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आकांक्षी भारत को महंगाई डायन का डर

जन्म से लेकर मृत्यु तक हर व्यक्ति की कुछ जरूरतें होती है जिसकी पूर्ति के लिए वह आजीवन मेहनत करता है। इनमे से कुछ आवश्यकताएं ऐसी भी होती है जिनकी पूर्ति के बिना जीवन संभव नहीं होता।इंसान की इन्हीं जरूरतों को अर्थशास्त्र में आवश्यक आवश्यकता कहा गया है।जिन्हें किसी भी सूरत में पूरा करना होता है। इन में सबसे पहला स्थान भोजन का और दूसरा कपड़े का है और मकान तो तीसरे स्थान पर आता है। इन तीनों की पूर्ति हो जाने के बाद ही व्यक्ति अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की सोचता है। जिसे पूर्ण करने में जीवन खप जाता है ।वैसे व्यक्ति की आवश्यकताए अनन्त होती है जिसकी पूर्ति आय के स्तर पर निर्भर करती है परंतु आवश्यक आवश्यकताए जीवन का आधार है। जिन पर दिनों.दिन हावी होती जा रही महंगाई की डायन ने आम आदमी की हालत पतली कर दी है। देश की विकास दर पिछली छह तिमाहियों से लगातार घट रही है। औद्योगिक उत्पादन दर पिछले तीन महीनों से नकारात्मक है और महंगाई दर पिछले तीन सालों के चरम पर है,खाद्य महंगाई तो बेकाबू हो ही गई है। उपभोक्ता मांग में कोई कारगर सुधार नहीं है और खुदरा कर्ज भी सरकार को मुंह चिढ़ा रहा है। परिणाम् यह है कि आवश्यक आवश्यकता की पूर्ति करने में टूटते जा रहे आम आदमी की थाली में दालें पतली होती जा रही है।लहसुन,प्याज के अभाव में सब्जी बेस्वाद हो गई है।खाद्य तेल अरैर दूसरी चीजों के दाम भी लगातार बढ़ रहें हैं।बाजार पर अगर आप गौर करें तो पिछले दो महीने मे खुला आटा 3 रूपये किलो तक बढ़ गया है।अरहर की दाल,चावल,मसाले यहां तक की लाल र्मिच भी बहुत तीखी हो गयी है।छोटी इलायची तो पांच हजार रूपये किलो बिक रही है।शुगर,बीपी,बुखार और एंटीबायटिक दवाओं के दाम पर भी लगाम नही है।दरअसल मंहगाई डायन खाए जात है गीत की लाइनें सन 2014 के पहले देश की राजनीतिक फिजां मे बहुत तैरी थी।एक तरह से मनमोहन सरकार की अलोकप्रियता की ये एक बड़ी वजह थी।वहीं मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि तमाम बेरोजगारी और नोटबंदी के हल्ले के बावजूद,मंहगाई काबू से बाहर नहीं हुई।पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ रही बेरोजगारी के बीच अगर किसी चीज से राहत थी,तो वह थी मंहगाई इसलिए मोदी सरकार के तमाम मंत्री भी बेरोजगारी को काउंटर करने के लिए स्थिर महंगाई दरों का सहारा लिया करते थे और इसे सरकार की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया करते थे। लेकिन मोदी सरकार के इस दूसरे कार्यकाल में मंहगाई फिलहाल नहीं बख्श रही।जब से सरकार का मौजूदा कार्यकाल शुरू हुआ है,तब से खुदरा महंगाई लगातार बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था के विकास की दर लगातार नीचे गिर रही है।आर्थिक सुस्ती के इस माहौल में खाने-पीने की चीज़ें महंगी हो रही हैं।पेट्रोल-डीजल की क़ीमतें भी बढ़ी हैं,सब्जियों और दूध के दामों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।गौरतलब है कि महंगाई की बास्केट में खुदरा महंगाई दर का 50 फीसदी के करीब योगदान होता है।बीते साल में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है,लेकिन सरकार इसे ठीक से नियंत्रित नहीं कर पा रही है।सरकार का एक पक्ष कहता है कि चीज़ों की खपत कम हो रही है।लेकिन ये बड़ा सवाल है कि अगर खपत कम है तो क़ीमतें क्यों बढ़ रही हैं!अगर भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर नज़र डालें तो भ्रष्टाचार और परिवारवाद से बड़ा मुद्दा महंगाई का होता है।जानकार कहतें हैं कि राजनीतिक पार्टियों को तमाम फैक्टर्स से वोट मिल सकते हैं लेकिन जो सरकार महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर सकती उसके लिए आगे बहुत गहरा संकट खड़ा हो जाता है,ख़ासकर खाने पीने की चीज़ों के दाम बढ़ने पर। दरअसल खुदरा या रीटेल महंगाई दर,महंगाई की वह दर है जो प्रभावित तो हर किसी को करती है,लेकिन इससे प्रभावित होते हुए सबसे ज्यादा आम आदमी ही दिखता है।दरअसल खुदरा महंगाई दर में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 50 फीसदी तक होती है और आम आदमी खाद्य पदार्थों का निरंतर सक्रिय ग्राहक होता है। इसीलिए दुनियाभर के ज्यादातर देशों में खुदरा महंगाई के आधार पर ही मौद्रिक नीतियों का निर्माण होता है। नवंबर 2019 का आंकड़ा बताता है कि एक साल में सब्जियों के दाम 30 फीसदी बढ़े।आलू और दूध जो बेहद आम चीज़ें मानी जाती हैं उनकी कीमतें बढ़ी हैं।भारतीय रेल ने नये साल की शुरूआत से ही यात्री किराया बढ़ा दिया है।इसके मुताबिक सामान्य श्रेणी के नॉन-एसी ट्रेन के किराए में एक पैसे प्रति किलोमीटर की बढोत्तरी की गई है।मेल और एक्सप्रेस नॉन-एसी ट्रेनों के किराए में दो पैसे और एसी ट्रेन के किराए में चार पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गई है। बढ़ा हुआ किराया प्रीमियम ट्रेनों पर भी लागू हो रहा है।एक आंकड़े से बढ़ती मंहगाई को समझा जा सकता है।अगर शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों पर समग्र रूप से गौर करें तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित महंगाई दर दिसंबर,2019 में 7.35 फीसदी आंकी गई थी,जो दिसंबर, 2018 में 2.11 फीसदी थी। वहीं सीपीआई पर आधारित महंगाई दर नवंबर, 2019 में 5.54 फीसदी थी। इसी तरह यदि शहरी एवं ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों मे उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) पर आधारित महंगाई दर दिसंबर, 2019 में 14.12 फीसदी रही है, जो दिसंबर, 2018 में 2.65 फीसदी थी। वहीं,सीएफपीआई पर आधारित महंगाई दर नवंबर, 2019 में 10.01 फीसदी थी।अर्थशास्त्र कहता है कि किसी भी वस्तु की मांग के अनुरूप जब आपूर्ति घटती है अथवा उस का उत्पादन कम होता है तब मूल्य वृद्धि होती है ।ऐसी स्थिति में चालाक साहूकारों की चांदी कटती है और निरीह बन चुके आम आदमी को निगलने के लिए महंगाई डायन सुरसा की तरफ मुंह फैलाए तैयार रहती है। ऐसे में महंगाई को रोकने के लिए मांग के अनुरूप न तो आपूर्ति में वृद्धि हो रही है और न ही उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। महंगाई की डायन को रोक पाने में आम आदमी के साथ सरकार की संभवतः इसीलिए असफल रही है क्योंकि महंगाई के स्रोत को समझने का या तो प्रयास नहीं किया जाता यर फिर अनदेखी की जाती है।तरह.तरह की प्राकृतिक आपदाओं का शिकार किसान खाद्य पदार्थों के उत्पादन के मामले में आज जहां पिछड़ता जा रहा है वहीं सेठ साहूकारों द्वारा कई गुना लाभ के चक्कर में आवश्यक खाद्य वस्तुओ का भंडारण कर महंगाई की डायन को ताकत दी जा रही है। ऐसे अराजक सेठ साहूकारों द्वारा आवश्यक खाद्य वस्तुओं का संकट पैदा करने के चलते बाजार में कीमतें बढ़ जाती है,और वहां भंडारित सामग्री मुंह मांगे दाम पर बेची जाती है। जिनके विरुद्ध कारवाई से सरकारें भी कतराती हैं।खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई को नियंत्रित न कर पाने के लिए सरकारी मशीनरी भी कम जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि सरकारें अनाज खरीदती हैं और खाद्य एजेंसिया उसे सड़ा डालती है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में प्रतिवर्ष 56 हजार टन से अधिक खाद्यान्न सड़ जाता है और 18 करोड़ से अधिक लोग रात को भूखे सो जाते हैं। 19 करोड़ से अधिक लोग कुपोषण के शिकार हैं। जिनकी सुधि लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।यह भी एक तथ्य है कि नेताओं को महंगाई और गरीबी का मुद्दा सिर्फ चुनाव में याद आता है। बाद में लोग विकास में जुट जाते हैं। शायद वह नेताओं का अपना विकास होता है। जिस की चकाचैंध में उन्हें आम आदमी दिखता ही नहीं।नये दशक के पहले बजट के शुरू मे सबके मन में यही सवाल थे और उम्मीद थी कि मंहगाई और बेरोजगारी पर साफ़ जवाब मिलेंगे।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपना दूसरा पहला बजट पेश करते हुए उसकी थीम आकांक्षी भारत,आर्थिक विकास और हितैषी समाज बताई।इस बजट से आम आदमी, किसान, कॉरपोरेट जगत को भी कई सारे आकांक्षाए थी।उसे उम्मीद थी कि मंदी के भंवर में फंस चुकी अर्थव्यवस्था को निकालने के लिए वित्त मंत्री लोगों के बजट में इजाफा करेंगी। ज़्यादा आशावादी लोग कुछ ऐसी धमाकेदार घोषणा सुनने की तैयारी में भी थे जिनसे अर्थव्यवस्था की तस्वीर ही बदल जाएगी।लेकिन आम आदमी से सीघे जुड़े उन सवालों का तो कोई साफ़ जवाब दो घंटे 41 मिनट के भाषण में मिला नहीं।लेकिन दीनानाथ कौल की कश्मीरी कविता और तमिल में तिरुवल्लुवर और संस्कृत में कालिदास के उद्धरण भी सुनने को ज़रूर मिल गए।यही नही इतिहास पर भी ज्ञान मिला और ये भी पता चल गया कि हम सिंधु सभ्यता से भी व्यापार की प्रेरणा ले सकतें है।गौरतलब है कि साल 2018 तक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था रहा है, जिसमें साल 2016 में विकास की दर 9.4 फ़ीसदी तक थी।हालांकि अब अर्थशास्त्रियों को लगता है कि 2020 उतना बेहतर नहीं दिख रहा क्योंकि जो भी कदम उठाए गए हैं उनका असर कम होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि साल 2016 में हुई नोटबंदी का असर अब भी अर्थव्यवस्था पर है और उसके बाद जीएसटी लागू करना और दुनिया भर में आर्थिक विकास के माहौल से भी मदद नहीं मिली।दूसरी तरफ एक अलग राय रखने वाले विशेषज्ञ भी हैं।उनका मानना है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने में मानसूम में देरी और सूखे जैसी समस्याएं भी जिम्मेदार हैं, जिनकी वजह से सप्लाई का पैटर्न बिगड़ता है।साल 2019 में मानसून सामान्य नहीं रहा, जिसकी वजह से कीमतें कम हो सकती थीं। इस साल भी भारी बारिश हुई जो दो दशक में सबसे अधिक थी जिससे गर्मियों में होने वाली फ़सलें खराब हो गईं और सर्दियों में होने वाली फ़सलों में देरी हुई।इसी लिए अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में जब रबी की फसल बाज़ार में आएगी तब स्थिति सुधर सकती है और दाम गिर सकते हैं।बहरहाल देश भर मे सीएए और एनआरसी के ओदोलनों के कारण फिलहाल आर्थिक मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। देश में बेरोजगारी पिछले 45 सालों के सर्वोच्च स्तर पर है और अधिसंख्य आबादी की आय वृद्धि न्यूनतम पर है।इस लिए जानकारों का मानना है कि ये मसला सिर्फ़ आर्थिक नहीं है,राजनीतिक भी है।अगर सरकार तेज़ी से इस पर कोई कड़ा क़दम नहीं उठाती तो उसे इसके राजनीतिक नुक़सान भी झेलने पड़ सकते हैं।लेकिनद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले एसोसिएटेड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की कॉन्फ्रेंस में कहा है कि सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का काम किया है और 2025 तक देश को पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का टारगेट पूरा करने की मज़बूत नींव रखी है।

शाहिद नकवी

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