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रोटी (लघुकथा)

जुगनू की तरह टिमटिमा रहे दीपक की रोशनी में खाट पर खाना खाते रामू ने रोटी सेंक रही अपनी अम्मा से पूछा-अम्मा मेरा जन्म कब हुआ था।
इतना सुनना था, कि अम्मा को तवे पर पड़ी वह रोटी तेज अंगारे जैसी दिखने लगी। जिसकी तपन से उसका पूरा शरीर पसीना-पसीना होने लगा, हलक सूखने लगी। नम आँखों से वह बोली-काहे! किसने पूछा रे।
‘अरे! वो राहुल, मुझसे बड़ा छोटा बनता फिरता है। कह रहा था, मुझसे दो साल छोटा है। जब कि मुझसे इत्ता लंबा है फिर भी मुझसे छोटा बनता है। मैंने कहा, आज अम्मा से पूछ कर कल पक्का-पक्का तुझे बताऊंगा।’ हलक से कौर उतार कर बड़ी तसल्ली से रामू बोला।
रोटी चिमटे से पलट कर अम्मा बोली-राहुल अपनी कब की पैदाइस बता रहा था। अब चूल्हे की आग उसे पुराने कोयले वाले धधकते इंजन जैसी महसूस होने लगी उफ! ये तपन…
’वह तो कह रहा था कोई लॉकडउन-फॉकडाउन के एक बाद साल पैदा हुआ था।’
‘अब तो, अम्मा का हृदय सुलग उठा कातर स्वर में बोलीं-तू तो लॉकडाउन के पांच माह बाद पैदा हुआ था। हृदय के पुराने जख्म हरे हो गये। फिर अपने अंदर उमड़ते-घुमड़ते दर्द के सैलाब को रोक न पाई। ‘तू पेट में था, जब वे मरे थे, क्या बताऊँ, बेटा पता नहीं मेरी किस्मत खराब थी या तेरी। मैं तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूं। पर लोग बताते हैं कि बाबू लोग हवाई जहाज में बैठ कर कोई छूआछूत वाली बड़ी बीमारी लेकर आए थे। तब सरकार ने जाने क्यों लॉकडाउन-वॉकडाउन में सब बंद कर दिया। सारी फैक्ट्री-वैक्ट्री बंद करा दी। सब रेल-बस बंद करा दिए। तब तेरे बाप मुम्बई में फंस गये। उनका काम छूटा, ऊपर से खाने के लाले गरीब मजूरों पर ऐसी आफत टूटी कि भैया पूछ मत।
हाथ से सने दाल-भात के कौर को मुँह में धरते हुए रामू बोला-कैसी आफत टूटी थी अम्मा।’
’खा गई थी मालगाड़ी तेरे बाप को।… आम आदमी के आने-जाने के सब साधन बंद होने के कारण तेरे बाप रात में पटरियों पर अपने साथियों के साथ पैदल-पैदल अपने गाॅव आ रहे
थे। सैंकड़ों मील का लंबा सफर था फिर भी वे भूखे-प्यासे चलते जा रहे थे। तभी पीछे से आ रही तेज मालगाड़ी ने उन सबों को… कहते-कहते अम्मा फफक कर रो पड़ी। तवे की रोटी सुलगने लगी उससे तेज अम्मा की छाती जलने लगी। रोटी उतार कर अपने आॅसूओं को पल्लू से पोंछते हुए बड़े दुःखी मन से सुबकते हुए-पता नहीं वो कौन निरदई क्रूर सरकार थी, जिसके कारण तमाम बेगुनाह मजूर भूखे-प्यासे सड़कों पर मर गये।
अब खाना खा चुका रामू बोला-सारा सिस्टम खराब है। हम गरीबों का भगवान के अलावा कोई अपना नहीं। अगर मेरे बाप न मरे होते, तो मुझे तेरे साथ गाॅव में मजूरी न करनी पड़ती। मैं भी अपने बाप के पैसों से पढ़-लिख कर कभी लाटसाहब बनता,… पर अम्मा ये बता कि पापा रेल की पटरियों की बजाय सड़क वाले रास्ते से क्यों नहीं आए।
’क्योंकि सड़कों पर मजदूरों को रोकने के लिए पुलिस वालों की लाठियाँ थीं। बेटा कभी परदेस मत जाना। कभी न जाना, कभी न जाना.. भर्राए गले से बोलते हुए मॉ ने लपक कर रामू को अपने कलेजे से चिपटा लिया।… भले गाँव में भूखों मर जाना। पर कभी परदेस मत जाना। परदेस न जाना मेरे ला.

 

सुरेश सौरभ

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