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चार मुक्तक

चार मुक्तक

न दिल न मन मेरे वश में , तुम्हें कैसे बताऊं मैं
रूलाए दुनिया की रस्में , तुम्हें कैसे बताऊं मैं
छुपाने दर्द को अपने लिए मुस्कान फिरता हूं
छुपा संताप अंतस में , तुम्हें कैसे बताऊं मैं

मैं तो चाहता हूं दूर ये मंजिल जरा न हो
तुम्हें जीने में जीवन मुश्किल जरा न हो
हमेशा दिल तेरा रहे खिलते कमल जैसा
किसी गम से विचलित तेरा दिल जरा न हो

किसी साथ न ऐसा हो , मेरी एक दुआ ये है
मेरी तो आरजू कुछ और थी लेकिन हुआ ये है
मेरा दिल तोड़ , मुझको छोड़ कर इतरा के वे बोले
तड़प तू याद में मेरी , तेरी बस सजा ये है

भले देखा, भले परखा , किस्सा न समझ पाया
हुआ क्या तेरे – मेरे दरमियाँ , न समझ पाया
अभी तो ठीक था सबकुछ, अभी तो साथ मैं-तुम थे
अचानक से यूं क्यों रूठे , इतना न समझ पाया

विक्रम कुमार
मनोरा , वैशाली

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