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अंतिम दस्तखत का दर्द

एक शाम को काले घने बादल छाए हुए थे और ठंडी हवाएं चल रही थी । रामबाबू आंखे बंद करके बहती हुई इस ठण्डी हवा को अपने चेहरे पर महसूस कर रहे थे। ऐसा करना उन्हें हमेशा ही सुकून देता है । उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किया है , ठोकरे खाई है और तब जाकर बैंक में नौकरी लगी थी । अब रिटायरमेंट की उम्र हो चुकी थी ।
अभी रामबाबू के रिटायरमेंट में दो महीने बाकी थे और स्टाफ के लोग थे कि पहले से ही उनसे विदाई वाले लहजे में बात करने लगे थे । उनके एक बैंक कर्मचारी प्रभुनाथ ने पूछा – और रामबाबू भईया .. जी पी एफ के पैसे कहाँ लगाएंगे ? मेरी मानो तो लगते हाथ बिटिया के हाथ पीले कर ही दो .. क्या पता फिर पैसे बचे न बचे . और हां भई भूल मत जाना हमें , मिलते रहिएगा और बेटी की शादी में हमें जरूर बुलाना । ऐसे ही तमाम किस्म की बातें रामबाबू को रोज सुनाई पड़ने लगी थी । जो रामबाबू को अंदर तक कचोट डालती । वह कुछ जवाब देने के बजाय मन ही मन उन कथित शुभचिंतकों पर गुस्सा निकालते थे – ” स…साले इनका दम क्यूँ निकल रहा है , पूरे बत्तीस साल गुजारे है इस बैंक में। बैंक का अभिन्न अंग बन कर रहा हूँ और ये लोग ऐसे बर्ताव कर रहे है जैसे मेरा रिटायरमेंट नहीं बल्कि अर्थी उठने वाली है मेरी । जैसे ये बैंक इनके बाप का ही है ”
रामबाबू एक छोटे से गांव से निकलकर 32 साल पूर्व इस नागपुर शहर में आकर बसे थे । उस समय तक उनका वहां कोई सगा- सम्बन्धी नहीं था और न ही कोई परिचित ।
लेकिन आज लम्बे अरसे बाद शहर का व बैंक का एक- एक कोना उनका साथी था जिसे छोड़कर जाना रामबाबू के लिए गांव से भी कठिन था। रामबाबू ने इस शहर को इतराते , जलते , रेंगते, भागते , बदलते, उदास, खिलखिलाते सब रंगों में देखा है । उन्हें बड़ी तकलीफ होती जब कोई उनसे रिटायरमेंट के सवाल करता ।
रामबाबू का मन अब घर में भी नहीं लगता था क्योंकि रामबाबू की पत्नी तीन वर्ष पूर्व ही कैंसर से जंग हार चूकी थी । रामबाबू के 1 बेटा विनायक व एक बेटी अंजली है। विनायक उसी शहर में किसी निजी कंपनी में काम करता है और अंजली प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी ।
जैसे-जैसे रिटायरमेंट के दिन समीप आते जा रहे थे , लगता था जैसे कोई समय उनकी मुट्ठी से खींचे लिए जा रहा हो ।
समय तब नहीं ठहरता जब उसकी तासीर कहीं भीतर तक हलचल कर रही होती है । घर में जाते ही बेटा पूछता – पापा आप आजकल घर लेट आते हो , अब आप चैन से क्यों नहीं बैठते , अब तो निवृत होने वाले हो । वे सकपकाए से अपने कमरे में घुस जाते । क्या बताते और आखिर किसे बताते अपने मन की बात । आज पत्नी जिंदा होती तो शायद उसे बताकर मन हल्का कर लेते । रामबाबू अतीत के लम्हों में खोए हुए छत को एकटक निहार रहे थे ।

रामबाबू की शादी गांव में ही अनिता से हुई थी । शादी के बाद रामबाबू व अनिता दोनों का जीवन इतना व्यस्त व आपाधापी भरा रहा कि पता ही नहीं चला समय कब पंख लगाकर जीवन की सांझ में धकेल गया । उनका और अनिता का साथ 35 बरस तक रहा लेकिन जिंदगी की जद्दोजहद के बावजूद भी अनिता की रामबाबू से कभी कोई शिकायत नहीं थी । जीवन की आपाधापी में यूं तो दो जून की रोटी की लड़ाई में वक्त का तकाजा कई चीजों को खा जाता है । जैसे रामबाबू से उनकी बीवी दूर चली गयी ।
अनिता कई बार कहती थी – कुल कितना बनेगा जी पी एफ । सारा लाकर हमें दे देना । हम दोनों बच्चों में बराबर बांट देंगे । अनिता ने अपने लिए कभी कोई ख्वाहिश नहीं रखी , यह बात रामबाबू को बहुत चूभती थी। लेकिन रूठने- मनाने वाली अचानक ही जिंदगी के इस सफर में साथ छोड़ गई। और रामबाबू हमेशा के लिए अकेले पड़ गए ।

अब तो उनका खाना- पीना भी कम हो गया था। यहां वहां बैठ कर गप्पे मारते और अपने गम को भुलाने की कोशिश करते । लेकिन वहीं बैठे- बैठे कोई उनकी दुखती रग पर उंगली रख देता तो उनका रोम-रोम चीत्कार उठता ।
इसी गम में महीना बीत रहा था । ज्यों-ज्यों महीना सरके , लगे उनके पांव के नीचे से जमीन सरक रही है और सिर से आसमान । जब चीजें अपनी पकड़ से छूटने लगती हैं तो इंसान उन्हें और सख्ती से पकड़ने का प्रयत्न करता है । लेकिन नियति कुछ भी शेष नहीं रहने देती । आखिर ये दो महीने भी रिसते रिसते बीत गए। अप्रैल की दस तारीख धम्म से सामने आकर खड़ी हो गयी । आज रामबाबू 1 घण्टे पहले ही बैंक पहुँच गए ।क्योंकि रात भर बेचैनी की वजह से सो नहीं पाए थे । रात भर एहसास होता रहा कि मानो नौकरी से नहीं , बल्कि जिंदगी से रिटायर होने जा रहे हो । बाकी सभी सदस्य चैन से सो रहे थे और रामबाबू सूनी आंखों से रात भर छत ताकते रहे आखिर सुबह हुई । पांच बजे ही रामबाबू नहा धोकर तैयार हो गए । सबसे अच्छा वाला सूट पहना । केवल चाय ही पीकर बैंक के लिए रवाना हो गए ।

शरीर में एक नई सी ऊर्जा भर गई । बैंक की तरफ चले तो लगा.. खुद ब खुद पैरों से प्राण निकलते जा रहे है ।
सारी दुनिया आज वैसी ही थी जैसी कल थी , एक रामबाबू की दुनिया को छोड़कर ।
बैंक पहुंचे तो देखा तो वहां एक चपरासी के अलावा कोई नहीं था । कुछ देर वहां खड़े रहे तभी चपरासी ने कुर्सी लाकर उनके पास रखी और बोला- बैठ जाइए सर , आज और बैठ जाइए … फिर ये कुर्सी अब कहाँ मिलेगी .. रामबाबू की सहसा आंखें भर आयी । मानों किसी ने जी निचोड़ लिया हो । लगा कुर्सी पर ढेर सारे कांटे उग आए हो उनसे बैठा ही नहीं गया । चली जाने वाली चीज से कैसा मोह ? । ” रामबाबू जाते हुए सोचने लगे कि इतना कुछ देखने के बाद अब यकीन से कह सकता हूँ कि वक्त किसी का भी नहीं होता है । ये अपनी चाल से चलता रहता है । यही वक्त कभी आपके चेहरे पर मुस्कान ला देता है । तो कभी आंसू । पर यही तो मजा है जिंदगी का । थोड़ी देर तक यूं ही सोचते रहे और बोला – नहीं राकेश , चलता हूं , बाद में आऊंगा ….अभी तो कोई आया भी नहीं है ।

ठीक है साहब – राकेश इतना बोलकर अपने काम में व्यस्त हो गया । रामबाबू चलते-चलते कुर्सी को बड़ी प्यार भरी नजरों से देखा । मानो कह रहे हो –

– “बत्तीस बरस तक तूने मुझे बहुत सम्भाला .. अब मुक्त करता हूँ तुझे अपनी कामनाओं से .” और चले गए । एक घण्टा बाद फिर बैंक पहुंचे । इस बार बैंक में चहलकदमी थी । लोग अलग- अलग कतारों में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे ।

पूरा स्टाफ अपने- अपने काम में व्यस्त था किंतु रामबाबू को जाने क्या कचोट रहा था। जी चाह रहा था समय ठहर जाए। बैंक से छुट्टी हो ही ना । यहां- वहां बैंक के हर एक कोने व दीवार को छू- छू कर महसूस करते रहे । एक पल को चैन नहीं था ।
अंदर ही अंदर में ज्वालामुखी बनते रहे , फटते रहे । उस प्यारी जगह को देर तक खड़े निहारते रहे जहां प्रायः फुरसत के पलों में वे अपने साथियों के साथ बैठकर चाय पीते थे । वही …. नीम का दरख़्त । बत्तीस साल तक जैसे उनके लिए ही खड़ा था और आज उन्हें आतुर- बाहों से गुहार रहा था । जैसे अभी रो देगा। मगर रामबाबू रो दिए । सम्मोहित से उधर चले गए और कुर्सी खींच कर उस दरख़्त के नीचे बैठ गए तो लगा सदियों तक वहीं बैठे रहे । इस जगह को छोड़ पाना अत्यंत पीड़ाजनक .. वेदना युक्त .. और औऱ … जैसे उनका रोम- रोम गम में डूब गया हो । रामबाबू कुर्सी पर पैर लंबे कर व सिर टिकाकर अतीत की स्मृति खंगालने लग गए । जब उन्होंने 27 की उम्र में पहली दफा ज्वाइन किया था । उसके बाद उनकी जिंदगी में कितने उतार- चढ़ाव आए जिनका साझी केवल ये बैंक रहा है । आज इसका
भी साथ छूटने वाला था । जैसे जीवन ही छूट रहा हो । इतना दुख केवल अनिता के साथ छोड़ जाने पर ही हुआ था। “रामबाबू ! मैनेजर साहब बुला रहे है आपको … साइन कर दीजिए ” पीछे से आई चपरासी की आवाज़ ने सहसा ही रामबाबू को अतीत से बाहर ला दिया । फिर हंस कर बोला – ” आज और कर लीजिये …” उन्हें ये शब्द सुईं की तरह चुभने लगे । शिराओं में ठंडक दौड़ गयी । बड़ी मशक्कत से उठे और बैंक की तरफ बढ़ गए । क्लर्क साथी ने कुर्सी पर बैठने का आग्रह कर रजिस्टर आगे खिसका दिया । वे धीरे से बैठ गए । कंपकपाते हाथों से पेन निकाला फिर साइन करने को हुए कि .. कि हाथ थरथरा गए । जी चाहा इस साइन के बीच कितना सारा अंतराल भर जाए जिससे वह और समय इस बैंक में गुजार सके ।
किंतु नहीं । क्लर्क ने चेताया- करिये रामबाबू .. आज आपका अंतिम हस्ताक्षर है ” इतना सुनते ही लगा तत्क्षण उन्हें किसी ने मृत्यु- शैया पर उठा कर फेंक दिया हो । उन्होंने लिखना शुरू किया- रामप्रसाद बनारसी …काफी देर में लिखा गया । जाने उन्होंने जान- बूझकर समय लगाया या लिखा ही नहीं जा रहा था । लगा वे किसी बैंक के रजिस्टर पर नहीं , तलाकनामे पर साइन कर रहे हो और दस्तखत पूर्ण होते ही उनका बैंक से हमेशा के लिए सम्बन्ध – विच्छेद हो गया । आँखे रिस आयी ।
क्योंकि किसी कर्म स्थल से जाना बेजान वस्तु को इधर-उधर कर देने के माफिक नहीं होता है । इतने वर्ष तक काम करने के बाद उस जगह से विदा लेना सहज नहीं होता । यह अंतिम दस्तखत का दर्द रामबाबू के सीने में खंजर से चुभ रहा था । अब उस दर्द को किसी से बयां भी नहीं कर सकते और ना ही उस दर्द , तकलीफ की कोई किताब लिखी जाती है और ना ही वह छाप पाती है ।
तभी चपरासी ने आकर सूचना दी – ” रामबाबू मैनेजर साहब ने कहा है उनसे मिल लीजिएगा ” वह बहुत कमजोर से उठे मानो जान निकल चुकी हो और मैनेजर के कार्यालय की तरफ चल दिये । मैनेजर साहब ने रामबाबू को अंदर कदम रखते देख पुलकते हुए कहा- आइये रामबाबू पधारें .। कल हम सब आपको विदाई- पार्टी देने जा रहे है…. ” क्या साहब पार्टी- वार्टी ” कम उम्र होने के कारण व अच्छे संस्कारों के कारण मैनेजर ने हमेशा उनकी इज्जत की है। रामबाबू को उनका यही बर्ताव भाता है । वह चुपचाप बैठे रहे । मैनेजर ने फिर धीरे से उनसे पूछा – ” रामबाबू , कैसा लग रहा है …?” वह एक पल को मैनेजर को देखते रह गए फिर धीरे से गहरी सांस लेते हुए व अपने आंसुओं को अंदर ही दबाते हुए बोले ” …. साहब लगता है सब कुछ खत्म हो गया है .. अंतिम हस्ताक्षर करना पहाड़ हो गया .

रीतेन्द्र कंवर शेखावत
Rajasthan university jaipur

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