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आग किसने लगाई

भारतीय संसद में जैसे ही सत्ताधारी दल ने ” नागरिकता संशोधन विधेयक ” को पेश किया वैसे ही पूरे देश में एक भूचाल सा आ गया । ऐसा लगने लगा जैसे चारों ओर कोहराम सा मच गया । ऐसी स्थितियां पहले भी देखने को मिलीं थी परंतु इस बार की ये स्थिति अन्य परिस्थितियों के बिल्कुल ही विपरीत एवं हर मायनों में उनसे भिन्न तथा उलट थी । सरकार के गृहमंत्री ने खुले तौर पर यह कहा कि इस अधिनियम के आने से किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता पर कोई प्रभाव नहीं पडे़गा । यह नागरिकता देने का कानून है नागरिकता छीनने अथवा निरस्त करने का नहीं । इसके बावजूद विपक्षी दलों ने अनपढ़ जनता को बरगलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी़ और जनता के विवेकहीनता की पराकाष्ठा देखिए की देश के गृहमंत्री , प्रधानमंत्री समेत कई बड़े नेताओं के सरलतापूर्वक स्पष्टीकरण देने के बावजूद वो गुमराह होते और करते रहे । इस कानून के विरोध का प्रमुख कारणों का यदि वास्तविक विश्लेषण किया जाए तो यह पता चलता है कि, इस विरोध प्रदर्शन की आग में तेल डालने वाले लोग ऐसी श्रेणी में आते हैं जिन्हे आम जनमानस ने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नकारा है । उदाहरणस्वरुप ऐसे कई नाम हैं लेकिन उनको लेना उचित नहीं होगा । जिन लोगों को इस कानून से अपने वोटबैंक पर जरा भी खतरा नजर आया वे तुरंत ही माचिस लेकर देश जलाने को उतर गए । स्थितियां ये रहीं कि जब भी किसी प्रदर्शन कर रही भीड़ से प्रदर्शन की वास्तविक वजह पूछी गई तो ऐसे जवाब आए कि विपक्ष अपने ही हाथों उपहास का पात्र बन गया ।एक जगह के प्रदर्शन में तो एक भाई साहब ने लहसुन और प्याज के दाम बढ़ने का कारण सीएए- एन आर सी बताया । सदन में भी विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता ने अपने बचकाने बयान से सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया । उनके मुताबिक भारत का कोई भी मुसलमान गृहमंत्री अथवा प्रधानमंत्री ने नहीं डरता है । इसमें रोचक बात यह रही कि यह उसी दल और समूह के नेता हैं जिन्होनें भाजपा के सरकार में आने के बाद लगातार मीडिया में यह बयान दिया था कि मुसलमान डरे हुए हैं । आज यही कहते हैं कि कोई डर रहा नहीं है । गृहमंत्री ने भी बड़ी शालीनता से कहा कि हम तो नहीं चाहते कि कोई डरे । अब सबसे कमाल की बात यह है कि जिन नेताओं ने सदन में विरोध के बयान दिए वही सदन के बाहर इसके पक्ष में बोलते सुने गए ।
इस विरोध के दूसरा पक्ष रहा वामपंथ । वामपंथ ने भी इस मौके को पूरी तरह भुनाकर अपने मंसूबों को सफल बनाने के लिए हरसंभव प्रयास किए। बड़े -बड़े नेताओं ने अपना पूरा जोर लगाकर दुष्प्रचार किया । यहां तक कि फ्री कश्मीर और जिन्ना वाली आजादी तक की मांग कर डाली । विरोध प्रदर्शनों के इस दौर के एक और भागीदार जो अपने को मूलनिवासी कहते हैं तथा यहां के संसाधनों पर अपना पहला हक जताते हैं उन्होंने पूरे हक से देश के संसाधनों को जलाने, तबाह और नष्ट करने में अहम भूमिका निभाई । दरअसल इस पक्ष के नेता अपने लिए एक उचित राजनीतिक जमीन वर्षों से तलाशते नजर आए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती नजर नहीं आई । चौथी और अहम भागीदारी इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों ने निभाई और देश जलाने के लिए अपने प्रशंसकों और समर्थकों को उकसाते नजर आए । याद रहे कि ये वही बुद्धिजीवि थे जिन्होंने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय पर एक शब्द भी बोलना उचित नहीं समझा था । ये वही लोग थे जिन्हें भारत असहिष्णु लगता था । ये वही लोग थे जिन्होंने याकूब मेमन की फांसी रोकने की सिफारिश की थी तथा उसके जनाजे में उमडे़ अपार जनसमूह को जायज बताया था । ये वही लोग हैं जिन्होनें हाल ही में निर्भया के गुनहगारों को माफ करने की नसीहत दी है ।
और इन सबके बीच, लगी हुई आग को भड़काने अथवा बढा़ने में भारतीय मीडिया के भी कुछ जिम्मेदार एवं तथाकथित निष्पक्ष पत्रकारों की भी भूमिका अहम रही । एक ओर जहाँ अन्य मीडिया वाले लोगों को जागरुक करते और कानून की सही जानकारी देते रहे वहीं दूसरी ओर कुछ तथाकथित तटस्थ पत्रकारिता के दुखी आत्माओं ने लगातार लोगों को गुमराह करते रहने का काम किया । इनके नजर में सिर्फ एक पक्ष पर ही लगातार अंगुली उठाते रहने को ही असल निष्पक्षता कहते हैं । जेएनयू अथवा कहीं और लगे देशविरोधी नारों के समय इनकी निष्पक्षता घास चरने चली गई थी । इनका एक और तर्क यह होता है कि , सवाल तो सरकार से ही पूछे जाते हैं विपक्ष से नहीं लेकिन जब यह सरकार विपक्ष में थी तब यह विपक्ष से ही सवाल पूछते नजर आ रहे थे ।
कहां थे ये लोग कश्मीरी पंडितों के समय ?
ये तमाम लोग वे लोग हैं जिन्हे चोरी के आरोपी की पिटाई से हुई मौत मॉब लिंचिंग नजर आई लेकिन तिरंगा यात्रा कर रहे देशभक्त नौजवान की मौत नजर नहीं आई । अखलाक पर छाती पीटने वाले लोग डॉ नारंग पर पूरी तरह चुप हो जाते हैं । ये है इनकी निष्पक्षता और तटस्थता का असली पैमाना ।
दरअसल ये वो लोग हैं जो एक प्रकार का संगठन चला रहे हैं जिसका मुख्य कार्य है मोदी विरोध । इन्हें पता ही नहीं चला कि ये कब मोदी विरोध में पहले हिंदुत्व और फिर राष्ट्र विरोधी हो गए । इस पूरे प्रकरण में सबने अपनी अपनी तय भागीदारी के अनुसार देश जलाने में पूरा सहयोग किया । विपक्ष के लगभग सभी दलों अथवा नेताओं ने पूरी ईमानदारी से लोगों को गुमराह किया । मीडिया के तथाकथित निष्पक्ष लोग जो हमेशा से ही विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र द्वारा स्थापित सरकार को चुनने वाले मतदाताओं को कोसते और गाली देते आए थे उन्हें कोसने का एक और मौका मिल गया । तथाकथित बुद्धिजीविगण जिनका देश के निर्माण अथवा उत्थान में कोई योगदान कभी नहीं रहा वे भी इस मसले पर ज्ञान बांचते नजर आए । आलम ये रहा कि देशविरोधी नारों के सरगना भी देशभक्ति पर ज्ञान देने लगे । भारत माता की जय और वन्दे मातरम बोलने से जिनके वजूद खतरे में आ जाते थे वे भी माचिस, देश विरोधी नारे और पत्थर लेकर संविधान बचाने उतर आए । ये वही लोग हैं जो तीन तलाक और हलाला पर शरिया और सीएए पर संविधान की बात करते हैं ।
इन तमाम गतिविधियों में एक शायर का एक शेर भी बड़ा प्रचलित हुआ कि ” सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में ” । लेकिन इतिहास सदैव याद रखेगा कि जब देशहित में कदम बढा़या गया तब इन्हीं देशभक्तों ने किस प्रकार देश जलाया था ।

विक्रम कुमार
मनोरा, वैशाली

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