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विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर जागरूकता सन्देश 

निःसंदेह, आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता (2/20) के माध्यम से स्पष्ट यह उद्घोष किया है – यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मती है और न मरती ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। अब प्रश्न उठता है कि यदि शरीर की हत्या के पश्चात्‌ भी आत्मा नहीं मरती, तो इसका होता क्या है? यह विभिन्न योनियों में भटकती है। शास्त्रों के अनुसार 84 लाख योनियाँ हैं। आत्मा एक देह की आयु पूरी कर अपने कर्मों के अनुसार दूसरी देह में प्रवेश करने को बाध्य होती है। इस प्रकार, वह एक-के-बाद-एक 84 लाख के चक्कर में घूमती रहती है। फिर जब कभी ईश्वर की असीम अनुकंपा होती है, तो उसे मानव का शरीर प्राप्त होता है। तभी गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा- बडे भाग मानुष तनु पावा। अर्थात्‌ बड़े भाग्य से मनुष्य का तन मिलता है। इस तन को पाने के लिए तो देवता भी तरसते हैं- सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा। परन्तु क्या कारण है कि इस तन को इतना भाग्यशाली कहा गया? इस प्रश्न का उत्तर भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी चौपाई की अगली पंक्ति में दिया- साधन धाम मोच्छ कर द्वारा अर्थात्‌ केवल मानव तन ही एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा आत्मा मोक्ष की प्राप्ति कर सकती है। यह मानव-शरीर साधन है, मुक्त का। आत्मा इसी शरीर में वास्तविक धर्म यानी ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर अपना कल्याण कर सकती है। आत्मा रूपी अंश पुनः अपने परमात्मा रूपी अंशी में मिल सकता है। अन्यथा तो यह एक योनि से दूसरी योनि में ही भटकता रहेगा। इसलिए दुर्भागी हैं वे लोग, जो इस मानव तन की महिमा नहीं जान पाते। सांसारिक दुःखों व कष्टों से घबराकर अपने जीवन को त्याग देते हैं। इस अमूल्य तन को नष्ट कर बैठते हैं। पर क्या इस तन को खत्म कर देने से उनके दुःख खत्म हो जाते हैं? नहीं, कदापि नहीं! बल्कि वे तो अपने लिए अंतहीन दुःखों की शृंखला आरंभ कर बैठते हैं। वह भी इतने भयंकर दुःखों की, जिनके आगे सांसारिक कष्ट तो कुछ भी नहीं। कई सैकड़ों-हज़ारों वर्षों तक उन्हें भूत योनि मिलती है। इस योनि में उन्हें भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी सब सताती है। पर वे उसे भोगने के लिए बाध्य हैं। उस योनि के उपरान्त भी उन्हें पुनः मानव तन नहीं मिलता। वे अनेक कल्पों तक, विभिन्न लोकों और योनियों में शरीर धारण करने को विवश रहते हैं- ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते। उपनिषदों का भी कथन है- असुरों की प्रसिद्ध नाना प्रकार की योनियाँ – सभी अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप अंधकार से आच्छादित हैं। जो कोई भी आत्मा की हत्या करने वाले मनुष्य हैं, वे मरकर उन्हीं भयंकर लोकों को बार-बार प्राप्त होते हैं। अब आप ही बताइए- क्या खुद को मारकर इंसान ने केवल अपने शरीर को खत्म किया? नहीं! उसने तो अपनी आत्मा की प्रगति की सभी संभावनाएँ, सभी आशाएँ खत्म कर दीं। आत्म-मुक्ति के द्वार न जाने कितने सैकड़ों-करोड़ों वर्षों के लिए बंद कर दिए! यही आत्मा की हत्या है। आत्मा का हनन है। इसे उदाहरणों से समझते हैं। विज्ञान के अनुसार हमारे शरीर की कोशिकाएँ (cells) निरंतर विकास व वृद्धि करती रहती हैं। यदि आप किसी कोशिका को शरीर से बाहर निकाल दें, तो? तो उसका विकास रुक जाएगा। दूसरे शब्दों में वह मृत हो जाएगी यानी कि यदि आप कोशिका के विकास के माध्यम अर्थात्‌ शरीर को उससे छीनते हैं, तो यह उस कोशिका की हत्या करने जैसा ही है। एक अन्य उदाहरण लें। एक बच्चा रोज़ स्कूल जाता है। पर पढ़ने-लिखने में उसका मन नहीं लगता। उसे बोरियत महसूस होती है। वह पूरे साल कोई पढ़ाई नहीं करता। परिणाम? वह परीक्षा में फेल हो जाता है। अब सब सहपाठी उसका मज़ाक उड़ाते हैं, उसे हीनदृष्टि से देखते हैं। पहले तो उसका संघर्ष केवल पढ़ाई से था, पर अब सहपाठियों के व्यवहार से भी है। ऐसे में उस छात्र के पास दो विकल्प हैं- पहला, वह डटकर पढ़ाई करे और परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सबका मुँह बंद कर दे। दूसरा, वह पढ़ाई-शढ़ाई छोड़कर घर बैठ जाए। स्कूल से अपना नाम कटवा ले। यदि छात्र दूसरे विकल्प का चयन करता है, तो वह अपने शैक्षणिक उत्थान को वहीं स्थगित कर देगा। बौद्धिक विकास व उच्च डिग्री प्राप्त कर अच्छा करियर बना लेने के सभी मार्ग बंद कर लेगा। कई वर्षों बाद, जब उसके सहपाठी स्कूली चुनौतियों को पार कर, उच्च पदों पर आसीन होंगे, तो उसे अपने किए पर पछतावा होगा। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, उसके पास भूल सुधारने का कोई रास्ता नहीं होगा। वह अपने खोए हुए सालों को दोबारा नहीं पा पाएगा। यह एक प्रकार से उसके शैक्षणिक विकास की हत्या ही होगी!

ठीक इसी तरह, यह जीवन भी एक शिक्षालय है। इसमें कई उतार-चढ़ाव व चुनौतियाँ आती हैं। कई बार हम पास हो जाते हैं, कई बार फेल। अब फेल होने पर हमारे पास भी दो विकल्प हैं- दोबारा डटकर क्षेत्र में उतरें और अपनी हार को जीत में बदल लें या फिर जीवन से हार मान बैठें। अपनी देह से नाता तोड़ लें। यदि हम दूसरा विकल्प चुनते हैं, तो हमारे हाथ भी पछतावों के अलावा और कुछ नहीं आएगा। क्योंकि हम तो अपना इतना बड़ा नुकसान कर बैठेंगे जिसकी भरपाई जन्‍मों-जन्म नहीं हो सकेगी। हम अपना आत्मिक विकास स्थगित कर देंगे। उसकी उन्नति को अवरुद्ध कर बैठेंगे। और यदि एक बार मानव तन खो दिया, तो पुनः उसकी प्राप्ति कब और कैसे होगी, होगी भी या नहीं, कुछ नहीं कहा जा सकता। इसलिए सभी महापुरुषों ने मनुष्य को इस कुकर्म के प्रति सचेत किया। संत ऑगस्टिन कहते हैं- The commandment is ‘Thou shalt not kill a man’, therefore neither another, nor yourself, for who kills himself still kills nothing else than man अर्थात्‌ ‘इंसान की हत्या मत करो’, न दूसरे किसी की, न अपनी, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में इंसान यानी आत्मा के विकास का हनन होता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में महर्षि वेदव्यास जी ने इस संपूर्ण तथ्य को एक श्लोक में यूँ कलमबद्ध किया-मनुष्य शरीर बहुत ही दुर्लभ है। भगवान की कृपा से ही सुलभ होता है। यह मानव शरीर संसार से पार होने के लिए एक सुदृढ़, सुखद एवं सुंदर नौका के सदृश है। गुरु केवट समान है। भगवान की कृपा अनुकूल वायु है। यह सब प्राप्त होने पर भी यदि मनुष्य भवसागर को तरने का प्रयत्न नहीं करता, तो वह आत्म-हत्यारा है। कहने का तात्पर्य कि सांसारिक कष्टों से घबराकर आप अपने जीवन का अंत न करें। क्योंकि देह को खत्म कर देने से, आपके दुःखों का अंत नहीं होगा। बल्कि परमात्मा द्वारा दिए गए मानव तन रूपी उपहार को नष्ट कर आप अपनी आत्मा के उत्थान के भी सभी मार्ग बंद कर देंगे। यह आत्म-हत्या है। एक जघन्य पाप! यदि आप सच में दुःखों से निजात चाहते हैं, तो आत्मज्ञान अर्थात्‌ ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करें। अपने अंतस्‌ में विराजमान सच्चिदानंद ब्रह्म का साक्षात्‌ दर्शन करें। आनंदस्वरूप ब्रह्म का दर्शन आपके जीवन को आनंदमय बना देगा।

(श्री आशुतोष महाराज जी )

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