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बिन नारी सब सून…

8 मार्च – अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष लेख

“अभी रौशन हुआ जाता है रास्ता
वो देखो एक औरत आ रही है”
शकील जमाली की इन पंक्तियों में महिला की प्रशंसा में कसीदे पढ़े गए हैं। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। सवाल यह कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की क्या विशेषता है? क्या इस दिवस को मनाने की कोई आवश्यकता है? इसे मनाने के क्या प्रयोजन हैं? पाश्चात्य संस्कृति की देन कहलाए जाने वाले ऐसे दिवस भारत में क्यों मनाने चाहिए? वैसे तो भारत में महिला को साक्षात देवी माँ का दर्जा दिया गया है। प्रतिदिन आदर-सत्कार करते ही रहते हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए विशेष दिन क्यों? ऐसे कई सारे प्रश्न हैं जिनके समाधान वर्तमान समाज के परिप्रेक्ष्य में अनिवार्य बन जाते हैं।
शिशु कन्या के जीवन का आरंभ बेटी के रूप में होता। जन्म लेने वाली यदि बेटी हो तो जान-पहचान के लोग पिता को ढांढस बँधाते हुए नजर आते हैं। कहते हैं जब भगवान ने बेटी दी है तो उसके पालन-पोषण तथा भविष्य के खर्चों के लिए रास्ता भी दिखाएगा। पहले पहल ही बेटी की छाप बोझ के रूप में हो जाती है। यह तो बात उन बेटियों की हैं जो धरती पर जन्म लेती हैं। यदि यह पहले ही पता लग जाए कि गर्भ में पलने वाला भ्रूण कन्या है तो उसका काम वहीं तमाम करने के प्रयास किए जाते हैं। वह तो भला मनाइए कि सरकार के कड़े कानूनों ने भ्रूण के लिंग परीक्षण को गैर-कानूनी घोषित कर दंड के कड़े प्रावधान बनाए हैं। फिर भी आए दिन कहीं न कहीं नृशंस हत्या की शिकार भ्रूण कन्या कचरे, नाले, झाड़ियों में दिखाई दे ही जाती है। समाज बेटी की पिता को ऐसी नजर से देखता है कि धीरे-धीरे वह भी समाज की ओछी मानसिकता की जकड़ में बंध जाता है। उसे भी बेटी का बाप होना बोझ-सा लगने लगता है। बेटी के जन्म लेने पर कोई उत्सव-आनंद नहीं मनाया जाता है। यदि मनाया भी गया तो उपहार के रूप में गुड़िया, चूड़ी जैसे उपहार उसके अबला होने के बोध को बार-बार कचोटते हैं। जबकि बेटे के जन्मोत्सव पर उपहार के रूप में कार, रोबोट, बंदूक न जाने क्या-क्या थमा दिए जाते हैं, जिससे अहंकारी पुरुष समाज की हुंकार साफ सुनी जा सकती है।
जहाँ तक शिक्षा का सवाल है, तो आज की सरकारी पाठशालाएँ इन्हीं नकारी गई लड़कियों के बदौलत जीवित हैं। पिछले कुछ साल के आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि अधिकतर माता-पिता जो आर्थिक रूप से तंगी का सामना करते हैं, वे अपनी बेटियों को सरकारी तथा बेटों को निजी पाठशालाओं में भेजते हैं। कई माता-पिताओं को तो बेटियों को पाठशाला भेजना भी नापसंद होता है। बचपन से ही बेटियों को मेहनत करना सिखाते हैं। सुबह जल्दी उठना, घर-आंगन झाड़ू लगाना, पोछा करना, चूल्हा जलाना, खाना पकाना, बर्तन माँजना, कपड़े धोना, पानी भरना, माता-पिता का हाथ बटाना, खेतों में काम करना और ये सब करने के बाद समय बचता है तो पाठशाला जाना जैसे काम करना पड़ता है। बेटियों को जन्म के साथ पराई संपत्ति का ठप्पा लगाकर उससे होने वाली हर भूल पर किचकिच की जाती है। उसे उलाहना, ताना, कोसना, शिकायत, डाँट-फटकार की आदत-सी पड़ जाती है।
बेटी थोड़ी बड़ी हो जाए तो उसे कॉलेज भेजने का साहस कुछेक माता-पिता ही कर पाते हैं। यदि कोई बेटी के नाम प्रेम पत्र लिख दे या फिर कुछ ऊँच-नीच हो जाए फट से उसका कॉलेज जाना बंद कर दिया जाता है। उलाहनाओं से घर में रहना दुश्वार हो जाता है। उसके लिए अंदर-बाहर का जीवन नरक सा प्रतीत होता है। वह जीवन से छुटकारा पाने का प्रयास करने लगती है। जिसकी कमी माता-पिता शादी कर पूरा कर देते हैं। चूँकि माता-पिता के लिए बेटी का विवाह होना ही पहली प्राथमिकता होती है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि बेटी को लड़का पसंद है या नहीं। उनके लिए तो लड़के का उनकी बेटी को पसंद करना ही महत्व रखता है। बेटी के दिमाग में साल के बारहों महीने, महीने के तीसों दिन और दिन के चौबीसों घंटे एक ही बात कूट-कूट कर भरी जाती है कि वह बोझ है और उसका अलग से कोई अस्तित्व नहीं है। वह आत्मनिर्भर नहीं पराश्रित है। जैसे-तैसे उसका विवाह कर पिंड छुड़ाने के चक्कर में माता-पिता उसे माइके की जेल से आजीवन ससुराल रूपी सश्रम कारावास की सजा सुनाते हैं। मानो ऐसा लगता है जैसे बंधुआ मजदूर का एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला हुआ है।
वास्तव में देखा जाए तो महिला का सबसे पहला शोषण केंद्र उसका घर-परिवार है। भाई, पिता, चाचा, मामा सभी आए दिन उसके परिश्रम का हनन करते हैं। बदले में उसे खरी खोटी सुनाते हैं। उसके आत्मबल को तोड़ने वाले कोई और नहीं बल्कि उसके अपने लोग होते हैं। हमारा समाज पुरुषों का पक्षधर है। पुरुष घर देर से आए तो उसके लिए कोई चीड़-फाड़ नहीं होती। जबकि महिला आधा घंटा लेट हो जाए तो उसकी खैर नहीं। समाज रूपी बैलगाड़ी के दो पहिए कहलाने वाले पुरुष व महिला में अंतर नहीं होना चाहिए। दोनों की समानता समाज की प्रगति के परिचायक हैं। कुछ चंद नामों जैसे- इंदिरा गाँधी , प्रतिभा पाटिल, सुस्मिता सेन, सुनीता विलियम्स, रीता फारिया, पी.वी. सिंधु, कादम्बिनि गांगुली, कमलजीत सिंधु, डायना इदुल, मीरा साहिब फातिमा बीबी, लीला सेठ, किरण बेदी, मदर टेरेसा, देविका रानी, मायावती, सुचेता कृपलानी, हरिता कौर देओल, मीरा कुमार, बछेंद्री पाल, आदि के ले लेने मात्र से महिला सशक्तीकरण का सपना पूरा नहीं होगा। समाज में बदलाव की आवश्यकता है। यह तभी होगा जब पुरुष अहंकार को एक तरफ रख, पितृसत्ता को चुनौती दी जाएगी। सच तो यह है कि महिला दिवस मनाने का उद्देश्य महिला को समाज की कुरीतियों से बाहर निकालकर उसे विकसित होने का सुअवसर प्रदान करना है। हमारे आदि-ग्रंथों में भी कहा गया है- यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता। अर्थात जहाँ नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। यह सब सुनने में अच्छा लगता है। इसे कथनी से करनी में बदलने की आवश्यकता है। माँ, बहन, भाभी, बुआ, चाची, फुआ, दादी, नानी सभी रूपों में प्रेम बरसाने वाली महिलाओं को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। जिस तरह महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनका हाथ बंटाया है ठीक उसी तरह पुरुष भी घर परिवार की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में महिलाओं का हाथ बंटाएँ। वे उन्हें आराम करने का अवसर दें, क्योंकि वे भी मनुष्य हैं, यंत्र नहीं। महिला दिवस की सार्थकता इसे मनाने से नहीं मस्तिष्क में बैठी संकीर्ण विचारधारा को बदलने से होगी। जिस दिन लिंगभेद समाप्त हो जाएगा उस दिन से इस दिवस का कोई औचित्य ही नहीं रह जाएगा। महिला दिवस मात्र एक दिन के लिए नहीं बल्कि जीवन भर के लिए होना चाहिए। क्योंकि वह संस्कारों को बोने वाली टीचर भी है, हमारा देखभाल करने वाली डॉक्टर भी, सपनों की उड़ान भरती पायलट भी और तथ्यों को पता लगाती शोधार्थी भी। यदि वह ये सब नहीं भी होती, तब भी वह सब कुछ है, आज से नहीं सदियों से वह सब कुछ है इस सृष्ट‍ि की। क्योंकि वह किसी पद पर न भी हो, तो सृजनकर्ता के पद पर सदैव आसीन रहेगी, जब तक यह सृष्ट‍ि है। जॉँ निसार अख्तर के शब्दों में-
“देखूं तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़कत दीप जलाने के लिए हैं”

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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