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Category: देवेन्द्रराज सुथार

Total 90 Posts

प्रेम न बाड़ी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाय !

प्रेम दो आत्माओं के एक होने का नाम है। प्रेम भावनाओं और विश्वास का पवित्र बंधन है। प्रत्येक धर्म में प्रेम करने की बात कही गयी है। प्रेम जीवन का

ऐ जाते हुए लम्हों ज़रा ठहरो, ज़रा ठहरो…

लम्हा दर लम्हा, बातों ही बातों में एक और साल 2019 हमसे अलविदा हो रहा है और नववर्ष 2020 हर्षोल्लास के साथ दस्तक दे रहा है। किन्ही के लिए साल

रे नरभक्षियों !

रे नरभक्षियों ! तुम्हारी वज़ह से आज फिर मानवता शर्मसार हुई तुम्हारी हैवानियत ने आज फिर एक माँ की कोख को कलंकित कर दिया। रे नरभक्षियों ! तुमने अपने दुष्कर्मी

लुप्त होने के कगार पर कठपुतली और ऊंट

‘बाबू मोशाय, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है, कौन कब कहां उठेगा, कोई नहीं जानता।’ हिंदी फिल्म का यह संवाद जीवन

अहिंसक देश में मांसाहार की घृणित असभ्यता

भूमंडलीकरण के इस दौर में हमारी जीवनशैली में द्रुतगामी परिवर्तन हुए हैं। इसने हमारे आचार-विचार से लेकर बोलचाल व खानपान तक को प्रभावित किया है। दुनिया भर में स्वाद और

ज़िंदगी मौत ना बन जाए, संभालो यारों !

पर्यावरण की नाजुक होती तबियत और जलवायु परिवर्तन का खतरा आज एक ज्वलंत समस्या बन चुका है। भारत की राजधानी दिल्ली से लेकर दुनिया के बड़े शहर इस भीषण समस्या

बाल दिवस पर विशेष : बचपन पर गहराते संकट के बादल

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का

पर्यावरण के लिए पटाखे बनते परेशानी

पर्यावरण को बचाना आज हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का लगातार दोहन हो रहा है। ऐसे में समन्वय बना रहे इस पर हमें ध्यान

छात्रों में अपनत्व का भाव जगाती शिक्षक की अनूठी पहल

अपनापन वैसे तो एक भाव है पर यह अपनापन ही सब समस्याओं का समाधान है। अपनापन घर के प्रति, परिवार के प्रति, अपनों के प्रति, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति, गांव

पर्यावरण के लिए पटाखे बनते परेशानी

पर्यावरण को बचाना आज हमारी सबसे बड़ी जरूरत है। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का लगातार दोहन हो रहा है। ऐसे में समन्वय बना रहे इस पर हमें ध्यान

बिगड़ते पर्यावरण को बचाने की जद्दोजहद

बिगड़ते पर्यावरण को लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है। पर्यावरण की दिनोंदिन बिगड़ती तबियत एवं जलवायु परिवर्तन के संकट को लेकर दुनियाभर में प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले दिनों स्वीडन

ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि गुरु नानक देव

भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक गुरु को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यहां तक कि हमारी वैदिक संस्कृति के कई मंत्रों में ‘गुरु परमब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नमः’ अर्थात् गुरु को

बस्ते के बोझ से मुक्ति की अभिनव पहल

हाल ही में राजस्थान के सरकारी स्कूलों में सरकार ने बच्चों के बस्ते के बोझ को कम करने के लिए पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की है। जिसके तहत पाठ्यपुस्तकों का

कृषि प्रयोगशाला बनाने का वक्त

भारत में कृषि को मानसून का जुआ मानकर इसके नकारात्मक व सकारात्मक परिणामों को अपनी किस्मत समझने की एक लंबी परंपरा रही है। आज तो कृषि को लेकर हालात इतने

कोमल है, कमजोर नहीं तू… शक्ति का नाम ही नारी

नारी नर की खान है, नारी कुल की चांदनी है, नारी घर की लक्ष्मी है। नर पुष्प है तो नारी उसका सौरभ है। नर नाव है तो नारी उसकी पतवार

भारत में बढ़ता भ्रष्टाचार

भारत में भ्रष्टाचार का रोग शनै:-शनै: बढ़ता ही जा रहा है। इस रोग से अब कोई भी अछूता नहीं रह गया है। हमारे जीवन का एक भी ऐसा क्षेत्र शेष

मासिक धर्म : आखिर चुप्पी कब तक ?

स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होने के बावजूद भारत में पैड एक महंगी वस्तु है। यह अजीब है कि स्वच्छता अभियान चलाने वाले भारत में सैनिटरी पैड पर जीएसटी लगाकर

व्यंग्य : बजट का आगमन

महंगाई की मारी और भ्रष्टाचार की बीमारी से त्रस्त जनता को बजट का बेसब्री से इंतजार है। कुपोषण के शिकार और इलाज को लाचार चूसे आम की तरह गुठलियों के

‘एक देश, एक चुनाव’ : चुनौतियां एवं समाधान

बजट सत्र के प्रथम दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लोकसभा तथा राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात कही है। राष्ट्रपति ने कहा कि बार-बार चुनाव होने

सृष्टि के वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा

शिल्प, वास्तुकला, चित्रकला, काष्ठकला, मूर्तिकला और न जाने कितनी कलाओं के जनक भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का आर्किटेक्ट व देवशिल्पी कहा जाता है। हम उन्हें दुनिया के प्रथम आर्किटेक्ट और

कब तक हमारे देश के सैनिक शहीद होते रहेंगे ?

कवि कुमार मनोज की कुछ पंक्तियाँ :- सुख भरपूर गया, मांग का सिंदूर गया, नंगे नौनिहालों की लंगोटियां चली गयी। बाप की दवाई गयी, भाई की पढ़ाई गयी, छोटी छोटी

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