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भीड़ तैयार खड़ी है मुंडाने के लिए !

कबीर दास जी ने कहा कि बार-बार मूंडने से कोई भी व्यक्ति बैकुंठ नहीं जा सकता। अगर ऐसा होता तो भेड़ हर-बार बैकुंठ क्यों नहीं चली जाती? उसे तो हर बार अपनी मुंडाई कराने पर भी ठंड में ठिठुरना पड़ता है। कबीर ने बड़ी सार्थक बात कही है। उन्होंने समझाया है। बेटे अगर बैकुंठ जाना है तो बार-बार मुंडाना छोड़ो। जिसने मुंडाया, समझो उसने बैकुंठ का टिकट गंवाया। अजय हूं चेत गंवार! अगर बैकुंठ जाना है तो जी भर कर मूंडो। जो मुंडाता है वह स्वर्ग धाम की यात्रा नहीं कर पाता है। जिसने मूंडा वही स्वर्ग का स्वामी बना। इसलिए कबीर दास जी ने कहा है कि बार-बार मुंडाने वाली भेड़ कभी स्वर्ग नहीं जा सकी। यही हाल भीड़ का भी है। भेड़ को देखता हूँ तो मुझे भीड़ ही नजर आती है। जब भीड़ दिखती है तो भाड़ दिखाई पड़ती है। भेड़, भीड़ ही है भाड़़! स्वर्ग तो वही ठेकेदार गया जिसने भेड़ को जी भर के मूंडा! ठेकेदार ने भेड़ों को एक बार मूंडा। उसने प्लॉट खरीदा। दूसरी बार मूंडा उसने नींव भर डाली। तीसरी बार मूंडा छत डलवा ली। ठेकेदारों ने भेड़ों को हर-बार मूंडा। इधर मूंडा उधर कार निकल आती। उधर क्रेडिट कार्ड निकल आता है। हर-बार मूंडने से कोठी और कार निकल आती। तब ठेकेदार ने स्वर्ग को अपने पास धरती पर ही बुला लिया। उस ठेकेदार को स्वर्ग जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। भेड़ों को बार-बार मूंडने वाले ठेकेदार के पास स्वर्ग दौड़कर शर्माता हुआ आता है। स्वर्ग पैरों में गिर पड़ता है। हुजूर! आपने भेड़ों को इतना मूंडा तो मैं क्या कर सकता? मुझे तो आपके पास आना ही है।

इसलिए कबीरदास ने बहुत सोच समझकर कहा है- भेड़ ना बैकुंठ जाए। बैकुंठ वही जाता है जो मूंडता है। मुंडाने वाला हमेशा ठंड में ठिठुरता है और मूंडने वाला अलाव तापता है। इधर मुंडन शास्त्रियों से घिरा पड़ा हूं।ऊपर से लेकर नीचे तक। बड़े से लेकर छोटे तक। सब कबीरबाज मूंड रहे हैं। भेड़ पहले चार आवाज करती थी। अब बेचारी बनकर मुंडन करवा रही है। मुंडन विशेषज्ञ इस कदर मूंडते हैं कि वे खाल भी उधेड़ डालते हैं। भेड़-भीड़ सीधे भाड़ में जाकर बेचारी रोती बिलखती है। खून के आंसू रोती है। परंतु मुंडनपति उस्तरे को धार लगाते रहते हैं। उन्हें स्वर्ग को जो पास बुलाना है। मूंडने का सिद्धांत इतना फैल चुका है कि कई बार बड़ी भेड़ छोटी भेड़ को मूंडने की कार्रवाई तक कर बैठती है। भेड़ों को सामूहिक रूप से। सरेआम राजनीतिक अवसरवादिता के उस्तरे से खूब मूंडा जाने लगा है। तब ठीक ही कहा है। बार-बार के मूंडते भेड़ ना बैकुंठ जाए! बार-बार मूंडने वाला मुंडन विशेषज्ञ ही बैकुंठ जा पाता है। अत: हे श्रेष्ठ नरो! अगर बैकुंठ जाना है तो मूंडो। जी भर कर मूंडो। उल्टे उस्तरे से सीधे-सीधे मूंड डालो। उल्टी कैंची से सीधे-सीधे ही मूंड डालो! नोट लेकर मुंडो! वोट लेकर मुंडो! सोट मार कर मूंडो! तन-मन से मुंडो! भीड़ तैयार खड़ी है मुंडाने के लिए! भीड़ रूपी भेड़ों की नियति ही मुंडाने की है। इसलिए साफ कहा गया कि मुंडो और बैकुंठ घूमने के लिए मुंडो! जी भर कर के मुंडो! भीड़ चाहे शाहीन बाग की हो या किसी बेगम बाजार की हो! खुलकर मूंडो राजनीति के वोट बटोरू अवसरवादी उस्तरे से!

रामविलास जांगिड़,18, उत्तम नगर, घूघरा, अजमेर (305023) राजस्थान

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