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6 दिसम्बर परिनिर्वाण दिवस पर विशेष : डा0 अम्बेडकर की इमारत भव्यता का इंतजार

6 दिसम्बर 1956 को दिल्ली स्थित 26 अलीपुर रोड आवास पर डा0 बी.आर. आम्बेडकर की आखिरी सांसे यादों में सजोई रहेगी,7 दिसम्बर को बम्बई में चैपाटी समुन्द्र तट पर बौद्ध संस्कारो द्वारा उनका अन्तिम संस्कार किया गया था। किन्तु उनकी यादगार समाधि पर पुष्पांजलि करने हेतु बहुत दूर बम्बई जाना पड़ेगा, जबकि बाबु जगजीवन राम का भी अन्तिम संस्कार बिहार में हुआ था, किन्तु उनकी समाधि को राजधानी में स्थित किया गया, बाबा साहब डा0 अम्बेडकर की समाधि दिल्ली से बहुत दूर हो यह भी मर्जी कांग्रेस की ही थी।
6 दिसम्बर 1956 को दिल्ली स्थित 26 अलीपुर रोड पर उन्होंने आखिरी सांसे ली। अतः डा0 अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद उनके समर्थको की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी कि इसका सहज अंदाजा भी नहीं बम्बई लगाया जा सकता। किन्तु जिस कांग्रेस ने डा0 अम्बेडकर को 1936 में विधान सभा के लिए तथा 1952 में लोकसभा के लिए पराजित कराया, उसी अम्बेडकर की यादे भारतीय संसद के समीप रहे ऐसा भी कांग्रेस का ही संकल्प, विकल्प रहा होगा। विडम्बना तो यह है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके करीब 4 हजार प्रष्ठीय आर्टीकलों को भारतीय सरकारी तंत्र पर प्रकाषित व संगृहहीन किया गया है? ताकि देष उनके अनछुए बिन्दुओं से प्रेरित हो सके, इस संदर्भ में बम्बई विष्वविद्यालय के कुलपति रह चूके श्री मुगेकर ने अम्बेडकर स्मरणों के सदर्भों में भी कहा कि डा0 अम्बेडकर के अप्रकाषित एवं असंग्रहीत पेजों को जनता के सामने लाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर के विचार बडे़ क्रांतिकारी थे और वे समाज और राजनीति के ढांचे को बदलना चाहते थे।
पुरस्कृत लेखनों में उनका 50 हजार पुस्तकें लिखने का इतिहास जागृत है जिसे उन्होने निजी पुस्तकालय में दर्ज हुआ। उन्होने अपनी पुस्तक ‘जाति के विनाष’ भी प्रकाषित की जो उनके न्यूयाॅर्क में लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक में अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होने अस्पृष्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले को उन्होंने ‘हरिजन’ शब्द का सदैव अपमानित माना इस संदर्भ मं ‘हरिजन’ आकलन पर दलित चिंतक श्री मोहनदास नैमिषराय ने भी 14 अप्रैल 2017 को ‘राष्ट्रीय सहारा’ मे लिखा कि ‘हरिजन’ शब्द के बारे में डाॅ. अम्बेडकर का विचार था कि दुर्भाग्यवष अछूत कहलाने वाले विस्तृत गर्व के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना मकसद है, बल्कि उस अभिव्यक्ति को मान्यता देने की इच्छा है जो लंबे समय से प्रचलन में है। मैं उनसे निवदेन करता हूं किवह यह न समझे कि ‘हरिजन’ शब्द या उनकी परिभाषा में उनके संप्रदाय की अवमानना करने का प्रयास किया गया है। मैं यह अवष्य कहूंगा कि अब व्यावहारिक रूप से ‘हरिजन’ शब्द ‘अस्पृष्य’ शब्द का पर्यायवाची बन गया है, इसके अतिरिक्त इस नाम में और कुछ नहीं है, और मैं मानता हंू कि अगर माननीय प्रधानमंत्री (उन दिनों महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था) हमारी तरह से ही सोचते हैं कि ‘हरिजन’ शब्द की अभिव्यक्ति ‘अछूत वर्ग’ के समान बन गई है, तब यह उनका कर्तव्य हो जाता था किवह उस समय इस शब्द को वापस से लेते और बाद में किसी वैकल्पिक नाम को ढूंढने के दृष्टिकोण से हमसे इस मुद्दे पर विचार-विमर्ष करते।
ऐसे ही विवादस्प्रद लेखनों में डाॅ. अम्बेडकर ने 1941 और 1945 के बीच में बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाषित किये जिनमें ‘थाॅट्स आॅन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देष पाकिस्तान की मांग की आलोचना की थी। वाॅट कांग्रेस हैव डन टू द अनटचेबल्स (कांग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनों पर अपने हमलों को तीखा कर दिया था। उन्होंने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया था। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज?’ (षुद्र कौन थे?) के द्वारा हिन्दु जाति व्यवस्था के पदानुऋण में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व में आने की व्याख्या की, उन्होनें इस बात पर भी जोर दिया था, कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अपने सत्य परंतु विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कुट आलोचना के बावजूद बी आर अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेŸाा की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने अम्बेडकर को देष का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया था।
अतः इतने बड़े संघर्षो के बाद भी डा0 अम्बेडकर संघर्षों को आगे बढ़ाने के बजाय आज, उनके नाम व झण्डे की राजनिति हो रही है। किन्तु सम्मान में उनके द्वारा 19 जनवरी 1956 को गठित उनकी राजनैतिक रिपब्लिकन पार्टी को यादगार नहीं बनाया गया, इसी यादगार का लोष्ठवत बनाने हेतु बड़ी पार्टी ने अम्बेडकर स्वामित्यों की प्रखरता से हाथ खड़े रखे? इस संदर्भ में दलित दस्तक में उनके प्रति विचार प्रस्तुत हुए कि डाॅ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद पं. नेहरू तब तक 26 अलीपुर रोड पर मौजूद रहें, जब तक उनके शव को विषेष विमान से मुम्बई नहीं भेज दिया गया, ये वो दौर था जब नेहरू की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं डोलता था।
आखिर क्या यह विडम्बना नहीं रही कि डाॅ. भीमराव अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिल्ली में हुआ था, दिल्ली तब भी देष की राजधानी थी और आज भी है, इसके बाद भी अम्बेडकर के परिनिर्वाण पर उन्हें दिल्ली में नहीं दिल्ली से दूर मुम्बई में अंतिम संस्कार के लिए भेजा गया, नेहरू से बड़ा चेहरा उस समय कोई नहीं था, नेहरू ही प्रधानमंत्री थे, कहा जाता है कि जो कुछ हुआ वो नेहरू के निर्देषों पर ही हुआ, कहा जाता है कि डाॅ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद नेहरू तब तक 26 अलीपुर रोड पर मौजूद रहें, जब तक उनके शव को विषेष विमान से मुंबई नहीं भेज दिया गया, ये वो दौर था जब नेहरू की इजाजत के बिना पŸाा भी नहीं डोलता था।
यही कारण है उनकी मृत्यु के सेदर्भ में कोई विषेष जागरूकता नहीं है। इतना ही नहीं जिन डाॅ0 अम्बेडकर को स्मृति में सरकारी प्रतिष्ठान बनाया गया। उसके पास भी उनके प्रति मौत तक की जानकारी नहीं है? कुछ विद्वानों का कहना है कि म0 बुद लेखन में उनको हृदयगति रूक जान के कारण उनकी अकस्मात मृत्यु हुई।

मलूकचन्द बैनीवाल

28167 विष्वास नगर, गली-15
शाहदरा दिल्ली-110032,
दुरभाषः- 9213283644

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