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कविता : समय के साथ

कविता
समय के साथ
सब बदल जाता है
सूर्य की किरणों का
तप पाकर
आदमी फूल की तरह
खिलता है और
शाम होते होते
ढल जाता है
मेले में घूम हो जाने के डर से
पिता पकड़ लेते है
लालन की अंगुली
और पांव दर्द न करे
तुरंत उठा लेते है कंधों पर
समय के साथ
सब बदल जाता है
लालन के कंधों पर
पिता का जनाजा उठ जाता है
समय के साथ बदल जाते है
गिरगिट सरीके लोग
दिखाने लगते है औकात
समय ही जो नचाता है
सच का सच सबको बतलाता है
दरअसल समय का बदलना निश्चित है
यही नियति और शाश्वत सत्य है
तुम इसे स्वीकार सहर्ष करो !
समय के साथ बदल जाता है समय भी …

– देवेंद्रराज सुथार

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