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Category: व्रत-त्योहार

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Navratri 2021: दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानें इनकी उपासना से होने वाला लाभ

नवरात्रि के दूसरे दिन मां के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की उपासना की जाती है. इनको ज्ञान, तपस्या और वैराग्य की देवी माना जाता है. कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने

होली एक विशेष पर्व

रंगो का पर्व होली विशेषांक में विशेष है। यह हुडदंगों के साथ तथा गाकर बजाकर चिढाकर खेलते है। वही होरियार है अर्थात (होरि यार) यारो संग होरी । शरद की

शेखावाटी में फीकी पड़ती होली की रंगत

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र अपने आप में अनेकों विविधताओं समाये हुए हैं। यहां के लोगों का रहन-सहन, खानपान, त्योहार मनाने का तरीका अलग है। त्योहारों के अवसर पर यह क्षेत्र

होली आई

होली आई , होली आई, अपने साथ मानवता लाई ना कोई रंगों का भेदभाव…….. खुशियों की बौछार है लायी, रंग बिरंगे गुलाल बिखेरती , रंगों का त्यौहार है आयी ……..

होली

सामाजिक सद्भाव और प्रेम का पर्व है- होली। यद्यपि होली को पौराणिक संदर्भों के अनुसार भक्त प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका के संदर्भ में व्याख्यायित किया गया है किन्तु वास्तव

श्री गुरु कृपा श्याम मंदिर में फागोत्सव उल्लास से मनाया

डॉ.शंभू पवार/विजय न्यूज़ नेटवर्क. चिड़ावा। पिलानी रोड़ पर स्थित श्री गुरु कृपा श्याम मंदिर में फाल्गुन एकादशी पर फागोत्सव बड़े उत्साह और उमंग से मनाया गया। इस अवसर पर फतेहपुर

होली के गीले रंग आपकी आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं

होली के दौरान हमारे शरीर के जिन अंगों को नुकसान पहुंच सकता है उनमें हमारी आंखें सबसे ज्यादा संवेदनशील होती हैं। गीले रंग पानी में आसानी से घुल जाते हैं

दोस्ती का रंग

दोस्ती का रंग हमसे पूछिए ज़रा सा हमसे दिल लगाकर ज़रा सा मुस्कुरा कर देखिए। दोस्ती होती नहीं है मोहब्बत से कम ज़रा हमारे साथ चल कर, ज़रा सा हमारे

शेखावाटी की होली में समाहित है स्नेह की मिठास

रंगों का त्योहार होली और वह भी राजस्थान में शेखावाटी अंचल में यह सुनकर ही हर कोई उत्साह व उमंग से सरोबार हो जाता है। होली के रंग-बिरंगे रंगों में

होली गीत

होरी खेलन आयो, सखी री देखो श्याम हठीलो मानत न वो विनती मोरी, करत रहत मो संग बरजोरी मोको बहुत सतायो, सखी री देखो श्याम हठीलो सात रंगन से भर

जीवन के रंग में उजास के रंग भर दो: डॉ. भावना शर्मा

डॉ. शम्भू पंवार नई दिल्ली. रंगो का त्योहार आ रहा है और आज आकस्मिक रूप से मिलना हुआ डॉ भावना शर्मा से जो झुंझुनूं नंदीशाला में अपनी सहेलियों के साथ

होली की शास्त्रानुसार रचना एवं होली मनाने की उचित पद्धति

28 मार्च को मनाये जाने वाले होलिकादहन त्यौहार के बार में शास्त्र अनुसार जानकारी! होली की एक पुरुष जितनी ऊंचाई होना क्यों आवश्यक है ?  होली के कारण साधारणतः मध्य वायुमंडल एवं भूमि के पृष्ठभाग के निकट का वायुमंडल शुद्ध होने की मात्रा अधिक होती है ।होली की ऊंचाई एक पुरुष जितनी बनाने से होली द्वारा प्रक्षेपित तेज की तरंगों के कारण ऊर्ध्वदिशा का वायूमंडल शुद्ध बनता है । तत्पश्चात् यह ऊर्जा जडता धारण करती है एवं मध्य वायुमंडल तथा भूमि के पृष्ठभाग के निकट के वायुमंडल में घनीभूत होने लगती है । इसी कारण से होली की ऊंचाई साधारणतः पांच-छः फुट होनी चाहिए । इससे शंकुस्वरूप रिक्ति में तेज की तरंगें घनीभूत होती हैं एवं मध्यमंडल में उससे आवश्यक ऊर्जा निर्मित होती है ।   होली के मध्य में खडा करने के लिए विशिष्ट पेडों का ही उपयोग क्यों किया जाता है ?  होली की रचना करते समय मध्यस्थान पर गन्ना, अरंड तथा सुपारी के पेड का तना खडा करने का आधारभूत शास्त्र गन्ना : गन्ना भी प्रवाही रजोगुणी तरंगों का प्रक्षेपण करने में अग्रसर होता है । इसकी स समीपता के कारण होली में विद्यमान शक्तिरूपी तेजतरंगें प्रक्षेपित होने में सहायता मिलती है । गन्ने का तना होली में घनीभूत हुए अग्नि रूपी तेजतत्त्व को प्रवाही बनाता है एवं वायुमंडल में इस तत्त्व का फुवारे समान प्रक्षेपण करता है । यह रजोगुण युक्त तरंगों का फुवारा परिसर में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों को नष्ट करता है । इस कारण वायुमंडल की शुद्धि होने में सहायता मिलती है । अरंड : अरंड से निकलने वाले धुए के कारण अनिष्ट शक्तियों द्वारा वातावरण में प्रक्षेपित की गई दुर्गंधयुक्त वायु नष्ट होती है । सुपारी : मूलतः रजोगुण धारण करना यह सुपारी की विशेषता है । इस रजोगुण की सहायता से होली में विद्यमान तेजतत्त्व की कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है । होली की रचना में गाय के गोबर से बने उपलों के उपयोग का महत्त्व गाय में 33 करोड देवताओं का वास होता है । इसका अर्थ है, ब्रह्मांड में विद्यमान सभी देवताओं के तत्त्वतरंगों को आकृष्ट करने की अत्यधिक क्षमता गाय में होती है । इसीलिए उसे गौमाता कहते हैं । यही कारण है कि गौमाता से प्राप्त सभी वस्तुएं भी उतनी ही सात्त्विक एवं पवित्र होती हैं । गोबर से बनाए उपलों में से 5 प्रतिशत सात्त्विकता का प्रक्षेपण होता है, तो अन्य उपलों से प्रक्षेपित होने वाली सात्त्विकता का प्रमाण केवल 2 प्रतिशत ही रहता है । अन्य उपलों में अनिष्ट शक्तियों की शक्ति आकृष्ट होने की संभावना भी होती है । इससे व्यक्ति की ओर कष्टदायक शक्ति प्रक्षेपित हो सकती है । कई स्थानों पर लोग होलिका पूजन षोडशोपचारों के साथ करते हैं । यदि यह संभव न हो, तो न्यूनतम पंचोपचार पूजन तो अवश्य करना चाहिए ।

होली पर्व – बुरा मानें या न मानें?

होली के दिन यदि कोई आपके ऊपर रंग डाले, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल नहीं। अगर कोई खुशी में झूमे-नाचे, तो क्या बुरा मानने वाली बातहै? बिल्कुल

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शम्भू पंवार ने भगवान शिव का अभिषेक किया

नई दिल्ली। महाशिवरात्रि के पावन पर्व बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से मनाया गया।अल सुबह से ही मंदिरो में भक्तजनों की भीड़ आने लगी लेकिन भक्तों ने दूरी बनाते हुए बड़ी

शिवत्व की प्रतिष्ठा में ही विश्व मानव का कल्याण संभव है

समाज में शिव की प्रतिष्ठा और पूजा–परंपरा देवता के रूप में प्राचीन काल से ही प्रचलित है किंतु हमारे शास्त्रों में वर्णित शिव का स्वरूप उनके देवत्व की पृष्ठभूमि में

सृजन एवं समभाव के स्वामी हैं शिव

महाशिवरात्रि-11 मार्च, 2021 पर विशेष सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है महाशिवरात्रि। इस

महाशिवरात्रि’निमित्त अध्यात्मविषयक ग्रंथप्रदर्शनियां और जालस्थल पर भी श्रद्धालुओं के लिए ग्रंथ उपलब्ध !

नई दिल्ली. ‘महाशिवरात्रि’ को शिवतत्त्व अन्य समय की तुलना में हजार गुना अधिक कार्यरत होता है । इस दिन भगवान शिवजी की उपासना जितनी अधिक करते हैं, उपासक को आध्यात्मिक स्तर पर

Holi 2021: होलाष्टक कब से आरंभ होगा? जानें होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

होली का पर्व पंचांग के अनुसार 28 मार्च को फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाएगा. धार्मिक दृष्टि मार्च का महीना बहुत ही विशेष है. इसी

आपातकाल में मकरसंक्रांति कैसे मनाएं ?

‘कोरोना की पृष्ठभूमि पर गत कुछ महीनों से त्योहार-उत्सव मनाने अथवा व्रतों का पालन करने हेतु कुछ प्रतिबंध थे । यद्यपि कोरोना की परिस्थिति अभी तक पूर्णतः समाप्त नहीं हुई है, तथापि वह धीरे-धीरे पूर्ववत हो रही है । ऐसे समय त्योहार मनाते समय आगामी सूत्र ध्यान में रखें । त्योहारमनाने के सर्व आचार, (उदा. हलदी-कुमकुम समारोह, तिलगुड देना आदि) अपने स्थान की स्थानीय परिस्थिति देखकर शासन-प्रशासन द्वारा कोरोना से संबंधित नियमों का पालन कर मनाएं । हलदी-कुमकुमका कार्यक्रम आयोजित करते समय एक ही समय पर सर्व महिलाआें को आमंत्रित न करें, अपितु ४-४ के गुट में 15-20 मिनट के अंतर से आमंत्रित करें । तिलगुडका लेन-देन सीधे न करते हुए छोटे लिफाफे में डालकर उसका लेन-देन करें । 4. आपस में मिलते अथवा बोलते समय मास्क का उपयोग करें । किसीभी त्योहार को मनाने का उद्देश्य स्वयं में सत्त्वगुण की वृद्धि करना होता है । इसलिए आपातकालीन परिस्थिति के कारण प्रथा के अनुसार त्योहार-उत्सव मनाने में मर्यादाएं हैं, तथापि इस काल में अधिकाधिक समय ईश्‍वर का स्मरण, नामजप, उपासना आदि करने तथा सत्त्वगुण बढाने का प्रयास करने पर ही वास्तविक रूप से त्योहार मनाना होगा । मकरसंक्रांति से संबंधित आध्यात्मिक विवेचन त्योहार, उत्सव और व्रतों को अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । इसलिए उन्हें मनाते समय उनमें से चैतन्य की निर्मिति होती है तथा उसके द्वारा साधारण मनुष्य को भी ईश्‍वर की ओर जाने में सहायता मिलती है । ऐसे महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाने के पीछे का अध्यात्मशास्त्र जानकर उन्हें मनाने से उसकी फलोत्पत्ति अधिक होती है । इसलिए यहां संक्रांत और उसे मनाने के विविध कृत्य और उनका अध्यात्मशास्त्र यहां दे रहे हैं । उत्तरायणऔर दक्षिणायन : इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को ‘दक्षिणायन’ कहते हैं । जिस व्यक्ति की उत्तरायण में मृत्यु होती है, उसकी अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के लिए, दक्षिण (यम) लोक में जाने की संभावना अधिक होती है । संक्रांतिका महत्त्व : इस काल में रज-सत्त्वात्मक तरंगों की मात्रा अधिक होने के कारण यह साधना करनेवालों के लिए पोषक होता है । तिलका उपयोग : संक्रांति पर तिल का अनेक ढंग से उपयोग करते हैं, उदाहरणार्थ तिलयुक्त जल से स्नान कर तिल के लड्डू खाना एवं दूसरों को देना, ब्राह्मणों को तिलदान, शिवमंदिर में तिल के तेल से दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) श्राद्ध में तिलका उपयोग करने से असुर इत्यादि श्राद्ध में विघ्न नहीं डालते । आयुर्वेदानुसार सर्दी के दिनों में आनेवाली संक्रांति पर तिल खाना लाभदायक होता है । अध्यात्मानुसार तिल में किसी भी अन्य तेल की अपेक्षा सत्त्वतरंगे ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है तथा सूर्य के इस संक्रमण काल में साधना अच्छी होने के लिए तिल पोषक सिद्ध होते हैं । 3 अ. तिलगुड का महत्त्व : तिल में सत्त्वतरंगें ग्रहण करने की क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुड का सेवन करने से अंतःशुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुड के दानों में घर्षण होने से सात्त्विकता का आदान-प्रदान होता है । हलदी–कुमकुमके पंचोपचार 4 अ. हलदी–कुमकुम लगाना : हलदी-कुमकुम लगाने से सुहागिन स्त्रियों में स्थित श्री दुर्गादेवी का सुप्त तत्त्व जागृत होकर वह हलदी-कुमकुम लगानेवाली सुहागिन का कल्याण करती है । 4 आ. इत्र लगाना : इत्र से प्रक्षेपित होनेवाले गंध कणों के कारण देवता का तत्त्व प्रसन्न होकर उस सुहागिन स्त्री के लिए न्यून अवधि में कार्य करता है । (उस सुहागिन का कल्याण करता है ।) 4 इ. गुलाबजल छिडकना : गुलाबजल से प्रक्षेपित होनेवाली सुगंधित तरंगों के कारण देवता की तरंगे कार्यरत होकर वातावरण की शुद्धि होती है और उपचार करनेवाली सुहागिन स्त्री को कार्यरत देवता के सगुण तत्त्व का अधिक लाभ मिलता है । 4 ई. गोद भरना : गोद भरना अर्थात ब्रह्मांड में कार्यरत श्री दुर्गादेवी की इच्छाशक्ति को आवाहन करना । गोद भरने की प्रक्रिया से ब्रह्मांड में स्थित श्री दुर्गादेवीची इच्छाशक्ति कार्यरत होने से गोद भरनेवाले जीव की अपेक्षित इच्छा पूर्ण होती है । 4 उ. उपायन देना : उपायन देते समय सदैव आंचल के छोर से उपायन को आधार दिया जाता है । तत्पश्‍चात वह दिया जाता है । ‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धन से दूसरे जीव में विद्यमान देवत्व की शरण में जाना । आंचल के छोर का आधार देने का अर्थ है, शरीर पर धारण किए हुए वस्त्र की आसक्ति का त्याग कर देहबुद्धि का त्याग करना सिखाना । संक्रांति-काल साधना के लिए पोषक होता है । अतएव इस काल में दिए जानेवाले उपायन सेे देवता की कृपा होती है और जीव को इच्छित फलप्राप्ति होती है । 4 उ 1. उपायन में क्या दें ? : आजकल साबुन, प्लास्टिक की वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देने की अनुचित प्रथा है ।

13 जनवरी को मनाया जाता है. लोहड़ी का त्योहार, जानें क्या हैं परंपराएं

लोहड़ी सिख धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म के लोगों द्वारा मनाए जाने वाले सबसे लोकप्रिय त्योहारों में से एक है. लोहड़ी का पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया

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