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हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बड़ी पार्टियों के लिए बेरोजगारी नहीं है कोई बड़ा मुद्दा

चुनावी महाभारत में दोनों ही बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के लिए बेरोजगारी कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. रोजगार की तलाश में बैठे लाखों बेरोजगार युवाओं को पार्टियों से यह उम्मीद होती है कि वह उनके मुद्दों पर गहराई से विचार करके उनका समाधान प्रस्तुत करें. युवा मतदाताओं का प्रदेश की सरकार बनाने में अहम योगदान है और उन्हें एकजुट होकर बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्या पर अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल करना चाहिए कि अगर वह चुने जाते हैं तो बेरोजगारी समाप्त करने के लिए उनकी सरकार क्या करेगी? हिमाचल प्रदेश में कुल जनसंख्या का करीब 50 फीसदी युवा शक्ति है. प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों का आंकड़ा करीब साढ़े नौ लाख तक पहुंच गया है और वर्तमान में बेरोजगारों की संख्या 10 लाख पार कर चुकी है. 71 लाख की कुल आबादी में से 10 लाख युवाओं का बेरोजगार होना गंभीर चिंता का विषय है. इस बार विधानसभा चुनाव में मतदान करने वालों में 29.5 प्रतिशत युवा मतदाता हैं. इनमें 40,567 युवा तो पहली बार अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे. अढ़ाई लाख युवाओं की आयु 18-19 साल है और 20 से 29 साल तक आयु वर्ग के युवा मतदाताओं की संख्या 12.3 लाख है. 30 से 35 वर्ष आयु वर्ग के भी करीब 10 लाख मतदाता हैं. इस प्रकार करीब 25 लाख युवा मतदाता इन चुनावों में अपना मतदान करेंगे. बेरोजगारी का मुद्दा इनके लिए अहम है लेकिन दोनों ही बड़ी पार्टियां बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने की बात तो करती हैं लेकिन यह कैसे होगा, किसी के पास कोई ठोस योजना नहीं है. उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद युवा रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे है. प्रदेश में केवल निजी कॉलेज एवं विश्वविद्यालय खोल देने भर से युवाओं का विकास नहीं हो जायेगा. केन्द्र की भाजपा सरकार भी रोजगार के मोर्चे पर विफल रही है और यही हाल राज्य सरकार का है. दोनों पार्टियां एक-दूसरे पर दोषारोपण कर मुद्दे से बचकर निकल जाना चाहती हैं. कांग्रेस बेरोजगारी भत्ते का खूब प्रचार कर रही है. बेरोजगारी भत्ता देने का वादा कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनावों के वक्त किया था लेकिन पार्टी को चुनावी वर्ष में इसकी याद आई और मई-जून के बाद करीब 16 हजार लोगों को देने का दावा किया जा रहा है. अंदाजा लगाया जा सकता है कि 10 लाख बेरोजगारों की फौज को इससे क्या राहत मिली होगी और इसमें भी कई शर्तें जोड़ दी गईं थी. प्रदेश में मामूली औद्योगिक निवेश से हालत जस की तस बनी हुई है. कांग्रेस नोटबंदी तथा जी.एस.टी. को इसके लिए जिम्मेदार बता रही है. भाजपा ने अपने विजन डाक्युमेंट में बेरोजगारी के सम्पूर्ण समाधान की बात कही है लेकिन यह कैसे होगा, इसकी कोई रूपरेखा और ठोस आधार नहीं है. केवल जिलों में रोजगार मेले लगा देने और नए पर्यटन गांव विकसित कर देने मात्र से बेरोजगारी से नहीं निपटा जा सकता है. भाजपा के घोषणा पत्र में इस बात का जिक्र है कि प्रदेश में लगने वाले उद्योगों में 70 की बजाय 80 फीसदी हिमाचली कर्मचारियों का अनिवार्यता की जायेगी, लेकिन हालत यह है कि प्रदेश के किसी भी कारखाने में 70 प्रतिशत हिमाचली नहीं हैं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के कर्मचारी बड़े पैमाने पर तैनात हैं और यह सारा खेल सरकारी मिलीभगत से हो रहा है.
सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो दिसम्बर 2016 तक हिमाचल में 8,28048 बेरोजगार युवा थे जिनकी संख्या अब करीब साढे नौ लाख हो चुकी है. प्रदेश सरकार के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 2013-14 में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 10,12,602 थी और 2013-14 और 2014-15 में प्रदेश सरकार ने क्रमश: करीब 585 और 575 लोगों को सरकारी नौकरी प्रदान की और प्रदेश में निजी कारखाने में करीब 7500 और 6781 लोगों ने रोजगार हासिल किया है. इसके बाद चुनावी वर्ष में सरकार ने ठेके पर काम करने वाले तथा दैनिक वेतनभोगियों को पक्का करने किया है तथा कुछ अन्य भर्तियां की हैं लेकिन वह चुनावी वर्ष में प्रदेश की जनता एवं युवाओं के दिया जाने वाला छलावा भर है. इसके बाद 2014-15 में 1,77,309 और 2015-16 में 1,99,892 युवक-युवतियों ने रोजगार के लिए पंजीकरण करवाया है. प्रदेश में लगभग 80,000 पोस्ट-ग्रेजुएट, 1,40,000 ग्रैजुएट और 7,00,000 से ज्यादा मैट्रिक, उससे कम या अधिक शिक्षित युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. प्रदेश मे आज लाखों ऐसे युवा हैं, जो डिग्री हाथ में लेकर घूमते हैं, लेकिन उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता है. हजारों-लाखों की तादाद में हिमाचली युवा मजबूरी में घर छोड़कर अन्य राज्यों में नौकरी कर रहे हैं. बहुत से युवक अपने सपने को कुचल कर उच्च डिग्री होने के बावजूद अपनी योग्यता से कम पर नौकरी कर रहे हैं. युवकों में पढ़-लिख कर बेकार होने का भय ही उन्हें नशे की ओर धकेल रहा है और नशे की हालत में यह युवक कब अपराध की दलदल में धंस रहे हैं, स्वयं उन्हें भी इसका आभास नहीं हो रहा है.
सरकार एवं पार्टियां स्व-रोजगार की बात करती हैं लेकिन क्या बैंक किसी को भी आसानी से बिना पूरी कागजी कार्रवाई के कर्ज उपलब्ध करवाते हैं. स्व-रोजगार की कठिन राह के चलते ही प्रदेश के नौजवान सरकारी नौकरियों का मोह त्याग नहीं पा रहे हैं. हालत यह है कि सहकारी बैंकों, समितियों तथा पंचायत सहायक के चुनिंदा पदों के लिए हजारों की तादाद में आवेदन करते हैं. सरकार को स्व-रोजगार को बढ़ावा देने के लिए बैंकों से कम से कम कागजी खानापूर्ति पर आसान कर्ज की व्यवस्था तथा लघु उद्योगों या कृषि-बागवानी से जुड़े लोगों के तैयार माल के लिए सहकारी विपणन संस्था की व्यवस्था करनी चाहिए लेकिन यह तभी हो सकता है जब सरकार बेरोजगारों के प्रति गंभीर हो. बेरोजगारी भत्ता कभी भी रोजगार का विकल्प नहीं हो सकता है.
प्रदेश में स्थापित होने वाले उद्योगों में 70 प्रतिशत रोजगार प्रदेश के लोगों को देने के नियम से लोगों में रोजगार की आस बंधी थी लेकिन ज्यादातर उद्योगों में बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लोगों को कम मजदूरी पर रखा जाता है और न्यूनतम मजदूरी एवं अन्य लाभों से वंचित रखा जाता है. प्रदेश के श्रम विभाग के पास इसकी अधिकारिक जानकारी नहीं है कि प्रदेश में लगे कारखानों में प्रदेश से बाहर के कितने और प्रदेश के कितने युवाओं के रोजगार मिला है और वे किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं. इन प्राइवेट कारखानों में रोजगार पर रखते समय ही मालिक/मैनेजरों की शर्त होती है कि डयूटी 12 घंटे करनी पड़ेगी और अर्थात वेतन 8 घंटे का और काम 12 घंटे, लेकिन इसके बावजूद पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज बढ़ती ही जा रही है. नई सरकार को चाहिए कि उद्योगों को आने वाली परेशानियों और उसमें काम करने वाले कर्मचारियों को नियम और कानून के अनुरूप वेतन अदायगी कराये तथा यहां लगे कारखानों में प्रदेश के युवाओं को रोजगार पर रखने के लिए कानून बनाए तथा कानून तोड़ने वालों को दंडित करने तथा प्रतिबंधित करने की व्यवस्था करे.
प्रदेश में पर्यटन उद्योग में अपार संभावनाएं हैं और पिछले एक दशक में पर्यटकों की संख्या दुगनी से ज्यादा बढ़ गई है लेकिन अपेक्षा के अनुरूप होटल एवं अन्य ढांचागत सुविधाओं का नितांत अभाव है. प्रदेश में निवेश बढ़ाने के लिए आकर्षक वातावरण बनाना होगा ताकि निवेशक यहां निवेश करें. इससे प्रदेश का आर्थिक विकास होगा तथा लोगों को प्रत्यक्ष व अपरोक्ष रोजगार प्राप्त होगा.सरकार एवं विपक्ष प्रदेश में बढ़ते अपराधों, नशाखोरी तथा ड्रग माफिया पर खूब हो हल्ला करते हैं लेकिन इससे जुड़े कारणों पर मंथन करना अपनी नैतिक जिम्मेदारी नहीं मानते. जिस भी प्रदेश में बेरोजगारी बढ़ी है, वहां अपरािधक घटनाएं, नशा, आतंक बढ़ा है. बेरोजगारी की समस्या ही अपराध की जड़ है. बेरोजगारी खत्म करने के लिए सरकार को अधिक से अधिक निवेश सुनिश्चित करने के साथ-साथ प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को आधुनिक तकनीक आधारिक उद्योग-धंधे स्थापित करने के लिए प्रशिक्षण एवं यथोचित सरल एवं सुलभ कर्ज की व्यवस्था करनी चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. प्रदेश के सहकारी बैंक भी व्यवसायिक गतिविधियों में ही लिप्त हैं और वे भी अन्य व्यवसायिक बैंकों की ही भांति वाणिज्यक गतिविधियों में लिप्त हैं.

विजय शर्मा

 

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