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हर सवाल जवाब तलाशती है भोपाल गैस त्रासदी

साल 1984 के दिसम्बर महीने की 2 और 3 तारिखों को बीते अब 35 वर्ष हो चुकें हैं। लेकिन उस स्याह और सर्द रात का खौफनाक मंजर आज भी लोगों के जेहन मे जिन्दा है और रोंगटे खड़े कर देता है।त्रास्दीउ की वह काली रात मेरे जैसे तमाम लोगों के ज़ेहन मे होगी जब उस रात सर्द हवाओं ने भोपालवासियों को जल्दीे बिस्तचर मे दुबकने के लिए मजबूर कर दिया था। तभी आधी रात को यूनियन कार्बाइट के कारखाने से रिसने वाली जहरीली गैस ने उनकी सांसों को बेदम बना दिया और अगले कुछ ही घंटों मे हजारों लोगों को मौत की
नींद सुला दिया। शहर का मंजर ये था कि आंखों और सीने में जलन सहते हुए अपनी जान बचाने भोपाल के लोग बेतहाशा सड़कों पर भागे जा रहे थे। भागने वालों में औरतें, मर्द, बच्चे सब शामिल थे।चारों तरफ चीख, पुकार और बदहवासी का आलम था। मानों शहर पर गैस का नही मौत का हमला हुआ हो। लोग बताते हैं कि सिर्फ ये सुनाई दे रहा था, भागो-भागों जानलेवा गैस रिस गई है,मानों लोगों को मौत सामने दिख रही थी। सुबह की रोशनी अंगड़ाई लेकर कोहरे की चादर को चुनौती दे रही थी और सड़कों पर लाउडस्पीकर का शोर गूंजने लगा, भोपालवासियों लाशें उठाने वाला कोईनही है। जल्दी हमीदिया अस्पताल पहुंचिए, लोग तड़प रहे हैं। कोई सुध लेने वाला भी नही था। वहीं
बस्तियों में खुले में बंधे जानवर मरे पड़े थे। सर्दी से बचने के लिए जो बिस्तरों पर थे,उनमें से हजारों यूं ही सोते ही रह गए,वह भी कभी न जागने वाली नींद में।मानव निर्मित आपदा का कहर देखिये कि भागने के लिए घर का दरवाजा भी नहीं खोल पाये।पेड़ों के पत्ते और खेतों मे फसल जलकर नीली पड़ गयी थी। दरअसल सही मे कितने मरे, कितने अपगं हुए और भविष्यय की पीढ़ी पर इसका क्याे असर पड़ा इस पर तमाम तरह के कयास लगाये गये , शोध किये गये लेकिन स्पषष्ट है कि मानव इतिहास की सबसे भीषण औद्दयोगिक त्रास्दीग के
साढ़े तीन दशक बाद भी बहुत से प्रभावित लोगों को इंसाफ का इंतज़ार है । ये ऐसे लोग हैं जिनकी वर्तमान पीढ़ी पर भी जहरीली गैस का असर दिख रहा है । इस लिए ऐसे पीड़ित अक्सार नेताओं , अफसरों और मंत्रियों की चौखट पर दस्तहक देते रहते हैं लेकिन ज़् यादातर मौकों पर उनकी आवाज़ अनसुनी कर दी जाती है ।

पूरे पैंतिस साल मे भी न्यादय ना मिल पाना क्या ये साबित नही करता कि हमारे देश मे आज़ादी के सात दशक मे तमाम बदलाव और तरक्कीस के बाद भी कमज़ोरों को इंसाफ मिलना कितना मुश्कि ल है।ये कोई छोटी मोटी त्रास्दी नही थी, ऐसी त्रास्दी कि 35 साल बाद भी भेपाल के जेपी नगर मे बने यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूका) के कारखाने का भवन उस भयावह मंज़र का गवाह बना है।जिसके एक टैंक से अत्यधिक ज़हरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट का रिसाव हुआ था, इस घटना की वजह से भोपाल का नाम विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़ गया। झीलों का शहर भोपाल अपनी खूबसूरती , ज़री
की शानदार कला और महिला सशक्तीडकरण के लिए जाना जाता है।लेकिन 2 और 3 दिसम्बतर 1984 की रात ने बे्गमों और नवाबों के इस शहर को त्रास्दीण का असहनीय दर्द भी दे दिया,जो आज तक 35 साल बाद भी रह-रह कर सता रहा है। कहा जाता है कि यूनियन कार्बाइड में दफ़न ज़हरीले कचरे का निष्पादन भी त्रासदी के साढ़े तीन दशक बीत जाने के बाद भी ठीक से नही हो पाया है। इसी
जेपी नगर मोहल्ले मे यूनियन कार्बाइड के पास एक बड़ा गड्ढ़ा है जो बारिश मे पूरे समय भरा रहता है।जानकारों का कहना है कि इससे इलाके का भूजल प्रभावित हो गया है,जो लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रह है। एक रिपोर्ट के मुताबिक गैस पीड़ितों को आर्थिक मदद देने मे बंदर बांट तो की गयी साथ मे ठीक से स्वास्थ्य सुविधाएं भी नही नसीब हुयी। हाल इतना बुरा है कि इन्हें पीने के लिए साफ और शुद्ध पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। इसका एक तथ्य ये भी है कि अब तक नीचे दफ़न ज़हरीले कचरे के निष्पादन के लिए सरकारें कोई
ठोस नीति नही बना पाई है। यानी इन इन 35 सालों में भोपाल के गैस पीड़ितों ने अपनी तकलीफों के साथ सरकारों के सिस्टम और संवेदनाओं को भी दम तोड़ते देखा है। दरअसल हमारी सरकारें विदेशियों के बजाय अपने ही देश के आम लोगों को कानून का सोटा दिखा कर कतार में खड़ा कर देने पर आमादा रही हैं। तभी तो यूनियन कार्बाइड हादसे का मुख्य गुनहगार यूनियन कार्बाइड का मालिक भोपाल में गिरफ्तार तो किया जाता है, लेकिन फिर अपने जीवन भर वापस न लाया जा सका।सनद रहे कि फ्लोरिडा में एंडरसन की 92 साल की उम्र में अब मौत हो चुकी है। आज तक ये पता नही चल सका कि वारेन एंडरसन को भोपाल से निकल जाने देने मे किसका हाथ था और वापस न लाने मे भी किसका हाथ था। इस मामले मे कई अभियुक्तों की मृत्य हो गई, सिर्फ दो लोगों को दो-दो साल की सजा हुई।इस दर्दनाक हादसे को बीतें सालों नही दशक गुजर गये तीन, लेकिन यहां के लोग उसी गैस रिसाव के कारण आज भी शारीरिक रूप से पीड़ित हैं और बड़ी तादात मे मानसिक रोगी बन गये हैं । यूनियन कार्बाइड कारखाने के ठीक सामने स्थित जेपी नगर कालोनी मे ऐसे मांसिक रोगी देखें जा सकतें हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ सोशल वर्क करने वाले प्रतीक शर्मा लामिचन्ने द्वारा वर्ष 2014 में तैयार रिसर्च रिपोर्ट ‘परसीव्ड नीड्स ऑफ द गैस अफेक्टेड पर्सन्स विद रिफरेंस टू पीपल लिविंग इन जय प्रकाश नगर’ बताती है
कि सर्वे में शामिल जेपी नगर के एक बड़े समूह में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्या पाई गई। उस देश मे जिसकी आबादी का बड़ा हिस्साड युवा हो और जिसे अपनी विशालता पर नाज़ है , उस देश मे किसी हादसे का सही इंसाफ पैतिस साल मे भी ना मिल पाना दुखद है। भोपाल गैस प्रभावितों पर बेगंलौर की एक संस्थाे एसोसिएशन फार मेंटली चैलेज्ड की सर्वे रपट के मुताबिक 30 फीसदी गैस प्रभावित लोग मानसिक रोगी बन चुके हैं। पड़ताल के मुताबिक सन 2011 से 2013 तक भोपाल के गैस पीड़ितों पर किये गये सर्वे मे चौकाने वाले तथ्य। सामने आये । संस्थाज की रपट के अनुसार 80 प्रतिशत गैस प्रभावित आज भी जिगर , गुर्दा ,कैंसर और आंख के रोगी हैं। पीड़ितों की शारीरिक समर्थता के हिसाब से सरकारी प्रयास ना होने के कारण गैस हादसें के शिकार मनोरोगी भी बन रहे हैं । भोपाल गैस काण्ड में मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था। मरने वालों के अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय होने से इसमें एकरूपता नही मिलती है। फिर भी पहले अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259 थी। मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 3,787लोगों कि गैस से मरने वालों के रुप में पुष्टि की थी। दूसरे अनुमान बताते हैं कि 8000 लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर
हो गई थी और लगभग इतने ही लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों से मारे गये थे।सन 2006 में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125 सीधे तौर पर प्रभावित हुए जिसमे दो लाख लोग 15 वर्ष की आयु से कम थे और 3000 गर्भवती महिलाये थी। जबकि आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी।3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए
एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये।ये आकंड़े आज भी अंतिम कतई नही कहे जा सकते हैं और हर स्त्रोत अपना अलग – अलग आकंड़ा पेश करता है। इतनी बड़ी त्रास्दी को आंकड़ों के फेर मे उलझाना उचीत भी नही लगता। जरा देखिये जहरीली गैस से प्रभावित अब भी उचित इलाज, पर्याप्त मुआवजे, न्याय एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं। गैस पीड़ितों के हितों के लिये पिछले साढ़ें तीन दशकों से अधिक समय से काम करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार भी गैस पीड़ितों की
लड़ाई अधूरी छोड़ कर पिछलें दिनों इस संसार से ही चले गये। कहा जाता है कि उनकों भी पर्याप्त इलाज नही मिल पाया।वह गैस पीड़ितों मे जब्बार चाचा के नाम से मशहूर रहे,अब हर के जबान पर यही सवाल है कि गैस प्रभावितों की स्वास्थ्य सुविधाओं, राहत और पुनर्वास, मुआवज़ा, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और न्याय इन सभी के लिए अब लगातार कौन लड़ाई लड़ेगा? वैसे गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन जैसे कई संगठन गैस राहत अस्पतालों की दशा सुधारने के लिए आंदोलन कर रहें है। पीड़ितों की बदहाल हुई जिंदगी के डरावने मंजर पर
भोपाल ए प्रेयर फॉर रेन, भोपाल एक्सप्रेस, यस मेनफिक्स द वर्ल्ड जैसी फिल्में भी बन चुकी हैं। यही नही हर साल गैस त्रास्दी की बरसी आती है, भेपाल सहित देश के दूसरे शहरों मे भी कुछ लोग मोमबत्ती जलाते हैं। चंदें का टेंट भी लगता हैं,संवेदनाओं वाला भाषण भी होता हैं और वादे भी होतें हैं,फिर एक साल और खत्म हो जाता है।पिछले साढ़े तीन दशकों से हर साल की कहानी है,कुछ ऐसी ही रहती है।लेकिन भोपाल गैस त्रासदी के उन अनउत्तरित सवालों का कभी जवाब नहीं मिलता जो पिछले तमाम सालों से उठ रहें हैं। काबिलेगौर बात ये है कि भोपाल गैस त्रास्दी ये बताने और डराने के लिए काफी है कि हजारों मौतों के बाद भी गुनाहगार बच निकलते हैं या कम सजा पा
कर छूट जाते है। हम अपने ही देश मे इंसाफ के लिए संघर्ष करते और याद की बरसी मनाते रह जाते हैं। कुछ सालों बाद इस डरावनी त्रास्दी पर सोचने के लिए भी शायद किसी के पास समय न रहे।इस तरह के हादासे हमें सबक देते हैं, लेकिन हम सबक लेते नही।हमने बद्रीनाथ, केदारनाथ, चेन्नई, कश्मीर कीर बाढ़ से सबक नही लिया तो केरल मे फिर प्रकृति का तांडव दिखा। बहर हाल हम अब सबक लेना सीखें।

शहिद नकवी

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