National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

Category: काव्य-संसार

Total 392 Posts

कविता – इंतजार क्यों

जाने वाला चला गया, अब उसका इंतजार क्यों। उड़ गए पिंजरे से जो परिंदे, उनसे अब भी इतना प्यार क्यों।। रोशनी की चाहत की तूने, लेकिन घनघोर अंधेरा छा गया।

एक शाम अमृता प्रीतम के नाम, अल्फाजों के अफसाने , पुरस्कार

इक दिन इश्क आगे निकल जायेगा-: अंशुपाल अमृता डॉ शम्भू पंवार/ विजय न्यूज़ नेटवर्क। नई दिल्ली। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित सुप्रसिद्ध लेखिका, साहित्यकार व महान कवयित्री अमृता प्रीतम

बाल कविता: गणपति विसर्जन

प्यारे दादू , प्यारे दादू , जरा मुझको ये समझाओ। क्यों करते है , गणपति पूजा मुझको ये बतलाओ। क्यों विसर्जन करते गणपति,मुझको ये बतलाओ। ये क्या रहस्य है दादू

कविता : विनम्र श्रद्धांजलि

साथ चलता रहा सर्वदा बनाता गया वह कारवाँ देश सेवा को तत्पर छोड़ गया अपना निशाँ। बुझ गयी है लौ अब सदा-सदा के लिए तड़प उठा है भारतवर्ष भारत रत्न

कविता: हमारे आर्दश की पुण्यतिथि

समर्पण का उत्कृष्ठ उदाहरण जिसने देश को सिखाया था हर पल देश तरक्कीे के लिए ही उन्होने सेवा मार्ग दिखाया था।। जिसके कायल थे उनके विरोधी आचरण और वाणीयों में

महिला काव्य मंच की गोष्ठी

जब पुकारती है सरहदे: ऋतु गोयल डॉ. शम्भू पंवार/विजय न्यूज़ नेटवर्क। नई दिल्ली।महिला काव्य मंच (रजि.) द्वारा कारगिल विजय दिवस पर ऑनलाइन काव्य गोष्ठी महिला काव्य मंच की राष्ट्रीय महासचिव

डॉक्टर डे

डॉक्टर डे आओ सबको सैर कराए डॉक्टरों का मान- सम्मान बढ़ाएं कोई अमीर न, कोई गरीब देखें, न कोई जात, और न कोई पात माने सबको निस्वार्थ भाव से सेवा

कविता : आंसू देकर चले गए तुम

 आंसू देकर चले गए तुम (इरफान खान जी की स्मृति को समर्पित) विलख रहे हैं आज सभी हम ना जाने क्यूं चले गए तुम अभिनय की दुनिया भी सूनी हलचल

कविता : बगीचा की देन

बगीचा की देन बाग-बगीचा, अनुपम उपहार। इनके बदौलत, दुनिया-संसार। पेड़-पौधा लगाएं, जहां धरा खाली। बागीचा से जग में, रहती है हरियाली। जहां सघन है, बगीचा आवरण। वहां पर मिलता, स्वच्छ

कविता : देश की पहचान बेटियां

देश की पहचान बेटियां बेटियां भी होती हैं हमारे समाज का हिस्सा, इन्हें भी खुले आसमान में खुलकर जीने दो! बन सकती है यह भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति देश की,

कविता : कोरोना की दीक्षा है …

कोरोना की दीक्षा है … तू तेरे निर्मित इस जग में क्यूँ मुँह छिपाया फिरता है तन केंचुली के अंबार चँढ़ा क्यूँ खुद से ही खुद डरता है तू तो

कविता : हम मूर्ख हैं, ये सबको बताने की जरूरत क्या है

 हम मूर्ख हैं, ये सबको बताने की जरूरत क्या है जब देश जलता हो तो दिया जलाने की जरूरत क्या है। हम मूर्ख हैं ……..ये सबको बताने की जरूरत क्या

कविता : सांस के साथ धरती

 सांस के साथ धरती पेड़ सांस आपके साथ आप सांस लेते हैं पेड़ के साथ पृथ्वी है इतना ठीक है आप दोनों सांस के लिए ग्लोबल वार्मिंग … पृथ्वी ने

तीन मुक्तक

तीन मुक्तक इच्छाशक्तियों का भाव मन में खास इतना हो हारेंगे कभी न हम, सदा आभास इतना हो चाहे दूर जितना हो, चाहे हो कठिन जितना हम मंजिल को पाएंगे

कविता : सच बतलाओ कब आओगे

सच बतलाओ कब आओगे प्रतीक्षारत तकती हैं आंखें जिस पथ से तुम आओगे कितना अब तड़पाओगे तुम सच बतलाओ कब आओगे..।। कितनी ऋतुएं बीत गई हैं उम्मीदों का दामन थामे

कविता : शुभ बैसाखी आई

 शुभ बैसाखी आई वैशाखी है पर्व खुशी का, जग में खुशियां बांटें। शुभकामना संदेश नवल सूरज जग सम्मुख बांचे। हर्षित अम्बर, पवन, वसुधा गर्वित पावक जलधि-जल, नूतन पथ पर बढ़ा

Skip to toolbar