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खुशहाल एवं समृद्ध जीवन का आधार है स्वस्थ बालिका

यह शाश्वत सत्य है कि हम स्वस्थ होंगे तो खुशहाल और समृद्ध जीवन को जिया जा सकता है। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्तर पर स्वस्थ रहकर ही जीवन का आनंद लाभ लिया जा सकता है । उत्तम स्वास्थ्य ही जीवन का सौन्दर्य और आत्मा का विस्तार है । धर्म की पालना करने के लिए भी स्वस्थ शरीर की आवश्यकता रहती है। तभी तो उपनिषदों में कहा गया है “शरीर माद्यं खलु धर्मसाधनम्”। भारतीय दर्शन के अनुसार आत्मा अनंत यात्रा करते हुए मनुष्य योनि तय करती हुई गर्भ का चुनाव करती है । नवसृजन करती है। किन्तु क्या गर्भधारण का आधार ठोस है ? क्या हमारी बालिकाएं इतनी स्वस्थ और सशक्त है कि वो उत्तम सृजन कर सकें ?
बालिकाओं का मजबूत स्वास्थ्य हमारे लिए आज भी एक बड़ी चुनौती है। जन्मपूर्व भेदभाव के कारण राजस्थान जैसे बड़े राज्य में आज भी असंतुलित लिंगानुपात है। वर्ष 2018-19 के जन्म लिंगानुपात के आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में आज भी प्रति 1000 हजार लड़कों पर 948 बेटियाँ पैदा हो रही है। जन्म के बाद कुपोषण, अशिक्षा, हिंसा, छेड़खानी आदि अनेक प्रकार की यातनाओं और भार-बोझ के दुष्चक्र को सहते हुए यदि वो बच भी जाती है तो उसे परिवार और गृहस्थी की जिम्मेदारी के बोझ तले दबा दिया जाता है । बाल-विवाह और कम उम्र में विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा के कारण राजस्थान पहले से ही देशभर में कलंकित है । राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 4 के अनुसार राजस्थान राज्य में 35 प्रतिशत बालिकाओं की 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने से पूर्व ही शादी कर दी जाती है । जहाँ शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 20 फीसदी है वहीँ ग्रामीण क्षत्रों में 40 फीसदी के साथ स्थिति और भी विकट है । वर्ष 2015-16 में सर्वे के समय राज्य में 15-19 वर्ष की 6 प्रतिशत बालिकाओं के या तो एक जीवित बच्चे का जन्म हो चूका था या वो उस समय गर्भवती थी । ऐसे में जहाँ राज्य में 35 प्रतिशत बालिकाओं की 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने से पूर्व ही शादी कर दी जाती हो और जिनमे से लगभग 50 फिसदी बालिकाओं के शरीर में खून की कमी है साथ ही वे कुपोषित और मानसिक तनाव और अवसाद से ग्रसित हो वहां समाजिक दबाव या कर्त्तव्य की आड़ में उनसे गर्भधारण करवाना कहाँ तक उचित है ? यह घोर अन्याय है । ऐसी सामाजिक व्यवस्था अनैतिक भी है और असहनीय भी । हालत इतने विकट है कि जहाँ प्रदेश में एक वर्ष की आयु पूर्ण करने से पूर्व प्रति एक हजार बच्चों पर 41 बच्चे मरते है वहीँ 20 वर्ष से कम आयु की बालिकाओं द्वारा बच्चे पैदा करने पर शिशु मृत्यु दर का यह आंकड़ा 41 से बढ़कर 56 हो जाता है यानी कि एक वर्ष की आयु पूर्ण करने से पूर्व प्रति एक हजार बच्चों पर 56 बच्चे काल का ग्रास बन जाते है । राज्य की 15-24 वर्ष की 45 प्रतिशत महिलाओं को अभी भी मासिक धर्म सुरक्षा के लिए स्वास्थ्यकर पद्धति का उपयोग करना नहीं आता । ऐसे में यदि अस्वस्थ और निर्बल शरीर वाली बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करवा भी दी तो भी वे अपने लिए आभामय और ज्योतिर्मय जीवन का निर्माण नहीं कर पाएंगी । सृष्टि नहीं रच पायेंगी । इसलिए यह नितांत आवश्यक हो गया है कि समाज और सरकार को सर्वप्रथम बालिकाओं के स्वास्थ्य के प्रति ध्यान देना होगा । उनके स्वास्थ्य की प्रति उपेक्षा समाप्त करनी होगी । पुरस्कार, प्रलोभन, प्रोत्साहन और रोग मुक्त की नीतियों से आगे बढ़कर उत्तम स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करवानी होगी। बालिकाओं को भी अपने स्वास्थ्य के प्रति न केवल जागरूक होना होगा बल्कि हक से स्वास्थ्य का अधिकार अपने हाथों में लेना होगा । अपनी आधारशीला मजबूत करनी होगी। कमजोर नींव पर सशक्त भारत का निर्माण नहीं हो सकता। यदि नया खून है, नई उमंग है, नई जवानी है तो इस नए दौर में सभी को मिलकर सोच और कार्यशैली भी नई अपनानी होगी तभी एक उज्जवल, सशक्त, स्वस्थ, खुशहाल और समृद्ध राज्य व देश की परिकल्पना साकार हो सकेगी ।

भूपेश दीक्षित
जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ, जयपुर – राजस्थान
Email : [email protected]

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