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ग़ज़ल : अब अपना दीवान नहीं है

अब अपना दीवान नहीं है
पहले जैसी शान नहीं है
जिसकी बातें झूठी झूठी
उसका कोई मान नहीं है
दीन दुखी का कष्ट न समझे
वो अच्छा इंसान नहीं है
मैं उसकी रग रग में बसता
वो मुझसे अनजान नहीं है
हर कोई शिव नहीं यहाँ पर
विष पीना आसान नहीं है
आज बुजुर्गों का हर घर में
बोलो क्यों सम्मान नहीं है
कैसे कह दूँ मेरे दिल में
जीने का अरमान नहीं है
कण कण में वह बसने वाला
क्या तेरा भगवान नहीं है
अपना कौन ‘प्रणय’ सब जाने
इतना भी नादान नहीं है

लव कुमार ‘प्रणय’
अलीगढ़

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