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भाजपा के भीतर और बाहर रंग बदलती सियासत

राजनीति के चौपड़ पर जब मोहरे पिटने लगते हैं तो सियासत रंग बदलने लगती है।कहीं कहीं बगावती स्वर भी सुनाई पड़ने लगते हैं।एक साल में पांच राज्यों में सत्ता गवांने वाली भाजपा के साथ भी ऐसा ही कुछ होने लगा है। यूं तो अभी भी दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सत्ता का सूरज पूरे वेग से चमक रहा है और उसके सामने कोई चुनौती नही है।लेकिन राज्यों मे ठबंधन के सहयोगी उस पर दबाव बनाने लगे है,खास कर बिहार मे विधानसभा चुनाव से 10 महीने पहले ही जेडीयू और बीजेपी में अभी से माइंड गेम शुरू हो गया है।जदयू की ओर से प्रशांत किशोर ने तो भाजपा की ओर से सुशील मोदी ने मोर्चा सम्भाल रखा है।उधर तमिलनाडु मे सत्ताधारी एआई डीएमके और भाजपा की सहयोगी पीएमके ने भी एनआरसी की मुखालफत करते हुए उसे राज्य लागू न करने की मांग कर डाली है।इस मामले पर शिरोमणि अकाली दल भी अपना विरोध दर्ज करा चुकें हैं।इस समय कुछ चिट्ठियां भी यूपी के सियासी रंगमंच पर तैर रही हैं जिनके पूरी तरह से खुलासे का अभी इंतजार करना होगा। वहीं योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश में ऐसा लगता है कि पार्टी मे अंदरखाने सब कुछ ठीक नही चल रहा ।विगत दिनो जब जब देश भर में लोग नागरिकता संशोधन बिल और एनआरसी के खिलाफ सडको पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे उसी समय उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भी एक धरना चल रहा था।

दरअसल ये धरना भाजपा के विधायकों का था जो अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। करीब एक सौ से अधिक विधायक अपनी ही सरकार से नाराज हो कर अपनी बात कहने और अपना विरोध दर्ज कराने के लिए एकत्र हो गये थे।इससे साफ जाहिर है कि लोकतंत्र की दुहाई देना अलग बात है और जमीनी धरातल पर लोकतांत्रिक होना अलग है।ये भी सच है कि ताकत से आवाज को कमजोर किया जा सकता है,पर दबाया नही जा सकता ।उस दिन कई स्तर की वार्ता के बाद भी जब भाजपा विधायक अपने ही दल के कई बड़े नेताओं की बात मानने को तैयार नहीं हुये तो विधानसभा का सदन पूरे दिन के लिये स्थगित कर दिया गया था।यूं तो ये विधायक अपने साथी विधायक नंद किशोर गुर्जर के साथ पुलसिया उत्पीड़न के खिलाफ एकजुट हुये थे।लेकिन राजनीतिक हलके मे कहा जा रहा हे कि ये एक जुटता तमाम विधायकों का साझा दर्द था। मौका मिलते ही सभी विधायको ने एकजुट होकर पार्टी के खिलाफ धरना दे दिया।बताया जाता है कि विधायक अपनी बात न सुने जाने से नाराज थे।ऐसे में यह दर्द जब पूरी तरह सज गया तो नंद किशोर गुर्जर के बहाने बाहर आ गया।दरअसल बात ये थी कि गाजियाबाद जिले के लोनी विधानसभा से विधायक नंद किशोर गुर्जर पर एक फूड इंसपेक्टर ने आरोप लगाया कि उस पर मीट की दुकान बंद कराने के लिये दबाव डाल रहे थे, ऐसा ना करने पर उससे मारपीट की गई।इसका औडियो वायरल हो गया और इसके बाद विधायक और उनके समर्थकों पर मुकदमा कायम हो गया।भाजपा ने भी विधायक के खिलाफ कारण बताओं नोटिस जारी किया।

वहीं विधायक का कहना है कि उन पर सारे आरोप गलत थे।बताया जाता हैै कि विधायक नंद किशोर गुर्जर पहले पार्टी नेताओं से इस बारे में बात कर चुके थे।जब पार्टी स्तर पर बात नहीं बनी तो नंद किशोर गुर्जर ने इस बात को सदन में उठाने का प्रयास किया।लेकिन वह इसमे कामयाब नही हो सके तो बात बिगड़ गयी।फिर वह सब हो गया जिसकी किसी को यहां तक कि सीएम को भी उम्मीद नही रही होगी।भाजपा के विधायकों को विपक्ष के भी विधायको का साथ मिलने से ही ये उत्तर प्रदेश के इतिहास की बड़ी राजनीतिक घटना बन गयी।मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद मामला भले ही ठंडा पड़ गया है और यूपी भाजपा मे सब कुछ सामान्य भी दिख रहा है।लेकिन विरोध के स्वर मौका पाते फिर नहीं भडकेगे इसको पुख्ता तौर पर नही कहा जा सकता है।यूपी से ही भाजपा के एक सांसद ने भी योगी सरकार पर सवाल खड़ा किया था।दरअसल योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक तेवर ही कुछ ऐसे हैं कि जब से वह मुख्यमंत्री बने हैं तब से प्रदेश का सियासी तापमान हमेशा बढ़ा रहता है।कभी उनके तीखे बयानों से,कभी उनके राजनीतिक तेवरों से और कभी विरोधियों की सक्रियता से राज्य में राजनीतिक हलचल रहती है।योगी आदित्यनाथ ने बहुत कम समय में भाजपा में अपना कद बढ़ाया है। उत्तर प्रदेश से बाहर भी वह भाजपा के स्टार प्रचारक की पहचान रखते हैं।छात्र राजनीति वाली उम्र मे वह 1998 में 26 वर्ष की आयू में लोकसभा पहुँच गए थे।वह पांच बार गोरखपुर से सांसद रह चुके हैं।भाजपा उनमे त्रिमूर्ति का रूप देखती है।यानी योगी भाजपा के लिए साधु-सन्यासी,राजपूत और कट्टर हिन्दुत्व के कार्ड हैं।पार्टी केेलिए ये कार्ड कई चुनावों मे तुरूप का इक्का साबित भी हो चुका है।इस लिए भाजपा उनमे भविष्य भी देखती है,अगर उनके खिलाफ आवाज उठाने वालों पर पार्टी की नजरे टेढ़ी हो जायें तो आर्श्चय नही होना चाहिए।
उधर बिहार विधानसभा चुनाव से 10 महीने पहले ही यहां जेडीयू और बीजेपी में अभी से माइंड गेम शुरू हो गया है।जेडीयू जहां वर्ष 2010 के फॉर्म्युले के आधार पर टिकट बंटवारा चाह रही है। तो बीजेपी 2019 में आम चुनाव को आधार मानने का दबाव डाल रही है।जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने सीट शेयरिंग की बात को उठाते हुए सबसे पहले 2009 का फॉर्म्युला उठाया। जवाब में बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा कि 2009 की बात पुरानी हो चली है और हकीकत है कि 2019 में बीजेपी ने त्याग करते हुए अपनी लोकसभा सीट जेडीयू को दी।जदयू नेता प्रशांत किशोर ने यहां तक कह दिया कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री भाजपा ने नही जनता ने बनाया है। 2010 विधानसभा चुनाव में जब जेडीयू और बीजेपी साथ थी तब राज्य की 224 विधानसभा सीटों में जेडीयू 141 सीट पर चुनाव लड़ी थी।इसमें से जेडीयू 115 सीट जीतने में सफल रही थी। वहीं, बीजेपी 102 सीटों पर उतरी थी जिसमें 91 पर जीतने में सफल रही थी। हालांकि लोकसभा चुनाव-19 में राज्य की 40 लोकसभा सीटों पर जेडीयू और बीजेपी बराबर 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसके लिए बीजेपी ने 2014 में जीती 21 सीटों में चार सीट जेडीयू को दिया था।जदयू अब तक भाजपा के इस एहसान से दबी थी,लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में बीजेपी को लगे झटके से जेडीयू को इससे उभरने का मौका जरूर मिल गया है। लोकसभा चुनावों मे प्रचंड बहुमत मिलने के बाद बीजेपी को धीरे धीरे ये गुमान होने लगा था कि राज्यों में वो अकेले हाथ आजमा कर सफलता पा सकती है। महाराष्ट्र में शिव सेना से तगड़ा झटका खाने के बाद भी झारखंड में इसका प्रयोग किया गया।अगर झारखंड में यह प्रयोग सफल हो जाता तो यक़ीनन इसकी आज़माइश बिहार में भी की जाती।ये बहुत कम लोग जानते हैं कि झारखंड के रघुवर दास मंत्रिमंडल में रहे सरयू राय और नीतीश कुमार की गहरी दोस्ती है।सनद रहे कि जेडीयू ने सीएबी को धर्मनिरपेक्ष कानून मानते हुए दोनों सदनों में इसका समर्थन किया था लेकिन एनआरसी के मुद्दे में पीछे हट गई थी।नीतीश कुमार ने ये साफ भी कर दिया है कि बिहार मे एनआरसी लागू नही होगी।

बीजेपी के शीर्ष नेताओं में इसको लेकर भी नाराजगी है कि जेडीयू ने ट्रिपल तलाक, धारा 370 पर भी मोदी सरकार का समर्थन नहीं किया था और सदन का बहिष्कार किया था।दरअसल एनडीए में शामिल जेडीयू एकलौती पार्टी है,जो आज भी बीजेपी के एजेंडे पर चलने से परहेज करती है।ये सही है कि अब 1996 वाली भाजपा नही है,ये अलग दौर वाली भाजपा है। मोदी और शाह का जमाना है और प्रचंड बहुमत भी है।लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड मे बदले राजनीतिक समिकरणों ने अब भाजपा को बैकफुट पर तो ला ही दिया है।यही कारण है कि भाजपा पर हमला बोलने से पहले जदयू ने झारखंड के चुनाव नतीजे का इंतजार किया।राज्य में पार्टी की हार के बाद भाजपा पर सबसे अधिक हमले जदयू की ओर से किए गए।यानी बिहार में सीटों के बंटवारे को लेकर दबाव में अब नीतीश कुमार नहीं बल्कि बीजेपी होगी।इस बात के कोई मायने नही है कि झारखंड मे जेडीयू और एलजेपी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा है।जेडीयू को सिर्फ 0.73 फीसदी वोट मिले तो एलजेपी को जेडीयू से बहुत कम 0.30 फीसदी वोट मिले हैं।वैसे बिहार का सियासी समीकरण ऐसा है कि जिसमें दोनों दलों को एक दूसरे की जरूरत है।जदयू के पास नीतीश के रूप में मजबूत और र्निविवाद चेहरा है,मगर पार्टी के पास कार्यकर्ताओं का बूथ स्तर पर संगठन नहीं है।राज्य भर मे समर्थक मतदाताओं की संख्या भी कम है।हो सकता है अब उसे अल्पसंख्यक वर्ग का वह समर्थन न मिले जो पिछले चुनाव मे मिला था।वहीं भाजपा केपास कार्यकर्ताओं और समर्थकों की फौज तो है, मगर उसके पास राज्य मे नीतीश जैसा कोई कद्दावर चेहरा नहीं है। नीतीश की बदौलत भाजपा की नजर पिछड़ा वर्ग मतदाताओं पर भी है।इस लिए ये कहना गलत नही होगा कि महाराष्ट्र मे मात खा चुकी भाजपा अब उसे दोहराना नही चाहेगी।वहीं जदयू के लिए भी ये देखना दिलचस्प होगा कि मोदी -शाह के सामने वह भाजपा के एजेंडे से कब तक अपने को दूर रख पातें हैं।

** शाहिद नकवी **

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