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मजबूरी या जरूरी, पीएम मोदी ने क्यों बदल दी अपनी वैक्सीन पॉलिसी?

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार की शाम देश के नाम संबोधन दिया. इस दौरान उन्होंने देश में लागू वैक्सीन नीति में बदलाव किया.उन्होंने वैक्सीन नीति फिर से बदलकर पहले जैसी कर दी. इसमें अब फिर से वही होगा कि वैक्सीन की पूरी खरीद केंद्र ही करेगा और राज्यों का काम सिर्फ टीकाकरण का होगा.

राज्यों को अब वैक्सीन की खरीद नहीं करनी होगी, जो उनके लिए बहुत टेढ़ा काम हो गया था. इसी पर खूब राजनीति भी हो रही थी. सोमवार को ये निर्णय लिया गया कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा 25 प्रतिशत काम था उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी. ये व्यवस्था आने वाले दो हफ्ते में लागू की जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने अख्तियार किया था कड़ा रुख

पीएम का ये बड़ा ऐलान है. केंद्र सरकार की वैक्सीन नीति पर वो यू-टर्न है, जो इस वक्त बहुत ज़रूरी भी था और सरकार के लिए मजबूरी भी था क्योंकि वैक्सीन की खरीद पर राज्य हाथ खड़े कर चुके हैं. वो लगातार कह रहे थे कि वैक्सीन केंद्र ही खरीदे और इसे राज्यों को बांटे.

उधर, सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठा दिए थे कि वैक्सीन नीति पहली नजर में मनमानी और तर्कहीन लगती है और अदालतें इस पर मूक दर्शक नहीं हो सकतीं. क्योंकि किसी को मुफ्त टीका मिल रहा है तो किसी को भुगतान करना पड़ रहा है. वैक्सीन की एक कीमत नहीं है. 18 प्लस का टीकाकरण राज्यों के भरोसे क्यों छोड़ दिया गया.

कई हफ्ते से इन सवालों, इस पर सियासत और बड़े टकराव के बीच आखिरकार प्रधानमंत्री सामने आए और साफ कर दिया कि वैक्सीन पर अब पुरानी नीति ही चलेगी. 21 जून से देश के हर राज्य में 18 साल के लिए भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन देगी. 75 प्रतिशत हिस्सा खुद को खरीद कर राज्यों को मुफ्त देगी. किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा.

केंद्र सरकार उठाएगी खर्चा

अब वैक्सीन की खरीद केंद्र के ही हवाले होगी. खर्च भी केंद्र सरकार उठाएगी. हालांकि 25 प्रतिशत हिस्सा प्राइवेट अस्पतालों को मिलता रहेगा. लेकिन वो भी एक डोज़ की निर्धारित कीमत से 150 रुपये एक्स्ट्रा ही ले सकेंगे. प्राइवेट अस्पताल निर्धारित कीमत के बाद एक डोज़ पर 150 रुपये ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे.इसकी निगरानी राज्य सरकारों के पास रहेगी.अब राज्यों को वैक्सीन की खरीद और खर्च पर नहीं, सिर्फ टीकाकरण पर ध्यान देना होगा. अप्रैल तक यही नीति चल भी रही थी. लेकिन ये नीति बाद में बदल गई तो इसमें एक बड़ी गलती राज्यों की भी थी.

राज्यों के बदले सुर

16 जनवरी से अप्रैल तक वैक्सीनेशन कार्यक्रम केंद्र की देखरेख में चला. देश आगे बढ़ रहा था. इस बीच राज्यों ने कहा कि वैक्सीन का काम राज्य करें. एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम दिया गया.

उन्हें पूरा करने के प्रयास किए. इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाई आती है ये भी पता हो गया. मई में दो हफ्ते बाद कुछ राज्य कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था अच्छी थी. फिर कई और राज्यों ने कहा वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए. जो इसकी वकालत करते थे उनके विचार बदल गए.लेकिन राज्यों को भी समझ में आ गया कि वैक्सीन की खुद से खरीद आसान नहीं और केंद्र को भी समझ में आ गया कि कोई भी टकराव मिशन वैक्सीनेशन का ब्रेकर बनेगा.

इसलिए इस टकराव का अंत करना ज़रूरी है.हर राज्य को कुछ हफ्ते पहले ही बता दिया जाएगा कि कितनी डोज़ मिलेगी. वाद विवाद छींटाकशी. ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए.ये बात सबको समझनी होगी कि वैक्सीन जैसे मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. क्योंकि ये मुद्दा नहीं देश का मिशन है. जिसमें जल्द से जल्द और हर हाल में सबको टीका लगवाना सब सरकारों की जिम्मेदारी है.

प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन की मनमानी कीमत पर कंट्रोल

पीएम के इस बड़े फैसले में एक बड़ी बात ये भी है कि प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन की मनमानी कीमत पर कंट्रोल होगा. क्योंकि पीएम ने कहा है कि खरीद की निर्धारित कीमत के बाद प्राइवेट अस्पताल प्रति डोज़ 150 रुपये ही एक्स्ट्रा सर्विस चार्ज के तौर पर ले सकते हैं.

वैक्सीन कंपनियों से केंद्र को कोविशील्ड की एक डोज़ 150 रुपये में मिल रही है. जबकि राज्य को 300 रुपये में और प्राइवेट अस्पतालों को 600 रुपये में मिल रही है. कोवैक्सीन की एक डोज़ केंद्र को 150 रुपये की. जबकि राज्यों को 400 रुपये की और प्राइवेट अस्पतालों को 1200 रुपये की मिलती है.

लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में एक टीके की अधिकतम कीमत तय नहीं है. कहीं कोविशील्ड 800 रुपये में लगती है तो कहीं उसी कोविशील्ड का एक टीका 1800 रुपये में भी लग रहा था. कहीं-कहीं दो से तीन गुना कीमत ली जा रही है.

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कोवैक्सीन पर भी यही हाल है जो कोविशील्ड से भी महंगी है लेकिन अब वैक्सीन के बेस प्राइस से 150 रुपये ज़्यादा ही लिए जा सकते हैं. कोवैक्सीन अधिकतम 1350 रुपये और कोविशील्ड अधिकतम साढ़े सात सौ रुपये में ही लगाई जाएगी. इससे ज़्यादा पैसे नहीं लिए जा सकते.

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