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बदनीयती से नहीं प्यार से आगे बढे

देश में इस समय जैसा सियासी वातावरण बन रहा है वह निश्चय ही हमारी एकता, अखंडता और सहिष्णुता पर गहरी चोट पहुँचाने वाला है। इसके लिए कौन दोषी है और कौन निर्दोष है उस पर देशवासियों को गहनता से मंथन करने की जरुरत है। नागरिकता कानून को लेकर सियासत साफ तौर पर दो धड़ों में बंट गई है और दोनों पक्ष अपने अपने तर्कों से अपने पक्ष को सही ठहरा रहे है। सत्ता पक्ष कह रहा है यह कानून नागरिकता देने के लिए है छीनने के लिए नहीं मगर दूसरा पक्ष इसे मानने को तैयार नहीं है। हालाँकि इस कानून को संसद ने पारित किया है। सहमति और असहमति लोकतंत्र का विलक्षण हथियार है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे लोकतंत्र की खासियत कहा है। यहाँ तक तो ठीक है मगर एक झंडे के नीचे विभिन्न विचार धाराओं के लोग एकत्रित हो कर देश को बाँटने की बात करे तो यह सहन योग्य नहीं है। ऐसा लगता है इसे मोदी विरोधी अभियान के रूप में प्रज्ज्वलित किया जा रहा है। इस कानून को लेकर सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपनी मर्यादा लांघी है और अपने बयानों से देशभर में नफरत के बीज बोये है।
नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली सहित देश के अन्य स्थानों पर आंदोलन किया जा रहा है। यह आंदोलन शांति और अनुशासन से आगे बढे तो यह लोकतंत्र की जीत कही जाएगी मगर कुछ लोग इसे सियासी दुर्भावना से भटकाए तो यह लोकतंत्र के किए हानिकारक होगा। अब देशवासियों को यह फैसला करना होगा की क्या सही और क्या गलत है। यदि इस कानून में कोई खामी रह गयी है तो केंद्र सरकार को विनम्रता पूर्वक इसे दुरस्त करना चाहिए इसी में सम्पूर्ण देश का हित है।
भारत सदा सर्वदा से प्यार और मोहब्बत से आगे बढ़ा है। हमारा इतिहास इस बात का गवाह है हमने कभी असहिष्णुता को नहीं अपनाया। हमने सदा सहिष्णुता के मार्ग का अनुसरण कर देश को मजबूत बनाया। सहिष्णुता का अर्थ है सहन करना और असहिष्णुता का अर्थ है सहन न करना। सब लोग जानते हैं कि सहिष्णुता आवश्यक है और चाहते हैं कि सहिष्णुता का विकास हो। सहिष्णुता केवल उपदेश या भाषण देने मात्र से नहीं बढ़ेगी। सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूलमंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहिष्णुता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। सहिष्णुता को लेकर
जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशील होना आवश्यक है। सहनशीलता व्यक्ति को मजबूत बनाती है, जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है। सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है।
सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है। मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हम बड़ी बड़ी बातें सहनशीलता की अवश्य करते है मगर उस पर अमल नहीं करते। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कथनी और करनी के भेद को मिटाकर सही मायनों में सहिष्णुता को अपनाएं तभी देश और समाज को आगे बढ़ा पाएंगे।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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