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जिंदगी की होली में खुशियों के रंग

होली त्यौहार पर विशेष 

कहते हैं जिंदगी दो दिन का तराना है। आज आना और कल जाना है। इतने छोटे से जीवन पर कैसा अहंकार? हमें नहीं पता कि जन्म से पूर्व हम क्या थे और मरने के बाद कहाँ जाएँगे? हमारे हिस्से में जो बचा है, वह आज है। क्यों न इस आज को जिंदादिली के साथ जिएँ। हँसे-हँसाए और मुस्कुराएँ। यहाँ पर सब अपने हैं। कोई पराया नहीं है। सच्चे दिल से देखिए कोई इंसान बुरा नहीं है। कभी-कभी दुख का ग्रहण इतना गहराजाता है कि हमारे अपने भी दुखदायी लगने लगते हैं। दूसरी ओर जब सुख की पूर्णिमा छा जाती है तो पराये भी अपने लगने लगते हैं। यही सब लोग हमारी जिंदगी के असली रंग हैं। इनके बिना जीवन फीका-फीका लगता है। अब आप ही बताइए किसकी जिंदगी में दुख नहीं है? सच तो यह है कि सुख और दुख का चोली-दामन सा साथ होता है। इसीलिए अपनों के संग होली के रंग का जो मजा है, वह कहीं और नहीं है। यही वो पल होते हैं जो हमारे अकेलेपन में गुदगुदी का अहसास देते हैं। ऐसा न हो कि हम मृत्युशय्या पर लेटे रहें और अतीत में होली न मनाने की कसक चूभती रहे। जीने को तो कीड़े-मकौड़े भी जी लेते हैं। लेकिन वह भी कोई जीना है? मजा तो एक पल में सारी जिंदगी को जीने में है। अंत समय में हमारे पास कुछ रहे न रहे खुशी के ये रंग जरूर रहेंगे। जिंदगी की होली में खुशियों के रंग बहुत कम लोगों को नसीब होते हैं।
इंद्रधनुषी रंगों से भरे पल हमारी जिंदगी की खूबसूरती बढ़ाने के साथ-साथ हममें नई ऊर्जा भरते हैं। हर रंग हमसे कुछ कहना चाहते हैं। हमसे बतियाना चाहते हैं। हमें गले लगाना चाहते हैं। जिंदगी के भीतर सफेद रंग अपनी चादर बिछा दे तो चारों ओर सुख-चैन फैल जाता है। न किसी से दुश्मनी न किसी से झगड़ा। सब अपने लगने लगते हैं। चेहरे पर लाल रंग की लालिमा एक अजीब ऊर्जा भर देती है। सब कुछ गजब सा लगने लगता है। खुद पर भरोसा करने लगते हैं। उसी भरोसे के सहारे दूसरों के दिल जीतने लगते हैं। संभावनाओं की हरियाली बढ़ जाती है। यही हरियाली हमारी जिंदगी में फैले दुखों के रेगिस्तान में खुशहाली बनकर आती है। जब यही खुशहाली सातवें आसमान पर पहुँच जाती है तो सारी दुनिया मस्तमौला होकर झूमने लगती है। यहीं से पैदा होता है हल्दी के शुद्ध पीलेपन-सा अच्छाई और भलाई करने का गुण। अच्छाई का पीलापन जैसे-जैसे एक से दूसरे हाथ फैलता है तो बुराई की सोच खुद-ब-खुद मिट जाती है। तब हमें आँखों में प्रेम का काजल और होठों-गालों पर सुंदरता का गुलाबीपन दिखाई देता है। इन सबको देख-देखकर पता ही नहीं चलता कि जिंदगी कब सुनहरी हो गई।
कोई रंग अच्छा या बुरा नहीं होता। बुरा तो आदमी की सोच होती है। रंगों को धर्म, जात-पात के नाम पर बाँटना सिर्फ बेवकूफी है। रंग में इंसान को नहीं इंसान के रंग को पहचानने की कोशिश करना चाहिए। धर्म के ठेकेदारों के पास तो सबके जवाब होते हैं। क्या वे बता सकते हैं कि यदि खून का रंग लाल है तो पीड़ा का रंग क्या है? कागज पर लिखे काले रंग का मन में कौन-सा रंग बनता है? यह बताना मुश्किल है। इसका अनुभव करना तो और मुश्किल है। इसलिए हरे रंग को मुसलमानों से केसरिया को हिंदुओं से जोड़ने की जो रंगों की मजहबी राजनीति है, उसे कुचलना बहुत जरूरी है। दुनिया के सभी लोग फसलों में हरियाली, चूल्हे की आग में केसरिया रंग देखते हैं। अनाजों में सफेद-पीला और न जाने क्या-क्या रंग देखते हैं, जो भी देखते हैं उसमें अपनी जिंदगी देखते हैं।
हम इस भुलावे में कभी न रहें कि रंगों का अपना कोई अस्तित्व होता है। इस दुनिया में किसी भी चीज में रंग नहीं है। हमारे पंचतत्व पानी, हवा, गगन, धरती और आग सभी रंगहीन हैं। यहाँ तक कि जिन चीजों को हम देखते हैं, वे भी रंगहीन हैं। रंग केवल प्रकाश में होता है। वह प्रकाश कुछ और नहीं हमारी खुशी, आशा, भाईचारा, प्रेम, सौहार्द, एकता तथा विश्वबंधुत्व की भावना है। इस प्रकाश से सराबोर रंग का असली अस्तित्व अपने पास रखने में नहीं बल्कि दूसरों पर लुटाने से है। इसीलिए जिंदगी की होली में खुशियों के रंग लगाना है तो पहले अपनी सोच बदलनी होगी। सबकी खुशी में अपनी खुशी और सबके दुख में अपना दुख देखने वाला ही सच्चा इंसान है। सबको अपना बनाने और अपने को सबका बनाने में जो खुशी है, वह दुनिया में कहीं नहीं मिल सकती। इसीलिए कबीरदास ने कहा था- लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल। लाली देखने मैं गई खुद भी हो गई लाल।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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