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बापू, एक बार फिर आ जाओ!

30 जनवरी – शहीदी दिवस पर विशेष

पीके फिल्म का एक दृश्य है। अभिनेता आमिर खान गाजर खरीदने के लिए दुकानदार को गांधी जी के चित्र वाली कई तरह की सामग्री देता है। उस पर दुकानदार कहता है, “ई कबाड़ हमरी दुकान पर काठे लारे हो?” इस पर अभिनेता गांधी जी की छवि वाला पचास रुपये का नोट देता है। बदले में दुकानदार गाजर देता है। तब अभिनेता कहता है- “ई फोटु का वैल्यु सिरफ एक तरह का कागज पर है। बाकी सब कागज पर ई फोटु का वैल्यु जीरो बटा लूल है।“ पीके फिल्म का यह दृश्य हमारे आज के समाज पर एक जोरदार तमाचा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में गांधी जी की वैल्यु करेंसी तक ही सीमित है या फिर उससे बढ़कर भी है?

बापू 30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा से आ रहे थे। उस समय, नाथूराम ने बापू के साथ खड़ी महिला को हटा दिया और बापू के सीने में अपनी अर्ध-स्वचालित पिस्तौल से तीन गोलियां दाग दीं। घटनास्थल पर ही गांधी जी ने दम तोड़ दिया। घटना के तुरंत बाद नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया था। फिर नाथूराम के खिलाफ मामला शिमला की अदालत में चला गया। 15 नवंबर, 1949 को नाथूराम को फांसी दे दी गई। फांसी देने से पहले गांधी जी के पुत्र देवदास गांधी ने नाथूराम गोडसे से जेल में भेंट की थी। गोडसे ने देवदास से कहा था- “मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूँ। हिंदी अख़बार ‘हिंदू राष्ट्र’ का संपादक। मैं भी वहाँ था (जहां गांधी की हत्या हुई)। आज तुमने अपने पिता को खोया है। मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुँचा है। तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुँचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है। कृपया मेरा विश्वास करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत शत्रुता के चलते नहीं किया है, न तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और न ही कोई गलत नीयत।” बाद में देवदास ने नाथूराम को एक पत्र लिखा था, “आपने मेरे पिता की नाशवान देह का ही अंत किया है और कुछ नहीं। इसका ज्ञान आपको एक दिन होगा, क्योंकि मुझ पर ही नहीं संपूर्ण संसार के लाखों लोगों के दिलों में उनके विचार अभी तक विद्यमान हैं और हमेशा रहेंगे।“ सच तो यह है कि आज भी पूरा देश राष्ट्रपिता, महात्मा, बापू न जाने किन-किन अलंकारों से गांधी जी को याद करता है। आश्चर्यचकित करने वाली बात यह थी कि नाथूराम स्वयं भी महात्मा गांधी से अत्यंत प्रभावित था। गोडसे के अनुसार- “मैं गांधी का सम्मान करता हूँ। वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है। मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं।” इससे यह साफ़ होता है कि नाथूराम गोडसे भी महात्मा गांधी का बहुत बड़ा प्रशंसक था। हाँ, यह अलग बात है कि कुछेक मतभेदों के चलते उसने गांधी जी की हत्या कर दी। सच तो यह है कि वह गांधी जी की हत्या में तो सफल हो पाया, किंतु महात्मा की हत्या करना उसकी तो क्या इस सृष्टि में किसी के बस की बात नहीं है।
आज दुनियाभर में हिंसा, असहिष्णुता, बेरोजगारी, बलात्कार, महंगाई तथा तनावपूर्ण वातावरण वैश्विक शांति में जहर घोलने का काम कर रहे हैं। इन सबका कारण सत्य को असत्य, अहिंसा को हिंसा, धर्म को अधर्म और न्याय को अन्याय के साथ स्थापित करने का कुप्रयास मात्र है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महात्मा गांधी सत्य, अहिंसा, धर्म व न्याय के सबसे बड़े पुजारी थे। रबींद्रनाथ टैगोर, आइंस्टीन, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लुथर किंग, बराक ओबामा, दलाई लामा, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, आंग सान सू की ने इसी पुजारी के मार्गदर्शन का पालन कर सुख, समृद्धि व शांतिपूर्ण जीवन जीने का संदेश दिया है। यूं तो गांधीवाद का विरोध करने वालों ने जिनमें दुर्भाग्यवश और किसी देश के लोग नहीं बल्कि अधिकांशतया: केवल भारतवासी ही शामिल हैं, ने गांधी के विचारों की प्रासंगिकता को तब भी महसूस नहीं किया था जबकि वे जीवित थे। गांधी जी से असहमति के इसी उतावलेपन ने उनकी हत्या तो कर दी परन्तु आज उनके विचारों से मतभेद रखने वाली उन्हीं शक्तियों को भली-भांति यह महसूस होने लगा है कि गांधी जी अपने विरोधियों के लिए दरअसल जीते जी उतने हानिकारक नहीं थे जितना कि हत्या के बाद साबित हो रहे हैं। और इसका कारण मात्र यही है कि जैसे-जैसे विश्व हिंसा, आर्थिक मंदी, भूखमरी, बेरोंजगारी और द्वेष जैसी परिस्थितियों से मुँह की खा रहा है, वैसे-वैसे दुनिया को न केवल गांधी जी की याद आ रही है, बल्कि उन्हें आत्मसात करने की अनिवार्यता भी विचलित संसार को घुटने टेकने पर मजबूर कर रही है। आज के दौर में आतंकवाद व हिंसा हमारे सामने मुँह बाए खड़ी है। गांधी जी जब दक्षिण अफ्रिका से भारत लौटे (1915) तब प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय द्वितीय विश्वयुद्ध अपने चरम पर था। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने अहिंसा को शांति का स्थाई समाधान माना। उनका विश्वास था कि आँख के बदले आँख की नीति से यह दुनिया एक दिन अंधी हो जाएगी। आगे चलकर दुनियाभर के देशों ने उनके दर्शन का पालन कर शांति पताका फहराने का प्रयास किया।
महात्मा गांधी करिश्माई फ़कीर बाबा थे। उन्होंने शोषितों, पीडितों, गरीबों, पथभ्रष्टों के दुखों को अपना दुख माना। दूसरों को सीख देने से पहले स्वयं को भाईचारे, धार्मिक सद्भावना, अहिंसा के अनुयायी के रूप में स्थापित किया। कुछ कर गुजरने के लिए बाहुबल या जनबल की नहीं बल्कि दृढ़ संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गाँधी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को यक़ीन ही नहीं होगा कि हाड़-माँस का ये व्यक्ति कभी पृथ्वी पर चला भी होगा।
कदाचित आइंस्टीन की यह बात सत्य भी हो, किंतु आज समय की मांग और हिंसा, अत्याचार, आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, लूटपाट की जलती रेत पर रेंगता हुआ विश्व गांधी जी को फिर से याद करने पर बाध्य हो गया है। यदि इस विश्व को सत्य, अहिंसा, धर्म और न्याय का चमन बनाना है, तो हमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता में अटूट विश्वास करने वाले राष्ट्रपिता को हृदय की गहराई से याद करना होगा।

सोहनलाल द्विवेदी ने कहा था,
तुम बोल उठे, युग बोल उठा, तुम मौन बने, युग मौन बना
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर, युग कर्म जगा, युगधर्म तना।
युग-परिवर्त्तक, युग-संस्थापक, युग संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें, युग-युग तक युग का नमस्कार!
चलो सब मिलकर मुक्त कंठ से गांधी जी से कहें, “बापू, एक बार फिर आ जाओ!”

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]

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