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न्नपूर्णा

अन्न का अपमान और बर्बाद करने वालों,
ज़रा देखो इनकी मज़बूरी को।
नहीं कोई आस पाने की,
फिर भी जीवन जीते हैं।
अपने दमन की ख़ुशियों को,
बच्चों की झोली में डालते हैं।

मैं चाहती नहीं…….
मेरे बच्चे भूखे सो जाएं।
मैं चाहती नहीं……
मेरे बच्चे ग़रीबी में खो जाएँ।
मैं चाहती नहीं……..
नन्हें क़दम भूख से तिलमिलाए।
मैं चाहती नहीं…….
उनकी प्यास आँसू बन जाए।

मेरी तो बस यही आशा है।
जग वालों से……..
यदि कभी किसी को
खाना न खिला सको
उनके मुख से छीनों मत…..
तुम किसी से भेद भाव कर सको
हो सकता है यह मुमकिन हो…..
पर मैं अपने बच्चों में भेद करूँ
यह कभी ना मुमकिन होगा।

अन्नपूर्णा देवी कहलाती हूँ
माँ का दर्जा पाती हूँ
मेरी बस यही आशा है
नहीं किसी को निराशा हो
सब पर समान प्रेम बरसाऊं
नहीं किसी को भूखा सुलाऊँ
मेरा बस यह मान रखना
नहीं कोई अभागा हो
जिसके नसीब में नहीं है कुछ भी
उसे तो अन्नदान करो……
उसे तो अन्नदान करो……
उसे तो अन्नदान करो……

 

गीतिका पटेल

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