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Category: सुरेश सौरभ

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विचारक (लघुकथा)

मेरे एक परिचय के अंकल जी पक्के बौद्धिस्ट और वामपंथी विचारक थे। मंच से उनके ओजस्वी भाषणों से मैं काफी प्रभावित था। समय-समय पर फोन से उनसे बात करके बहुत

सुरेश सौरभ की दो लघुकथाएं

किस्मत लॉकडाउन के चलते सारी दुकानें बंद चल रहीं थीं। उस थाने के पुलिस वालों को बहुत दिनों से जब मीट खाने को नहीं मिला, तब वह मीट खाने की

हास्य-व्यंग्य : चीन न जाने का सुख

आज से कुछ माह पूर्व मेरे एक मित्र मुझसे मिलने घर आए और कहा-अगर चीन जाना चाहो तो चले जाओ बड़ा अच्छा मौका है। वहां बहुत अच्छा वेतन मिलेगा। मेरे

हास्य-व्यंग्य : भूरा छूट गया

अचानक गांव में दिखाई पड़े संगीन अपराधी भूरा से मैंने पूछा-और भैया क्या हाल-चाल है। पैरोल पर कब छूट कर आए। वह बत्तीसी निकाल कर बोला- अरे! पैरोल पर नहीं

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