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पुस्तक समीक्षा : बैंकिंग खामियों का कौटिल्य शास्त्र हैं ‘एनपीए एक लाइज बीमारी नहीं’

अर्थव्यस्था में बैंकिंग क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। दूसरे शब्दों में सीधे और सरल तरीके से कहा जाय तो बैंक हमारी अर्थव्यस्था की रीढ़ हैं। अर्थव्यवस्था की खराब सेहत के लिए बैंकों की बड़ी भूमिका है। बैंकिंग सिस्टम के नकारेपन की वजह से अब तक देश के कई बैंकों में ताले लग चुके हैं। जबकि कई का विलय हो चुका है। बैंकों की आज सबसे बड़ी समस्या बढ़ता एनपीए है। बैंकों के लिए एनपीए एक लाइलाज बीमारी बन गई है। लेकिन अगर बैंकिंग व्यस्था में तकनीकी सिस्टम पर गौर किया जाय तो एनपीए कोई अधिक गंभीर समस्या नहीं है। लेकिन यह बीमारी इतनी बढ़ गई है कि सरकारों को इसका समाधान फिलहाल दूर-दूर तक नहीं दिखता है। बैंकिंग अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ता एनपीए का बोझ एक समस्या बन गई है। लेकिन बैंक की तकनीकी उलझन पर साहित्यकार दीपक गिरकर जी कि पुस्तक ‘एनपीए एक लाइलाज बीमारी नहीं’ बेहद जमींनी पड़ताल करती है। गिरकर मूलतः मध्यप्रदेश के इंदौर के रहने वाले हैं। वह एक चर्चित व्यंगकार, समीक्षक, कवि, साहित्यकार हैं। गिरकर भारतीय स्टेट बैंक में बतौर सहायक महाप्रबंधक पद पर कार्य कर चुके हैं। बैंकिंग तकनीक और सेवा अनुभव पर आधारित यह पुस्तक अपने आप में अद्वितीय है। सरकार और बैंकिंग व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करे तो एनपीए जैसी लाइलाज बीमारी का हल निकल सकता है।

दीपक गिरकर की तकरीबन 170 पेज में सिमटी पुस्तक ‘एनपीए एक लाइजाज बीमारी नहीं’ अद्भुत संकलन और संग्रह हैं। इसे अगर बैंकिंग अर्थव्यस्था का चाणक्य शास्त्र कहा जाय तोे गलत नहीं होगा। बैंकिंग क्षेत्र की एक-एक समस्याओं और बारीकियों को उठाया गया है। संबंधित समस्याओं का हल भी बताया गया है। पुस्तक इतनी सरल भाषा में लिखी गई है कि आम पढ़ा- लिखा आदमी भी इसे बेहद आसानी से समझ सकता है। बैंकों पर बढ़ता एनपीए का बोझ हमेंशा मीडिया में भी बहास का मुद्दा बनता है। सरकार इस पुस्तक में दिए गए सुझावों पर अमल करे तो इस समस्या का हल आसानी से निकल सकता है। किसानों की कर्जमाफी को लेकर यह सवाल उठाए जाते हैं कि इससे बैंकिंग अर्थव्यवस्था पर बड़ा आर्थिक बोझ पडे़गा, जबकि यह सच नहीं है। बैंकिंग की रीढ़ तो देश के बड़े उद्योग क्षेत्र ने तोड़ी है जिन्होंने भारी भरकम कर्ज लेकर उसका भुगतान तक नहीं किया। किसानों को कर्ज देने के नाम पर बैंक घड़ियाली आंसू बहाते हैं। वहीं माल्या जैसे लोग हजारों करोड़ लेकर विदेशों में मौज करते हैं। गिरकर जी ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है। उन्होंने साफ किया है कि देश में केवल 12 रसूखदार के पास बैंकों का तीन लाख करोड़ का बकाया है। 2019 तक एनपीए तकरीबन 12 फीसदी होने की सम्भावना जताई गई है। एनपीए में लगातार वृद्धि हो रही है। जिसका खामियाजा हिंदुस्तान के आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। देश की जीडीपी लगातार गिर रही है।

दीपक गिरकर की यह पुस्तक 13 खंडों में लिखी गई है। जिसमें एनपीए में व्यापक चर्चा की गई है। मजबूत उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं। इस पुस्तक के अध्यन के बाद बैंकिंग और अर्थव्यस्था में अरुचि रखने वाले लोग भी इस क्षेत्र में मास्टर बन सकते हैं। पुस्तक बेहद सरल शब्दों में लिखी गई है। दूसरी बात बैंकिंग जटिलताओं को इतने आसान उदाहरणों से समझाया गया है कि आम आदमी भी इसे समझ सकता है। पुस्तक देश के प्रत्येक बैंक प्रबंधकों के हाथ में उपलब्ध होनी चाहिए। सरकार और बैंकों को इसमें लिखी गई बातों और सुझावों पर गौर करना चाहिए। जिसमें एनपीए के कारक, सरकार और रिजर्व बैंक की नीतियां, असफलताओं के कारण, क्यों बढ़ रहा है एनपीए, एनपीए के लिए जिम्मेदार बैंक, नियामक संस्थाओं की भूमिका, गैर निष्पादित आस्तियों का समाधान जैसे खंड शामिल हैं। रुपये का अमूल्यन, लचर कानून और आर्थिक मंदी जैसे विषयों पर भी लेखक ने बारीकी से विश्लेषण किया है। एनपीए की समस्या पर यह एक महाग्रंथ है। बैंकिंग क्षेत्र में कार्यरत लोगों के लिए इस पुस्तक का अध्ययन बेहद लाभकारी होगा। इस पुस्तक में बैंकों की स्वायत्ता और उनकी कार्य प्रणाली पर भी विश्लेषण उपलब्ध है। मेरे विचार में पुस्तक की समीक्षा के बाद यह साफ हो जाता है कि एनपीए नामक बीमारी लाइजाज नहीं है। बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े होने के कारण लेखक ने जितनी गंभीरता से बैंकों की समस्या और एनपीए पर अपनी बात रखी है वह बेहद कागिले गौर है। बैंकिंग अर्थव्यस्था पर लिखी गई इस पुस्तक की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है। भविष्य में यह पुस्तक बैंकिंग प्रणाली में सुधार और एनपीए के इलाज पर कारगर ग्रंथ साबित होगी।

  • पुस्तकः ‘एनपीए एक लाइलाज बीमारी नहीं’
  • लेखकः दीपक गिरकर
  • साहित्यभूमि प्रकाशन
  • मूल्यः450 रुपये मात्र
  • समीक्षकः प्रभुनाथ शुक्ल

प्रभुनाथ शुक्ल
स्वतंत्र लेखक और पत्रकार

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