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चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह

दुनिया के सबसे पावरफुल कहलाने वाले अमरीका ने हाल ही में लॉकडाउन(बंद) से इनकार किया है और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि लॉकडाउन से मुल्क बर्बाद हो जायेगा। हम तो ट्रंप जी को हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी की बात याद दिलाना चाहेंगे कि “जान है तो जहान” है जी।अजी, रूपया पैसा इतना जरूरी नहीं है, जितना कि आदमी की जिंदगी। आदमी की जिंदगी रहेगी तो आदमी पैसा तो फिर भी कमा लेगा, लेकिन जिंदगी ही नहीं रहेगी तो इस जहान का मतलब और औचित्य क्या है ? जान हैं तो यह जहान है। अजी, आप जैसा विकसित और दुनिया का सबसे ताकतवर देश कोरोना का नया केंद्र बन रहा है, तो हमें लगता है कि आपको भी अपने देश में लॉकडाउन कर देना चाहिए। आप देखिए दुनिया के बड़े बड़े देशों में लॉकडाउन चल रहा है। आप देखिए टोक्यो ओलंपिक पर भी आखिरकार इंसानियत की जीत हो गई। जापान सरकार और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने टोक्यो ओलंपिक 2020 को स्थगित करने का बड़ा फैसला ले लिया है। अब ये खेल अगले साल होंगे। जापान सरकार ने कोरोना को लेकर ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण कदम उठाया। फिर आप तो सुपर पावर हैं , आप यदि अपने देश में लॉकडाउन कर देंगे तो हम नहीं समझते कि आपका मुल्क बर्बादी की ओर अग्रसर हो जायेगा।अजी,आदमी की कीमत से कुछ भी बड़ा नहीं है। यह बात ठीक है लॉकडाउन इसको रोकने का स्थाई समाधान नहीं है, लेकिन जब तक इस वायरस का कोई वैक्सीन नहीं ढ़ूंढ़ लिया जाता, तब तक लॉकडाउन से काफी हद तक इस पर काबू पाया ही जा सकता है। बहुत से देश ऐसा कर रहे हैं और उन्हें इसके अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं तो फिर आपका देश इसमें आनाकानी भला क्यों कर रहा है ? अजी, हम यह बात मानते हैं कि पैसा भी बहुत जरूरी है, पैसा भगवान तो नहीं है लेकिन भगवान कसम भगवान से कम भी नहीं है, लेकिन भैया जी जब आदमी ही इस दुनिया में नहीं रहेगा तो उस पैसे, उस धन, उस ऐश्वर्य का आदमी आखिर करेगा क्या ? हमने तो अखबार में पढ़ा था कि आपने इस महामारी को रोकने के लिए अमरीकी इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक पैकेज दो लाख करोड़ डॉलर की घोषणा तक की है, यह अत्यंत काबिलेतारीफ है लेकिन आप भी तो लॉकडाउन को अपनाएं। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। आपने स्वयं अमरीकी जनता को यह बात कही है कि “आप कई लोगों को खो देंगे।”, तो हम तो आपको यही कहेंगे कि आप लॉकडाउन को नजरअंदाज नहीं करें, क्योंकि आपके यहाँ अब तक कोरोना संक्रमण के पचपन हजार मामले सामने आ चुके हैं और न्यूयार्क में स्थिति कुछ ठीक नहीं है। अजी दक्षिण अफ्रीका जैसे देश ने भी अपने यहां लॉकडाउन की घोषणा कर दी है, फिर आप आर्थिक मंदी को लेकर इतनी चिंता भला क्योंकर कर रहे हैं ? आदमी आज के समय में भौतिक अधिक हो गया है। आदमी का आवश्यकता से अधिक मैटिरियलिस्टक हो चला है। हमने तो लिटरेचर में पढ़ा था कि यह संसार हमारे साथ कुछ ज्यादा ही है, जैसा कि अंग्रेजी के महान नेचर पोइट रहे विलियम वर्डसवर्थ ने अपनी एक कविता में लिखा था ” द वर्ल्ड इज ठू मच विद अस।” वास्तव में यह जो संसार है न, हमारे साथ कुछ ज्यादा ही है, हम ताउम्र भागादौड़ी, आपाधापी, मैटिरियलिस्टक वर्ल्ड में निकाल देते हैं और अपना हृदय हमने ” सोरडेड बून” को दे दिया है। विलियम वर्डसवर्थ ने बहुत शानदार शब्दों में अपनी कविता “द वर्ल्ड इज ठू मच विद अस” में लिखा है ” वी हैव गिवन अवर हर्ट्स अवे, ए सोरडेड बून !” अर्थात् आदमी ने अपना हृदय “गंदा” “घिनौना व अधम” और ” स्वार्थी” बना लिया है। ये पुद्गल अथवा पदार्थ का मोह आदमी से कभी भी छूटता नहीं है। आदमी को हमेशा इसी पदार्थ की चाहत बनी रहती हैं। हमें अर्थात् आदमी को यह चाहिए कि वह पदार्थ के अपने इस मोह का त्याग कर दे, क्योंकि यह पदार्थ का मोह, स्वार्थ आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता है जी। हे आदमी तुम भी तो कितने अजीब हो ? तरह तरह का मोह लपेटे फिरते हो ? इस मोह माया में तुम अंधे हो गये हो ? इतने अंधे कि तुम्हें इस मोह माया के आगे पीछे कुछ भी दिखाई नहीं देता। अजी, यह आदमी की गलत बात है। आदमी को ऐसा नहीं होना चाहिए। मोह माया से ज्यादा बंधन ठीक नहीं है। पदार्थ का बंधन तो बहुत बुरा है जी। यह पदार्थ आदमी को कहीं का भी नहीं छोड़ता, सब बर्बाद कर देता है जी। हमें लगता है इस आदमी ने कबीरदास जी के दर्शन से कुछ नहीं सीखा। अगर सीख लेता तो आदमी की नौबत ऐसी नहीं आती। आदमी की”चाह” ने आदमी को सारडेड बून बनाया है। चाह के बारे में आदमी को कबीरदास का यह दोहा पढ़ना चाहिए और पढ़ना ही नहीं अपने जीवन में उतारना चाहिए जी। दोहा कुछ इस प्रकार से है-

” चाह मिटी,चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए, वह शहनशाह।।”

ठीक ही तो कहा है कबीरदासजी ने। आपको गलत लगी क्या उनकी बात, बताइएगा जरूर ? हमें तो बिल्कुल सटीक और औचित्यपूर्ण लगती हैं। आदमी अगर चाह को मिटा दे, चिंता को मिटा दे और अपने मन को बेपरवाह रखें, जिसको कुछ भी नहीं चाहिए, वह शहनशाह बन जायेगा जी। हमारे ट्रंप जी को इससे सीख लेनी चाहिए जी। आदमी आशा, तृष्णा में जीता है। आशा आदमी के जीवन में होनी चाहिए, लेकिन तृष्णा का भाव ठीक नहीं है जी। यह तृष्णा आदमी को कहीं का भी नहीं छोड़ती, न घर का और न ही घाट का। अजी हम तो कबीरदास जी के बड़े प्रशंसक हैं और उनके इस जग को दिये दर्शन की, उपदेशों की तारीफ करते हैं, जिन्होंने कहा था-
” सांई इतना दीजिए, जामै कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं, साधु भी भूखा ना जाय।।”
आदमी को तृष्णा से दूर रहकर, पदार्थ से दूर रहकर ईश्वर से केवल और केवल यही प्रार्थना करनी चाहिए कि आदमी को केवल इतना मिले उसमें परिवार का गुजारा हो जाए। हम भी भूखे न रहें और कोई साधु भी भूखा नहीं जाए। शेष, तो व्यर्थ है। आज का ज्ञान खत्म। जय रामजी की।

धार्विक नमन, “शौर्य”,पटियाला, पंजाब
मोबाइल 7002291248

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