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हिमाचल विधानसभा चुनाव में मुद्दे गौण, व्यक्तिवाद और परिवारवाद हावी

हिमाचल प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस चुनावी समर में कूद चुकी हैं. जनता के असली मुद्दों पर व्यक्तिगतवाद और परिवारवाद हावी हो रहा है. कांग्रेस परिवारवाद के दम पर अपने पुराने महारथी वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में मिशन रिपीट के तहत फतह का दावा कर रही है तो भाजपा में इस बात की चर्चा हो रही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी प्रेम कुमार धूमल संभालेंगे या फिर जे. पी. नडडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जायेगा. पिछ्ले कुछ दशकों से राजनीति सेवा नहीं बल्कि रोजगार बनती जा रही है. भारतीय राजनीति में व्यक्तिवाद और परिवारवाद शासन की वह प्रणाली है जिसमें एक ही व्यक्ति, परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते चले जाते हैं. वंशवाद और भाई-भतीजावाद की यह परिपाटी लोकतंत्र के लिए घातक है. लोकतन्त्र में वंशवाद के लिये कोई स्थान नहीं है लेकिन भारत में लोकतंत्र की शुरुआत से ही परिवारवाद और व्यक्तिवाद राजनीति में हावी रहा है. व्यक्तिवाद और परिवारवाद आधुनिक राजनैतिक सिद्धांतों एवं प्रगतिशील समाज के विरूद्ध शोषण सरीखा है.
विधानसभा चुनाव में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कर्ज में आकंठ डूबी सरकार, खस्ताहाल सड़के, अपराध एवं ड्रग माफिया की बढ़ती जकड़, सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा, उद्योग नीति, सरकारी भूमि के अवैध कब्जों का नियमितीकरण सहित कई स्थानीय मुद्दे हैं, जिन पर प्रदेश की जनता पार्टियों से समाधान चाहती है. राज्य में बेरोजगारी और भ्रष्टाचार अहम मुद्दे हैं और भाजपा इसे मुद्दा नहीं बनी पा रही है. कांग्रेस विकास का ढिंढोरा पीट रही है और मुख्यमंत्री का रूप में वीरभद्र सिंह की हैसियत के दम पर मैदान में है. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस चुप है. महंगाई भी जनता के लिए एक बड़ा मुद्दा है और इसके लिए लोग केन्द्र की नीतियों को दोषी मानते हैं. प्रदेश की जनता इस बात से खफा है कि पैट्रोल और डीजल की घटी कीमतों का सारा फायदा मोदी सरकार ने जनता को न देकर आम जनता से धोखा किया है.
आम जनता के मुद्दे पीछे छूट रहे हैं. प्रदेश की जनता चाहती है कि राजनेता मुद्दे थोंपने के बजाय जनता की रोजमर्रा की ज़िन्दगी से जुड़े असली मुद्दों मसलन रोजगार, औद्योगिक निवेश, उद्योग-धंधों के लिए अनावश्यक कागजी कार्रवाई कम करके आसान कर्ज की व्यवस्था, मौजूदा अस्पतालों की दशा सुधारकर डॉक्टरों एवं दवाइयों की उपलब्धता, सरकारी स्कूलों एवं कॉलेजों में स्तरीय शिक्षा, निजी कॉलेजों की मंहगी उच्च शिक्षा के व्यापार के रोककर स्तरीय एवं सस्ती शिक्षा उपलब्ध कराना जैसे मुद्दों को पार्टियां अपने विजन डाक्युमेंंट/घोषणापत्र में शामिल करें. जनता चाहती है कि क्षेत्र और राज्य के साथ-साथ उनका एवं युवा पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित हो. चुनावों को लेकर जनता में और विशेषकर युवाओं में उत्साह होता है और युवा जानना चाहते हैं कि उनके वर्तमान और भविष्य के लिए नेताओं/पार्टियों की झोली में क्या है? प्रदेश का विकास हुआ है लेकिन आज भी प्रदेश की जनता मूलभूत सुविधाओं सड़क, पानी, रोजगार और भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन की बाट जोह रही है. कांग्रेस की सरकार के लिए भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा है. वह वादे के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराने में वह नाकाम रही है. चुनाव के अंतिम वर्ष उसने पैंतरा चलते हुए बेरोजगारों के लिए शर्तों के साथ बेरोजगारी भत्ता देने का ऐलान किया था और कुछ तो जुगाड़ करके मिला भी है. कितनों को मिला और उसका सही पैमाना क्या था, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है और यह कुछ चुनिंदा युवाओं को ही मिल पाया है. शर्त परिवार की आय को लेकर थी और परिवार में माता-पिता, भाई-बहनों को भी शामिल करने की बात सामने आई है और जिससे ज्यादातर युवा ठगा महसूस कर रहे हैं.
हर बार चुनावों से पहले दोनों ही बड़ी पार्टियां बेरोजगारी दूर करने और युवाओं के रोजगार मुहैया कराने के वादे करती हैं लेकिन सत्ता मिलने का बाद किसी भी सरकार ने प्राथमिकता के आधार पर बेरोजगारी की बढ़ती समस्या के समाधान के लिए कभी ठोस प्रयास नहीं किया और यही कारण है कि एक छोटे से प्रदेश के 9 लाख से ज्यादा युवा बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. हिमाचल प्रदेश के युवाओं के सामने अभी सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है.राज्य की कुल जनसंख्या में युवाओं की संख्या आधी से थोड़ी ही कम है. रोजगार सृजन के मामले में पिछली सरकारें कुछ खास नहीं कर पाई हैं. नतीजा यह हुआ है कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग के लोग या तो बेरोजगारी के शिकार हैं या फिर उन्हें रोजगार के लिए दूसरे राज्यों और शहरों का रुख करना पड़ता है. बेरोजगारों की बड़ी संख्या के कारण कबूतरबाज गिरोह भी सक्रिय हैं और युवा एवं अभिभावक आसानी से इनके झांसे में आ जाते हैं. लेकिन इसके बावजूद हकीकत में बेरोजगारी का मुद्दा किसी भी पार्टी की प्राथमिकता में नहीं है.
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा पिछले पांच साल से वीरभद्र सिंह को घेरती आई है और पिछले विधान सभा चुनावों से पूर्व भी वीरभद्र सिंह पर इस्पात कम्पनी की डायरी के आधार पर वीबीएस कांड की परछाई पड़ी थी लेकिन जनता ने ऐसे आरोपों को नकार कर सत्ता उन्हें सौंप दी थी. हालांकि इस बार स्थिति उल्टा है. तब वीरभद्र सिंह विपक्ष में थे और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी लेकिन इस बार उन्हें सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर जबाव देना है. भ्रष्टाचार और आय से अधिक सम्पत्ति के मामले वह दिल्ली जाकर मुकदमेबाजी का सामना कर रहे हैं और केन्द्रीय एजेंसियों ने उनकी करीब 10 करोड़ रूपए की सम्पत्ति जब्त कर ली है. पार्टी की खींचतान किसी से छिपी नहीं है. नेता पार्टी छोड़कर भाग रहे हैं लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के पास उनके अलावा कोई विकल्प नहीं है, इसलिए चुनाव की डोर पूरी तरह उनके हवाले कर दी है और चुनाव को वीरभद्र सिंह पर केंद्रित बना दिया है.
हिमाचल भाजपा केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेश को उपलब्ध कराई जा रही केन्द्रीय सहायता, रेलवे लाइनों के विस्तार तथा प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सरकारी फिजूलखर्ची और माफियाराज को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ रही है लेकिन प्रदेश से बेरोजगारी की समाप्ति का उसके पास क्या उपाय है, बढ़ते अपराध और ड्रग्स माफिया तथा मंहगाई रोकने का उसका क्या रोड़मैप है, इसपर पार्टी की राय स्पष्ट नहीं है. सभी बड़े नेता पार्टी के विजन डाक्युमेंट का इंतजार कर रहे हैं, जिसे विशेषज्ञों की समिति बनायेगी और नेता उसे जनता को परोस देंगे. इसे बनाने वाले भूल जाएंगे और जिन्हें इसे लागू करना है, शायद ही इसे बनाने के समय उनकी राय ली गई हो, इसलिए पार्टियों के घोषणा पत्र या विजन डाक्युमेंट के आधार पर सरकार बनने पर कार्रवाई नहीं होती.
कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार वीरभद्र सिंह विकास का दावा करते हैं लेकिन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकार के बढ़ते कर्ज पर चुप्पी साध लेते हैं. विपक्ष के नेता प्रेम कुमार धूमल भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कर्ज में डूबी सरकार के लिए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को दोषी मानते हुए प्रहार करते हैं. उनका कहना कि कांग्रेस सरकार ने विकास के नाम पर स्कूल और कॉलेज तो खोल दिये लेकिन प्राईमरी और मिडल स्कूलों पर बिना इन्फ्रास्ट्रक्चर के बोर्ड टांग दिये है. उनका कहना है कि कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व नोटबंदी और जीएसटी की निंदा करता है जबकि वीरभद्र सिंह और प्रदेश की जनता ने इसका स्वागत किया था. उनका कहना है कि केन्द्र और प्रदेश में एक ही पार्टी की सरकार बने तो दुगनी गति से प्रदेश का विकास होगा. धूमल सवाल उठाये हैं कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने पहाड़ी प्रदेशों को मिली छूट को समाप्त कर दिया था जिससे विकास बाधित हो रहा था लेकिन केन्द्र की भाजपा सरकार ने उसे पुन: बहाल किया और कांग्रेस की 20,000 करोड़ रूपए केन्द्रीय सहायता की अपेक्षा भाजपा की केन्द्र सरकार ने प्रदेश को 1 लाख 20 हजार करोड़ रूपए की केन्द्रीय सहायता दी है लेकिन भ्रष्टाचार के चलते प्रदेश का विकास नहीं हो रहा है और केन्द्रीय निधि का दुरूपयोग हो रहा है.
राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप लगाने में भी पीछे नहीं है लेकिन प्रदेश की जनता की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है. जनता जानना चाहती है कि राजनीतिक पार्टियां उनकी समस्याओं और मुद्दों का समाधान किस प्रकार कर सकती हैं. जनता को पता होना चाहिए कि नई सरकार बनने पर काम-धंधों और उद्योगों को किस प्रकार की रियायत दी जाएगी तथा बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर कैसे लगाम लगेगी या फिर पार्टियां और नेता जिस ढर्रे पर चल रहे हैं, उसी पर चलते रहेंगे. प्रदेश की जनता को सरकारी आंकड़ों से भी कोई सरोकार नहीं है जिसमें यह दावा किया जाता है कि प्रदेश में प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष इतनी आय बढ़ गई. प्रदेश की जनता की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या उनके पढ़े-लिखे बच्चों को समुचित रोजगार मिलेगा या नहीं? सरकारी स्कूलों, कॉलेजों में स्तरीय और सस्ती शिक्षा मिल पायेगी या नहीं, लोगों को अपने आसपास के अस्पतालों में उचित चिकित्सा मिलेगी या नहीं? लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन की बात नहीं कर रही है. केवल मतदाताओं को आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति में उलझा कर वोट हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य नजर आ रहा है. दोनों प्रमुख पार्टियों को चाहिए कि वह गंभीरता दिखायें और प्रदेश की जनता के मुद्दों और समस्याओं का ठोस समाधान पेश करें. उनके मुद्दों और समस्याओं को समझकर अपने घोषणापत्र या विजन डाक्युमेंट में शामिल करके हुए समाधान प्रस्तुत करें.
व्यक्तिवाद और वंशवाद की राजनीति को लेकर मतदाताओं के रवैये पर कई शोध एवं सर्वेक्षण सामने आ चुके हैं. ऐसे ही एक शोध के मुताबिक राजनीतिक प्रतिनिधियों को चुनाव में युवा मतदाता हों या अधेड़ या बुजुर्ग, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस राजनैतिक दल को वोट दे रहे हैं या किसी परिवार के सदस्य या किसी व्यक्ति की राजनैतिक क्षमता को वोट दे रहे हैं. मतदाता अपनी परिपाटी को ही निभाते चले जाते हैं. लेकिन लोकतंत्र के मुकम्मल विकास के लिए मतदाताओं का यह रवैया घातक हो सकता है. मतदाताओं को जागरूकता दिखानी चाहिए. क्षेत्रवाद, जातिवाद और नेताओं के आपसी आरोप-प्रत्यारोप एवं व्यक्तिवाद और परिवारवाद का राजनीति से मुक्त होकर मुद्दों के आधार पर वोट करना चाहिए अन्यथा बदलाव से कोई फायदा नहीं होगा.

विजय शर्मा

 

 

 

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