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एक अनार सौ बीमार

रोजगार के गुड़ पर बेरोजगार मक्खियों का भिनभिना आम दृश्य हो गया है। पहले सरकार जब-तब गुड़ का टुकड़ा फेंका करती थी, तब-तब बेरोजगार मक्खियाँ उसे चट करने में व्यस्त हो जाती थीं। आजकल गुड़ का निजीकरण होने लगा है। गुड़-मक्खी का खेल सरकारी हाथों से निकलकर निजी हाथों में पहुँच गया है। मक्खी तो मक्खी है। उसके लिए सरकारी और निजी में कोई अंतर नहीं है। उसका मतलब तो गुड़ से है। जिस जमाने में गुड़ की सुगंध मिलना भी दुर्लभ हो जाए, उस जमाने में गुड़ मिल जाए तो उससे बढ़कर सौभाग्य क्या हो सकता है?

एक दिन की बात है। दिल्ली की एक निजी कंपनी में मात्र एक पद के लिए अभ्यर्थियों से आवेदन मंगवाए गए। एक अनार सौ बीमार को पीछे छोड़ते हुए एक पद हजार अभ्यर्थियों का जमावड़ा लगा हुआ था। कंपनी ने इंटरव्यू में भाग लेने के लिए सभी को अवसर दिया। जिस जमाने में अंदर ही अंदर भाई-भतीजावाद के चक्कर में नौकरियाँ बाँट दी जाती हैं, उस जमाने में इंटरव्यू का आयोजन करना किसी अजूबे से कम नहीं था। इंटरव्यू में भाग लेने वाले अभ्यर्थियों के लिए कंपनी ने एक खास शर्त रखी थी। शर्त यह थी कि हमें ऐसा अभ्यर्थी चाहिए जो हमारी बात को लकीर की फकीर की तरह अपनाए। यदि यह शर्त स्वीकार है तभी इंटरव्यू में भाग लेने के लिए अनुमति दी जाएगी। कमाल की बात यह थी कि सभी के सभी अभ्यर्थी टस से मस नहीं हुए। बेशर्मी की पराकाष्ठा अपने चरम पर थी।

इतने सारे अभ्यर्थियों में बिहार राज्य का अभ्यर्थी न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। कमाल की बात यह थी कि हजार अभ्यर्थियों में वह एकमात्र बिहारी था। इंटरव्यू कुछ ही क्षणों में आरंभ होने वाला था। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। उस एकमात्र बिहारी अभ्यर्थी को छोड़कर सभी को लौट जाने के लिए कहा गया। इतना सुनना था कि शेष अभ्यर्थियों में गुस्से का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। कंपनी पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठ गए। उनकी इस हरकत को मैनेजमेंट पहले ही भांप गया था। उसे पता था कि बिना इंटरव्यू के किसी का चयन करने से वे भड़क उठेंगे। मैनेजमेंट ने अभ्यर्थियों को डाँटते हुए कहा –  आप लोगों की इसी हरकत के चलते आपका चयन नहीं किया गया। आप लोग बात-बात में भड़क उठते हैं। यह निजी कंपनी है, कुंभ का मेला नहीं कि जब चाहे तब मुँह उठाए अपनी मर्जी करने लगे।

वहाँ उपस्थित अभ्यर्थियों में से एक राजस्थानी बाबू भी था। उसने पूछा – फिर आपने किस तर्ज पर बिहारी बाबू का चयन किया? तब मैनेजमेंट ने कहा – हमें पता था कि आप में से कोई न कोई यह सवाल जरूर पूछेगा। तो सुनिए… उसके राज्य के दो टुकड़े हो गए तब भी वह चुपचाप रहा। ठीक से संसाधनों का बंटवारा नहीं हुआ, तब भी वह चुपचाप रहा। असंख्य मनलुभावन वायदे किए गए लेकिन पूरा नहीं कया गया, तब भी वह चुपचाप रहा। विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया गया, तब भी वह चुपचाप रहा। सरकारी कंपनियाँ बिक गयीं, तब भी वह चुपचाप रहा। लाखों-करोड़ों रुपयों के पैकेज की घोषणा हुई, लेकिन बदले में मिला क्या बाबा जी का ठुल्लू, तब भी वह चुपचाप रहा। हर साल बाढ़ आती रही। राज्य की दशा सुधारने की बात की जाती रही, बावजूद इसके उसके जैसे लाखों लोगों की झोपड़ी डूबती रही, तब भी वह चुपचाप रहा। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उसके चेहरे पर आशा की एक मुस्कान सदा कायम रही। अब बताइए आप लोगों में से है कोई ऐसा?

सभी अभ्यर्थी निरुत्तर हो गए। मैनेजमेंट की बातें चौबीस कैरेट सोने की तरह सच थी। चयनित अभ्यर्थी के लिए जोरदार तालियाँ बजायी गयीं। इतने में छत्तीसगढ के एक अभ्यर्थी ने पूछा – वैसे इस कंपनी का मालिक किस राज्य का है? उत्तर ऐसा था कि सभी अभ्यर्थी दुम दबाकर वहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी। उत्तर था – गुजरात।

 

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

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