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साजिश के तहत होता सी ए ए का विरोध

नागरिकता संशोधन अधिनियम ( सी ए ए) जब से संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ है बस विरोध ही विरोध देखने को मिल रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि सीएए के खिलाफ चल रहे सभी प्रदर्शन सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक साजिश से प्रेरित हैं। प्रायोजित हैं। एक सुनियोजित रणनीति के तहत ही महिलाओं और बच्चों को इन आंदोलनों में चेहरा बनाकर आगे किया गया है। इन प्रदर्शनों को स्वत: स्फूर्त प्रचारित करने वाले लेफ्ट लिबरल, रैडीक्लाइज इस्लामिस्ट, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के साथ ही वाम दलों का अपना एजेंडा है जो कि शाहीन बाग के बहाने अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार कर रहे हैं।

अल्पसंख्यकों से पूरी तरह दूर हो चुकी कांग्रेस शाहीन बाग के जरिए मुस्लिमों के करीब आना चाहती है, तो वाम दल इसके जरिए दक्षिणपंथ और हिंदुत्व को घेरकर मोदी सरकार के खिलाफ देशभर में माहौल बनाने के फिराक में हैं। बुद्धिजीवी वर्ग पहले से ही अपने कथित उदार प्रवृत्ति (टेंडेंसी) की वजह से हमेशा से ही अल्पसंख्यकों की तरफ झुकाव रखने वाला रहा है और इस दौर में तो वामपंथी बुद्धिजीवी व्यवहार में असहिष्णुता के स्तर पर पहुंच गए हैं। उनके व्यवहार की बौखलाहट शब्दों के अमर्यादित प्रयोग और कुप्रचार के जरिए स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है। अगर यकीन नहीं हो रहा तो कई बुद्धिजीवियों के सोशल मीडिया को खंगाल लीजिए वहां आपको नरेंद्र मोदी और अमित शाह के प्रति गाली गलौच और हेट प्रोपोगेंडा से ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा।

नागरिकता संशोधन अधिनियम ( सीएए) के विरोध के नाम पर देशभर में हिंसा करवाने की सुनियोजित प्रयासों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। वो खुलासा जिसने उन दावों की पोल खोल कर रख दी है जिसमें कहा जा रहा था कि ये लोग देश तथा संविधान को बचाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। पता चला है कि आगजनी, तोडफ़ोड़, धरने के पीछे पीएफआई का हाथ है। पीएफआई एनजीओ होने की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में पूरी तरह लिप्त है I जांच में खुलासा हुआ है कि दंगा कराने के लिए करीब 120 करोड़ रुपये खर्च किए गए है। जिसके प्रमाण ईडी के अनुसंधानकर्ताओं ने जुटा लिये हैं I नागिरकता संशोधन अधिनियम के विरोध के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, उसकी कलई अब अब खुलने लगी है। जानकारी के मुताबिक, अब तक की जांच में पीएफआई के 73 बैंक खातों का पता चला है, जिसमें 27 बैंक अकाउंट पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के नाम पर खोले गये. 9 बैंक खाते पीएफआई से जुड़े संगठन रिहैब इंडिया फाउंडेशन के हैं और इसी संगठन ने 17 अलग-अलग लोगों और संगठन के नाम पर 37 अन्य बैंक खाते खोल रखे हैं। इन 73 बैंक खातों में हुए लेनदेन की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है । जांच एजेंसियों को चकमा देने के लिए 73 खातों में करीब 120 करोड़ रुपये पहले जमा कराये गये, लेकिन मामूली रकम खातों में छोड़कर पूरे खातों को खाली कर दिया गया। इस दौरान इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि जांच एजेंसियों की नजरों में आये बिना हवाला ट्रांजेक्शन से पैसा सही जगह पहुंच भी जाए।

वैसे तो इस देश में हिंदुत्व के खिलाफ नफरत फैलाने वाला एजेंडा वामपंथियो और कट्टर इस्लामवादियों का सालों से रहा है। यह नफरत साल 2014 में मोदी के शासन में आने के बाद बौद्धिकता की बौखलाहट के साथ ही व्यवहार की बौखलाहट भी बन गई है। इंटलेक्चुअल होने का सबसे आसान तरीका है कि आप अल्पसंख्यकों के प्रति उदार दिखो और बहुसंख्यकों के प्रति आक्रामक रुख अख्तियार करते रहो। इसी वजह से हिंदुवादी संगठनों को जी भर गाली देने वाले तथाकथित छदम धर्मनिरपेक्ष बुधिजीवी शरजील के पक्ष में आ खड़े होते हैं। उनको वहां कम्युनल और देशविरोधी नफरत नहीं दिखती। शाहीन बाग के प्रदर्शन में जब तख्तियों और पोस्टरों पर स्वास्तिक और हिंदु सांस्कृतिक एवं धार्मिक चिन्हों का अनादर होता है तो बुद्धीजीवी वर्ग के भीतर की खुशी दोगुनी हो जाती है। सालों से ये लोग स्वास्तिक को नाजीवाद से जोड़ते रहे हैं, और हिंदू संस्कृति का पवित्र प्रतिक स्वास्तिक जब शाहीन बाग के प्रदर्शन में लहराए गए पोस्टर में अपमानित होता है, इन पोस्टरों में स्वास्तिक को मुस्लिम औरतों के पांवों के नीचे दिखाया जाता है, तो बुद्धिजीवी वर्ग के भीतर दबी नफरत गुदगुदाहट में तब्दील हो जाती है। इस प्रोपोगेंडे में नागरिकता संशोधित कानून के बहाने नागरिकता पर कम और उसी की आड़ में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ नफरत फैलाने वाली बात ज्यादा हो रही है। विरोध करने वाले अभद्र भाषा और असहिष्णु रवैया अपनाते हुए अमर्यादित टिप्पणी कर रहे हैं। अब सारे के सारे मोमबत्ती ब्रिगेड वाले छुट्टी मनाने चले गए दिखते हैं I

याद करिए शाहीन बाग़ से आई हमारी एक प्यारी भारतीय बच्ची का वो वीडियो जिसमें वो कहती है कि “मोदी-शाह हमें मारना चाहते हैं और डिटेंशन कैंपों में रखना चाहते है। वो हमें कपड़े भी नहीं पहनने देगा। और न ही हमें टाइम पर खाना देगा। एक ही वक्त देगा..वो भी सुबह ही सुबह देगा। हम इसके खिलाफ यहां (शाहीन बाग़) आए हैं। मोदी मुसलमानों का सिर काट देगा।” छोटे बच्चों के मन में भरी ये बातें हमारे कथित बुद्धिजीवी समाज की ही देन हैं। अगर मोदी के खिलाफ माहौल बनाना है तो बच्चों और महिलाओं से बढिय़ा कोई हथियार इन्हें नहीं दिख रहा है। कुछ वामपंथी रंग में रंगे पत्रकार शाहीन बाग का उजला पक्ष दिखाएंगे और इस उजले पक्ष में, हजारों की भीड़ में से कुछ चुनिंदा मुस्लिम महिलाओं से वो बातें करेंगे जो बताएंगी कि महिलाएं खुद यहां सीएए के खिलाफ आई हैं। मुस्लिम समाज के मन में भय का माहौल है और हम चाहते हैं कि मोदी शाहीन बाग आएं। ये महिलाएं जब कहती हैं कि मैं जो झेल रही हूं मेरे आने वाली नस्लें क्या-क्या झेलेंगे। इस लाइन को वायर एजेंसियां पूरे मोंटाज के साथ दिखाता हैं। जिससे कि संदेश जाए मुस्लिम भारत में पिछले कुछ सालों से जब से नरेन्द्र मोदी की सरकार सत्ता में आई है भारत खतरे में हैं। आरफा खान शेरवानी एक खास एजेंडे के तहत आपको शाहीन बाग का उजला-उजला पक्ष दिखाती हैं I लेकिन, कभी वहीं स्थित पीएफआई के दफ्तरों को नहीं खोज पाती, उनका कैमरा वहां तक जाता ही नहीं। जब सरकार सीएए, एनआरसी और एनपीआर को लेकर सारा स्पष्टीकरण दे चुकी है। सारी स्थितियां साफ हो चुकी हैं। संसद से देश के प्रधानमंत्री भी मुस्लिम समुदाय को भरोसा दिलाने के लिए सारी स्थितियों को स्पष्ट कर चुके हैं। फिर अब शाहिन बाग़ में क्या बचा? सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक भय और डर का माहौल, जिसका वहां के कुछ स्थानीय मुस्लिम नेताओं को राजनीतिक लाभ हो सके। शरजील इमाम के भारत विरोधी भाषणों का समर्थन करने वाले लेफ्टिस्ट हमेशा मुस्लिम रैडिकलाइजेशन पर चुप्पी साध लेते हैं।

नागरिकता संसोधन कानून संसद के दोनो सदनों में भारी बहुमत से पारित हुआ है यह कोई ढकी छुपी बात नही है। कानून का कोई प्रावधान छुपा हुआ रह ही नही सकता I फिर भी अफवाह फैलाया गया कि सीएए मुसमानों को देश से बाहर निकालने का कानून है। जबकि कानून स्प्ष्ट करता है कि यह किसी की नागरिता छीनने का कानून है ही नही। इसका देश के किसी भी नागरिक से कोई लेना-देना है ही नहीं I बल्कि, सन 1955 के नागरिकता कानून को संशोधित करके यह व्यवस्था की गयी है कि 31 दिसम्बर सन 2014 के पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी एवं ईसाई धार्मिक प्रताडऩा के कारण भारत की नागरिकता प्रदान की जा सकेगी। इस विधेयक में भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए आवश्यक 11 वर्ष तक भारत में रहने की शर्त में भी ढील देते हुए इस अवधि को केवल 5 वर्ष तक भारत में रहने की शर्त के रूप में बदल दिया गया है। कानून इससे ज्यादा कुछ नही कहता I मगर अफवाह बाज दंगा करवाने से बाज नही आये और अब लोगो को गलत जानकारी दे कर धरना प्रदर्शन करवा रहे है। बहरहाल जरूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज का बौद्धिक वर्ग सामने आ कर कठमुल्लाओं की असलियत सामने लाये जो अपनी कुत्सित मानसिकता के साथ पूरी मुस्लिम जमात के भीतर बेमतलब भय पैदा कर रहे है। जो चीजे कानून में है ही नही उसका भय दिखा कर उन्हें उकसा रही है। ऐसे लोग जो दूसरे देश के अल्पसंख्यको की पीड़ा नही समझ सकते वो इस देश के अल्पसंख्यको के हितैषी कैसे हो सकते है। मुझे शक है कि जहनियत से शताब्दियों पीछे जीने वाले ये लोग इस्लाम खतरे में है कि बात कह कर मुस्लिम समाज के बीच अपने ही देश मे वैमनस्यता का बीज बो रहे है। उन्हें दिक्कत इस बात से है कि दूसरे मुल्क से प्रताडि़त अल्पसंख्यक खास कर हिंदुओ को भारत सरकार संरक्षण क्यो दे रही है ? वहां बहूँ- बेटियों की इज्जत लुटती है तो लुटे I हर वर्ष हजारों बेटियां अगवा कर निकाह करा दी जाती है तो हो। सम्भवत: इस तरह प्रताडि़त कर धर्म परिवर्तन भी उनके लिए एक जेहाद है। जो इस जेहाद के समर्थक है वो ही सीएए और एनआरसी के खिलाफ लोगो को गुमराह कर आंदोलन करवा रहे है। मुस्लिम समाज ऐसे लोगो से सावधान रहें तो बेहतर। बहुसंख्यक ससमाज शांत बैठा है I लेकिन, उसके सब्र को टूटने न दें इसी में सबका भला है और देश का भी है I

आर के सिन्हा
लेखक राज्य सभा सद्स्य हैं

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