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भीतर-बाहर का अंधेरा

मैं टी.वी. पर देश के प्रधानमंत्री का संदेश सुन रहा था। वे कह रहे थे कि 5 अप्रैल की रात 9 बजे सभी लोग अपने घरों की लाइट बंद करके बाहर दरवाजे पर 9 मिनट तक प्रकाश फैलाएंगे। इससे देशवासियों की महाशक्ति का जागरण होगा। साथ ही यह भी जताना है कि देश के गरीब भाई-बहनों के साथ हम सब खड़े हैं। वे अकेले नहीं हैं। मुझे यह सब सुनकर बहुत अच्छा लग रहा था। मैं मात्र इसी कल्पना से रोमांचित हो उठता था कि पूरा देश एक साथ घर में अंधेरा कर दीपक, मोमबत्ती या मोबाइल की लाइट जलाएगा तो यह नजारा कितना सुंदर होगा।
मैं यही सब सोच रहा था कि तभी मेरे मोबाइल पर राहत इंदौरी की एक शायरी पढ़ने को मिली। लिखा था- अँधेरे चारों तरफ़ सांय-सांय करने लगे / चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे / तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर / ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे। मुझे लगा कि इस जमाने में कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं धोखाधड़ी, कहीं जालसाजी तो कहीं मनमानापन, कहीं अत्याचार तो कहीं लूटपाट, कहीं अच्छाई को हराने की साजिश तो कहीं सच्चाई का गला दबाने की कोशिशें, कहीं कोई जात-पात के नाम पर अधर्मिता तो कहीं धर्म के नाम पर अधर्मिता, कहीं आगे रहने की होड़ में बम-बंदूक तो कहीं मानव जाति को मिटाने के नाम पर कोरोना जीवाणुओं का हमला जैसे अंधकार फैले हुए हैं। क्या इन अंधेरों को मोमबत्ती, दीये या फिर मोबाइल की फ्लैश लाइट से मिटाया जा सकता है? क्या सदियों से चले आ रहे इन अंधेरों को मात्र 9 मिनट के प्रकाश से दूर किया जा सकता है?

मैं इन प्रश्नों से बाहर निकल पाता तभी पत्नी आयी और बोली कि घर में माचिस नहीं है। अब घर में अंधेरा कर रोशनी कैसे फैलाएँ? मैंने कहा कि माचिस की क्या जरूरत है। मोबाइल है न! उसी की रोशनी में प्रधानमंत्री के संकल्प वचन का पालन करते हैं। इस पर पत्नी ने कहा जो बात दीये या मोमबत्ती में आती है क्या वह मोबाइल में आएगी? मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि श्रीमती जी यहाँ बात मोमबत्ती या दीये जलाने की नहीं है। रोशनी की है। बाहरी रोशनी से बनावटी अंधेरा तो मिट सकता है, लेकिन भीतर फैले अंधेरे को मिटाने के लिए अच्छे-बुरे, सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सदाचार-दुराचार, सृष्टि-विनाश की सोच वाले दीये को जलाने की है। यह दीया माचिस नहीं पहल से जलता है। जिस दिन हम इस दीये को जलाएँगे उस दिन सारा जग वसुधैव कुटुंबकम की भावना से जगमगा उठेगा। इसलिए रोशनी मोबाइल की हो या फिर दीये या मोमबत्ती की, रोशनी तो रोशनी है। रोशनी मतलब वसुधैव कुटुंबकम! यही रोशनी आज हमें दुनिया भर में फैलानी है।
इसी कामना से 5 अप्रैल को रात के नौ बजे नौ मिनट के लिए हमें एक ऐसी रोशनी जलानी होगी जिसमें युगों-युगों तक जग रौशन होने की असीमित सद्भावना हो।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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