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गणतंत्र की चुनौतियां और हमारे संवैधानिक दायित्व

हमारा देश 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मानाने जा रहा है। इस दिन भारत को गणतांत्रिक राष्ट्र घोषित किया गया था। इसी दिन स्वतंत्र भारत का नया संविधान लागू हुआ था। गणतंत्र दिवस के दिन हमें अपने संविधान पर सार्थक चर्चा और मंथन करने की महती जरुरत है। मौजूदा समय में संविधान के बहुतेरे प्रावधानों की लोग अपने अपने हिसाब से व्याख्या करने में जुटे है। विशेषकर नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर विपक्षी पार्टिया मोदी सरकार पर हमला कर रही है। कई मुख्यमंत्रियों ने अपने राज्यों में कानून लागू नहीं करने की घोषणा भी की है। संविधान के जानकारों के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 11 में स्पष्ट लिखा है कि नागरिकता के बारे में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ देश की संसद को है। नागरिकता का कानून बनाने में राज्यों का कोई लेना-देना नहीं है फिर भी संसद द्वारा पारित कानून पर अंगुलिया उठाकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न की जा रही है जो संविधान पर सीधा हमला है।
इसी बीच संविधान को शिक्षा पाठ्यक्रम से जोड़ने की मांग भी जोर शोर से उठ रही है ताकि लोगों को प्रारम्भ से ही इसका ज्ञान हो सके तथा इसकी मनमानी व्याख्या पर अंकुश लगे। देखा गया है जिन्हें संविधान का बिलकुल ज्ञान नहीं है वे लोग भी विभिन्न आंदोलनों के दौरान इस पर अपनी मनमानी टिप्पणी करने से बाज नहीं आ रहे है। ऐसे लोगों से जब यह पूछा जाता है की वे संविधान के बारे में क्या जानते है तो या तो बगले झाँकने लग जाते है अथवा सुनी सुनाई बात को दोहरा देते है। लोकतंत्र के लिए यह बिलकुल ठीक नहीं है की अज्ञानी लोग बिना संविधान की पर्याप्त जानकारी के आंदोलन को हव्वा देने में अपनी शान समझते है। ऐसे में संविधान को पाठ्यक्रम से जोड़ना लोकतंत्र के लिए बेहद हितकारी होगा। आम लोगों को इससे हमें संविधान प्रदत अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी भी मिलेगी।
भारत का संविधान इस समय अग्नि परीक्षा से गुजर रहा है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक हमारा संविधान बताता है कि देश के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य होगा कि वह संविधान का अनुपालन करे और उसके द्वारा स्थापित संस्थाओं एवं आदर्शों का सम्मान करे। कश्यप के अनुसार देश की संसद जो भी कानून बनाये, वह पूरे देश में लागू होता है, इसलिए राज्य सरकारों के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वे उसे लागू करने से इनकार करें। यह इनकार संविधान का उल्लंघन होगा और नितांत असंवैधानिक होगा। संविधान की सातवीं अनुसूची, जो संघ (राज्यों का) की सूची है, में सत्रहवें नंबर पर नागरिकता है, जिसके अनुसार भी नागरिकता संघ के क्षेत्राधिकार में है। राज्य सूची में नागरिकता का कोई उल्लेख नहीं है। गणतंत्र दिवस के पावन दिवस पर हमें खुले दिल से इन सब बातों पर गहनता से मंथन करना चाहिए तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी।
भारतीय गणतंत्र को स्थापित हुए 70 साल पूरे हो गए। हम गणतंत्र की 71 वीं सालगिरह मना रहे हैं। गणतंत्र का अर्थ है हमारा संविधान – हमारी सरकार- हमारे कर्त्व्य – हमारा अधिकार। इस व्यवस्था को हम सभी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को भारत एक सम्प्रभु लोकतान्त्रिक गणराज्य घोषित हुआ। गणतंत्र दिवस भारत का राष्ट्रीय पर्व है। यह दिवस भारत के गणतंत्र बनने की खुशी में मनाया जाता है। इसे सभी जाति एवं वर्ग के लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं।
भारत का संविधान विश्व में सबसे बड़ा संविधान है। इस संविधान के जरिये नागरिकों को प्रजातान्त्रिक अधिकार सौंपे गए। संविधान देश में विधायिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका की व्यवस्था तथा उनके अधिकारों और दायित्वों को सुनिश्चित करता है। सविँधान के जरिये हमने अपने लोकतान्त्रिक अधिकार हासिल किये ,अथार्त समस्त अधिकार जनता में निहित हुए ,इसी दिन हमें अपने मौलिक अधिकार प्राप्त हुए और एक नए लोकतान्त्रिक देश का निर्माण हुआ।
भारतीय संविधान का निर्माण एक संविधान सभा द्वारा किया गया। संविधान सभा में 296 सदस्य थे। जिन्होंने एक महीने 18 दिन काम कर संविधान को तैयार किया। हालाँकि इस अवधि में काम केवल 166 घंटे ही हुआ और हमारा संविधान बनकर तैयार हो गया। 26 जनवरी 1950 को हमारे संविधान को लागू किये जाने के कारण हर वर्ष 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस के रूप में मानते
हमारा गणतंत्र अनेक विकट समस्याओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। गणतंत्र को जनसंख्यां विस्फोट, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता अत्याचार, कुरीतियों और बेकारी जैसी समस्याओं के चक्रव्यूह से निकालने के लिए हमें अपनी सम्पूर्ण ताकत से प्रयास करना होगा। इसके लिए जरूरी है की हम मिलजुलकर इन चुनौतियों का सामना करें और आदर्श समाज की स्थापना में तन मन और धन से जुटें। गणतंत्र की सार्थकता तभी होगी जब हरेक व्यक्ति को काम व भरपेट भोजन मिले। गणतंत्र की सफलता हमारी एकजुटता और स्वतंत्रता सेनानियों की भावना के अनुरूप देश के नव निर्माण में निहित है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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