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अमेरिका भी हुआ हिंदी का मुरीद

भारत और अमेरिकी संबंधों में गुजरात का मोटेरा स्टेडियम नई इबादत लिखेगा। राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली यात्रा पर भारत आए दुनिया के सबसे शक्तिशाली शख्सियत डोनाल्ड ट्रम्प बेहद खुश और गौरवान्वित दिखे। लेकिन एक बात जो खुल कर सामने आई है वह है हिंदी की अहमियत को लेकर। मोदी और ट्रम्प की इस जुगलबंदी ने हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाया है। वैसे तो मोटेरा स्टेडियम में आयोजित इस कार्यक्रम की मूल थींम हिंदी यानी नमस्ते ट्रम्प पर आधारित थी। लेकिन ट्रम्प और मोदी ने लाखों की भीड़ को हिंदी यानी नमस्ते से संबोधित किया। अपनी भारत यात्रा के दौरान ट्रम्प ने तीन बार हिंदी में ट्यूट किया।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने हिंदी की स्वीकार्यता को निश्चित रुप से बढ़ाया है, यह हर भारतीय और हिंदी प्रेमी के लिए गौरव की बात है। ट्रम्प ने हिंदी फिल्म शोले और शाहरुख का भी जिक्र किया। जबकि देश में हिंदी भाषा की स्वीकार्यता पर संसद से लेकर सड़क तक खूब राजनीति होती है। पूर्वोत्तर भारत में हिंदी और हिंदी भाषियों के साथ क्या सलूक होता है यह बात किसी से छुपी नहीं है। दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर क्या स्थिति है सब जानते हैं। गुजरात में हिंदी भाषियों पर किस तरह जानलेवा हमले हुए यह कहने की बात नहीं है। लेकिन ट्रम्प ने उसी गुजरात की धरती से हिंदी को बड़ा सम्मान दिया है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा भले मिल गया हो लेकिन राष्ट्रभाषा का सम्मान आज तक नहीं मिल पाया है। सरकारी परीक्षाओं को हिंदी माध्यम से कराने पर भी राजनीति होती है। अंग्रेजी सोच की हिमायती राजनीति हिंदी बोलने में अपना अपमान और शर्म महसूस करती है। अधिकांश राजनेता अपने ट्यूट अंग्रेजी में करते हैं। जबकि अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हिंदुस्तान और हिंदी की अहमियत समझते हुए अपनी भारत यात्रा को हिंदीमय बना दिया। इससे यह साबित होता है कि हिंदी अब बेचारी नहीं बल्कि ग्लोबल धमक वाली हो गई है।

अंग्रेजी के हिमायत यह कह सकते हैं कि ट्रम्प ने यह सब अमेरिका में होने वाले आम चुनाव के लिए किया। क्योंकि अमेरिका में भारतीय मूल के 40 लाख लोग रहते हैं। लेकिन आलोचकों को यह सोचना होगा कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति को हिंदी में ट्यूट की क्या जरुरत थी। वह अपनी बात अंग्रेजी में भी कह सकते थे। निश्चित रुप से हिंदी का ग्लोबल मान बढ़ाने में ट्रम्प और मोदी का अहम योगदान है। पहले ट्यूट में उन्होंने लिखा हम भारत आने के लिए तत्पर हैं। हम रास्ते में हैं, कुछ ही घंटों में हम सबसे मिलेंगे। दूसरे और तीसरे ट्यूट में उन्होंने भारत और अमेरिकी संबंधों का जिक्र किया। इसका असर भी अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों पर बेहद गहरा होगा। लोग इस ट्यूट के राजनीति मायने चाहे जो निकालें, लेकिन एक बात सच है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ी है।

हिंदी में संबोधन किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की कोई नई पहल नहीं है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब 2010 में भारत आए तो उन्होंने भी अपने सत्कार से प्रभावित होकर हिंदी में ‘बहुत-बहुत धन्यवाद’ बोलकर भारत और भारतीयता के प्रति अभार जताया था। जबकि भाषण का अंतिम संबोधन ‘जयहिंद’ से किया था। विदेशी धरती पर सिर्फ हिंदी नहीं उसकी क्षेत्रिय भाषाओं का भी जलवा कायम रहा है। आपको याद होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपनी अमेरिकी यात्रा पर गए थे तो तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गुजराती भाषा में ‘केम छो मिस्टर मोदी’ से स्वागत किया था। जब अमेरिका में आम चुनाव हो रहे थे तो वहां भी ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ की गूंज सुनाई दी थी। भारत में गढ़ा इस चुनावी जुमले का इस्तेमाल खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने किया था। भारत में 2014 के आम चुनाव में यह चुनावी नारा खूब गूंजा था अबकी बार मोदी सरकार। हिंदी की अहमियत और ग्लोबल स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी अहम योगदान है। जबकि इससे पूर्व भारत के कई राजनेता वैश्विक मंच पर हिंदुस्तान और हिंदी का मान बढ़ाते आए हैं। प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं में हिंदी का खुल कर प्रयोग करते रहे हैं। हिंदी को ‘ग्लोबल’ बनाने में भी खास योगदान रहा है। अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान ट्रम्प से मुलाकात में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था।

देश की परराष्ट्रमंत्री सुषमा स्वराज आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन हिंदी के उत्थान और विकास के लिए उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता है। विदेशमंत्री रहते हुए संयुक्तराष्ट्र संघ में 2017 में उन्होंने ने हिंदी में भाषण देकर पाकिस्तान को खूब लताड़ लगाई थी। सुषमा स्वराज अपनी प्रखर भाषण शैली और बेवाक हिंदी के लिए जानीजाती थी। संसद में जब बोलती थीं तो सन्नाटा पसर उठता था। भारत की संसद से लेकर वैश्विक मंच पर उन्होंने हिंदी का मान बढ़ाया। भारत रत्न एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का हिंदी प्रेम किसी से छुपा नहीं है। अटल जी अपने विदेशी दौरों के समय कई मंचों पर हिंदी में अपनी बात रखी। 1977 में संयुक्तराष्ट्र संघ में उन्होंने अपना पहला भाषण हिंदी में दिया था। यह बेहद प्रभावशाली भाषण था जो नस्लवाद और मानवधिकारों पर दिया गया था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहर लाल नेहरु भी हिंदी के विशेष हिमायती थे। उनकी पहल पर ही 14 सितम्बर को ‘हिंदी दिवस’ रुप में मानाया जाता है। क्योंकि 14 सितम्बर 1949 को हिंदी को संविधान सभा में अधिकारिक भाषा सम्मान मिला था। सोशलमीडिया में हिंदी का अच्छा प्रयोग हो रहा है। लोगों की पहली पसंद बने ट्यूटर पर भी हिंदी पर काफी ट्यूट किए जा रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसे जो सम्मान मिलना चाहिए वह नहीं मिल सका है। अब वक्त आ गया है जब हमें हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता को समझते हुए राजनीति को किनारे रख हिंदी को और संवृद्ध बानाने के लिए काम करना चाहिए।

प्रभुनाथ शुक्ल, स्वतंत्र लेखक और पत्रकार

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