार को दोपहर बाद घोषणा कर दी जायेगी. लेकिन दिन भर चले बैठकों के दौर में भी कोई हल नहीं निकला और शाम होते-होते खबर आई कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने निर्धारित कार्यक्रम के लिए गुजरात निकल गये हैं और सीटों के निर्धारण एवं तालमेल का काम पार्टी महासचिव राम लाल को सौंप गये हैं और सोमवार को लिस्ट जारी होने की संभावना जतायी गई लेकिन सोमवार शाम तक भी कोई सूची जारी नहीं हो सकी है और कई सीटों को लेकर पेंच फंसा हुआ है. माना जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिना किसी चेहरे के चुनाव लड़ना चाहते हैं और अपने चहेते जे. पी. नडडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपना चाहते हैं लेकिन ऐसे में नेता विपक्ष प्रेम कुमार धूमल ने साफ कह दिया है कि फिर उन्हें चुनाव लड़ने की जरूरत ही क्या है? पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अधिकतर सीटों पर सहमति बन चुकी है लेकिन कुछ सीटों पर पार्टी चर्चा कर रही है और जिसे मुख्यमंत्री बनाया जाना है, उसकी राय को अधिक महत्व दिया जाना तय है लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता शांता कुमार और जे. पी. नडडा अपने संमर्थकों को टिकट दिलाने पर अड़े हैं और मुख्यमंत्री के चेहरे के बिना सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ने के लिए दबाव बना रहे हैं, लेकिन प्रदेश भाजपा की राय है कि चुनाव प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में लड़ने से ही पार्टी को आशातीत सफलता मिल सकती है और वैसे भी कुछेक पार्टी कार्यकर्ताओं और दो-तीन विधायकों के अलावा कोई भी नडडा को मुख्यमंत्री बनाना नहीं चाहता और यदि पार्टी बिना चेहरे के चुनाव लड़ती है तो यह पार्टी के लिए यह कदम घातक सिद्ध हो सकता है.
हालांकि यह माना जा रहा है कि कांग्रेस की मौजूदा सरकार के खिलाफ माहौल है और चुनावों से पूर्व कांग्रेस के कई नेता भाजपा में शामिल हो सकते हैं और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुखराम के सुपुत्र और सरकार में अब तक मंत्री रहे अनिल शर्मा ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है और एक अन्य मंत्री जी. एस. बाली भी कई अन्य नेताओं के साथ भाजपा में जा सकते हैं, इसलिए भी पार्टी की लिस्ट जारी होने में दिक्कत आ रही है लेकिन आज प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने कहा कि अगले 24 घंटों में लिस्ट जारी हो जायेगी और जिनकी सीटों पर कोई अन्य दावेदार नहीं है उन्हें सूचित कर दिया गया है.
पहले बताया जा रहा था कि उम्मीदवारों की सूची शनिवार को जारी कर दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।कई सीटों पर प्रत्याशियों को बदलने पर भी सहमति बनी है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती का कहना है कि नाम तय कर लिए गये हैं और घोषणा होना बाकी है लेकिन कांग्रेस छोड़कर आये कांग्रेसियों को टिकट देना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है.
कहा जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल इस बार सुजानपुर से चुनाव लड़ेंगे. पिछली बार उन्होंने हमीरपुर सीट से चुनाव लड़ा था. सुजानपुर के विधायक नरेंद्र ठाकुर को हमीरपुर से उतारा जाएगा. पिछली बार पार्टी का ही बागी चुनाव जीतकर कांग्रेस में शामिल हो गया था. अत: इस बार भाजपा एक-एक सीट पर गुणा-भाग कर रही है. सूत्रों के अनुसार कसुंपटी सीट से इस बार भाजपा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साले की पत्नी ज्योति को मैदान में उतारेगी. उन्होंने हाल ही में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी. लेकिन इससे भाजपा के बागियों की संख्या बढ़ सकती है. 2012 के चुनावों में पार्टी हाईकमान ने प्रेम कुमार धूमल की रात को कम तरजीह दी थी जिसके कारण भाजपा के 18 बागी ज्यादा वोट ले गये थे और पार्टी को हराने में उनकी भूमिका रही थी और 2 बागी जीतकर कांग्रेस में शामिल हो गये थे. इस बार भी कांग्रेस से भाजपा में आये नेताओं को टिकट दिये जाने से नाराज नेता बागी होकर चुनाव में उतरने का मन बना रहे हैं. दूसरी तरफ भाजपा आलाकमान नेतृत्व के मुद्दे पर प्रदेश की जनता को अंधेरे में रखकर यदि चुनाव लड़ता है तो पार्टी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की ऱणनीति पर काम रहे हैं लेकिन हिमाचल में उन्हें यह रणनीति भारी पड़ सकती है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को समझना चाहिए कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड एक समय में एक ही प्रदेश थे और दोनों करीब हैं जबकि हिमाचल पंजाब के करीब रहा है और हिमाचल की काफी बड़ा हिस्सा तो 1965 तक पंजाब की ही हिस्सा था और पंजाब में पार्टी की विधानसभा और अभी हाल ही में गुरदासपुर लोकसभा चुनावों में दुर्गति किसी से छिपी नहीं है. भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और विश्वसनीयता लगातार कम हो रही है. प्रदेश की जनता पैट्रोल और डीजल पर लगाई गई गैरबाजिव एक्साइज डयूटी, मंहगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर केन्द्र की नाकामी से नाराज है और जनता को अब समझ में आने लगा है कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार गिर रही है तथा यह सरकार केवल जुमलों का विकास कर रही है, हकीकत इससे परे है.
कांग्रेस की स्थिति डांवाडोल है और पार्टी में बिखराव है. इसके ज्यादातर नेता और यहां तक कि मंत्री पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं लेकिन नेतृत्व और टिकटों के मामले में वह भाजपा से आगे निकल गई है. कांग्रेस ने मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को चुनावों में खुली छूट दे दी है और कांग्रेस ने यही रणनीति पंजाब में अपनाई थी और उसे सफलता हाथ लगी थी लेकिन हिमाचल की मामला अलग है. यहां कांग्रेस की सरकार है जिससे प्रदेश की जनता नाराज है. कांग्रेस की मौजूदा सरकार कई मोर्चों पर नाकाम रही है लेकिन वीरभद्र सिंह सरकार पिछले डेढ साल से चुनाव की तैयारी कर रही है और अंतिम वर्ष में उसने कर्मचारी वर्ग को खुश करने के लिए कई बड़े फैसले किये लेकिन हिमाचल की राजनीति में कर्मचारी वर्ग का बड़ा दखल रहता है जिसके चलते सरकार बनाने में इनकी भूमिका से इन्कार नहीं क्या जा सकता, लेकिन वीरभद्र सिंह सरकार की खस्ता हालत किसी से छिपी नहीं है और उसे अपने कर्मचारियों को एरियर आदि के भुगतान के लिए भी कर्ज लेना पड़ता है जबकि भाजपा की पिछली सरकार के समय स्थिति ठीकठाक थी. दूसरा वीरभद्र सिंह अपनी आय संबंधी मामलों को लेकर लगातार भाजपा के निशाने पर रहे हैं और कई मुकदमों का सामना कर रहे हैं लेकिन नेतृत्व तथा टिकट वितरण में कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें खुला हाथ देकर उनकी स्थिति मजबूत कर दी है जबकि भाजपा पिछले पांच दिनों में नेतृत्व और टिकटों का मसला नहीं सुलझा पाई है.
हिमाचल प्रदेश साक्षरता तो मामले में दूसरे प्रदेशों से काफी आगे है और यहां का वोटर भी काफी जागरूक है. हिमाचल में केवल दो जातियों ब्राह्मण और राजपूत का ही प्रभुत्व है और इन्हीं की बदौलत यहां सरकार बनती है. हालांकि यहां जातिवादी राजनीति को तरजीह नहीं दी जाती. इसके बावजूद न्यू हिमाचल कांगड़ा, ऊना, हमीरपुर और बिलासपुर भाजपा के धाकड नेताओं शांता कुमार, जगदेव सिंह और प्रेम कुमार धूमल के कारण भाजपा की गढ़ माना जाता है लेकिन पिछली बार भाजपा की हार की कारण टिकट वितरण था जिसमें शांता कुमार समर्थकों को अधिक टिकट मिलने से जमीनी कार्यकर्ताओं और धूमल के करीबियों की अनदेखी की गई थी और भाजपा के बागियों ने ही पार्टी को हरा दिया था लेकिन इस बार ऐसा लगता है कि पार्टी सभी मुद्दों पर विचार करने के बाद ही टिकट वितरण कर रही है लेकिन नेतृत्व के मुद्दे पर प्रदेश की जनता को अंधेरे में रखने से पार्टी को नुकसान होगा.

विजय शर्मा

 

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