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आवश्यकता और लालच के बीच त्रिशंकु मनुष्य

माँ एक नवजात शिशु को जन्म देती है। तत्पश्चात, धरती उस शिशु को शेष जीवन के लिए अपनी गोद में जगह देती है। उसके फलने-फूलने के हरसंभव प्रयास करती है। किंतु, वही शिशु बड़ा होकर मूर्खता और आत्म-घृणित नुकीलेपन की कुल्हाड़ी से पर्यावरण को चोट पहुँचाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। प्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण पर चली यह कुल्हाड़ी परोक्ष रूप से समूल मानवजाति के विनाश का कारण बनती है। धरती पर असंख्य जीवों में मनुष्य एक है। किंतु उसे अपने सिवाय दुनिया में कोई दिखायी नहीं देता। अपनी बुद्धि और विचार शक्ति से वह सभी प्राणियों पर हावी होने का प्रयास करता रहता है। कई बार सफल भी होता है। बुद्धि दोधारी तलवार की भांति है। सदुपयोग हो तो विश्वकल्याण नहीं तो विश्वविनाश। विश्वकल्याण की परिकल्पना में सभी जीवों का हित निहित होता है।
आज विकास और औद्योगीकरण के नाम पर धरती खोखली होती जा रही है। प्रदूषित जल, जानलेवा गैसें, कल-कारखानों व वाहनों की तीव्र ध्वनि तथा वनस्पति विहीन क्रांक्रिट व प्लास्टिक जंगल धरती के रक्षा कवच पर्यावरण को नेस्तनाबूद करने पर तुले हैं। मनुष्य अपने हाथों अपना गला दबा रहा है। आए दिन खनिज खनन के लालच में भूस्खलन जैसी घटनाओं को दावत दे रहा है। अमेजान तथा आस्ट्रेलिया के जंगल, जो समस्त प्राणी जगत को ऑक्सीजन का लगभग पाँचवाँ हिस्सा प्रदान करते हैं, हाल के दिनों में धूँ-धूँ कर जल रहे थे। जब-जब प्रकृति असंतुलित होती है तब-तब मनुष्य को भूकंप, अकाल, बाढ़, भूस्खलन, ज्वालामुखी के प्रकोप का निवाला बनना पड़ता है। आज स्थिति इतनी दयनीय है कि धीरे-धीरे हिमालय पिघलते जा रहे हैं। ध्रुवीय भालू मरते जा रहे हैं। दुर्लभ जीव-जंतु, वनस्पित लुप्त हो रहे हैं। हर पाँच में से दो व्यक्तियों को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है। क्या हम अपने भविष्य की पीढ़ी को यही देने जा रहे हैं?
क्या सृष्टि में मनुष्य से परे कोई और स्वार्थी प्राणी हो सकता है? मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति पर चोट करने से नहीं हिचकता। एक पेड़ के कटने से कितने जीव निराश्रित होते हैं, शब्दों में बयां कर पाना कठिन है। बहुमंजिला अट्टालिकाओं के बीच चमकने वाला सूरज, बारिश के बूँदों की फुहार, चहचहाने वाली गोरैया, रंग-बिरंगी तितलियों के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। अब लोगों के पास इतना समय नहीं कि वे इन सबके बारे में सोचे। वह तो चौबीसों घंटों मोबाइल के मोहजाल में फंसा रहता है। पहले लोग अपने घरों में कनेर, नींबू, अमरूद, अनार, मेहंदी, चांदनी आदि पेड़-पौधे लगाते थे। इसी बहाने पक्षियों का चहचहाना सुनने को मिल जाता था। अब या तो इन्हें लगाने के लिए जगह नहीं बची है या इतना सब सोचने की हमारे पास फुर्सत नहीं है। शहरों और गाँवों में बड़ी तादाद में लगे मोबाइल फ़ोन के टावर भी गौरैया समेत दूसरे पक्षियों के लिए बड़ा ख़तरा बने हुए हैं। इनसे निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें उनकी प्रजनन व गतिकी क्षमता पर बुरा प्रभाव डालती हैं। परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से मनुष्य असंख्य जीवों का हत्यारा बन जाता है। इन हत्याओं के लिए कोई सुनिश्चित दंड विधान नहीं है। और न ही कोई जिम्मेदारी। हाँ, कभी मन आया तो ‘रोबो 2.0’ देख ली और सोशल मीडिया पर दो-चार पोस्ट डालकर कुछ टीका-टिप्पणी कर दी। बस, हो गयी पूरी जिम्मेदारी!
हाल के दिनों में, मानव निर्मित पर्यावरण के चलते छोटे जीवों का अस्तित्व खतरे में आ पड़ा है। यही कारण है कि पहले जो गौरैया कभी हमारे घरों को गुलजार करती थी, आज उसे ढूँढ़कर लाने वाले को इनाम देने पर मजबूर हो गए हैं। कीटनाशकों, सेलफोन टावरों और जल प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में मधुमक्खियों, पक्षियों और समुद्री जीव मारे जा रहे हैं। पश्चिमी सोच ने पिछले दो-तीन शताब्दियों से हमारी संस्कृति और सभ्यता को प्रभावित किया है। मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का लगातार हनन कर रहा है। विकास के नाम पर मनुष्य की यात्रा ने उसे गर्त में डाल दिया है। मनुष्य कम समय में अधिक से अधिक विकास की आकांक्षा से प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन कर रहा है। परिणामस्वरूप, उसकी प्रगति निरर्थक रही है। पर्यावरण प्रदूषण आज दुनिया में मानव अस्तित्व पर सवाल उठाने वाले प्रमुख मुद्दों में से एक है। इस विनाशकारी प्रवृत्ति का कारण मानवीय त्रुटि है।
दुनिया प्लास्टिक दानव का शिकार हो रही है। हमारे जीवन में प्लास्टिक कुछ इस तरह घुल-मिल गया है कि उसके बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है। यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित अपने देश में प्लास्टिक के पुनरुपयोग हेतु कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली नहीं है। वियतनाम, कंबोडिया जैसे देशों में प्लास्टिक सामग्री का उपयोग कम किया जाता है। यदि किया भी जाता है तो उसे तुरंत जला दिया जाता है। अतः दुनिया के सभी देशों को प्लास्टिक के उपयोग पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। रीसाइक्लिंग सामग्री के निर्माण में उपयोग किए जाने वाले प्लास्टिक कचरे की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
प्रकृति ईश्वर का दिया हुआ एक उपहार है। इसकी रक्षा करने जिम्मेदारी हम सब पर है। रीसाइक्लिंग के माध्यम से विभिन्न प्रकार के प्रदूषकों को रीसायकल करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। सिंचाई के लिए दैनिक उपयोग के गंदे पानी का नियमित उपयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा, चिमनी को उच्च ऊंचाई पर रखा जाना चाहिए ताकि उन्हें धूम्रमुक्त बनाया जा सके। उच्च तापमान पर जहरीले रासायनिक कचरे को जलाया जाना चाहिए। सामान, सब्जियों आदि के लिए प्लास्टिक की थैलियों के बजाय, कपड़े, कागज और लिनन बैगों का उपयोग करने से पर्यावरण में प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। यहां तक कि बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। उन्हें अपने साथ पौधे लगाना और दोस्तों के जन्मदिन पर पौधे देना सिखाया जाना चाहिए। पक्षी आसमान में उड़ता है, मछली पानी में तैरती है, चीता तेज़ी से दौड़ता है लेकिन ईश्वर ने हमें वरदान के रूप में सोचने के लिए बुद्धि दी है। इससे हम परिवर्तन और सुधार दोनों ला सकते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था- “धरती के पास सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता है। किसी के लालच की नहीं।“ यदि मनुष्य आवश्यकता छोड़ लालच के पीछे दौड़ेगा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी गिनती लुप्तप्राय प्राणियों में होने लगेगी-
‘उरतृप्त’ जरूरत रखना लेकिन, रहना लालच से तू दूर।
पता नहीं कब क्या हो जाए, यह लालच है अति क्रूर।।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
https://hi.wikipedia.org/s/glu8

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